मिर्जा गालिब के चुनिंदा शेर, 'कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग'

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

कहते हैं जीते हैं उम्मीद पे लोग... हम को जीने की भी उम्मीद नहीं

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं... फिर वही ज़िंदगी हमारी है

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था... दिल भी या-रब कई दिए होते

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी... कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ... काश पूछो कि मुद्दआ क्या है

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही... मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

जान दी दी हुई उसी की थी... हक़ तो यूँ है कि हक़ अदा न हुआ

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद... जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक... कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

Published by: Siraj Mahi | Sep 09, 2023

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