हंसता पानी रोता पानी... मुझ को आवाज़ें देता था
ओ पिछली रुत के साथी... अब के बरस मैं तन्हा हूँ
मैं इस जानिब तू उस जानिब... बीच में पत्थर का दरिया था
मैं उन की राह देखता हूँ रात भर... वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए
ये आप हम तो बोझ हैं ज़मीन का... ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए
तू आँखों से ओझल होता जाता है... दूर खड़े हम ख़ाली हाथ हिलाते हैं
होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी... बरहम हुई है यूँ भी तबीअत कभी कभी
फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए... फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आए
सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे... ठंडी ठंडी हवा फिर चली सो रहो सो रहो