"फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए"; नासिर काजमी के शेर

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

हंसता पानी रोता पानी... मुझ को आवाज़ें देता था

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

ओ पिछली रुत के साथी... अब के बरस मैं तन्हा हूँ

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

मैं इस जानिब तू उस जानिब... बीच में पत्थर का दरिया था

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

मैं उन की राह देखता हूँ रात भर... वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

ये आप हम तो बोझ हैं ज़मीन का... ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

तू आँखों से ओझल होता जाता है... दूर खड़े हम ख़ाली हाथ हिलाते हैं

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी... बरहम हुई है यूँ भी तबीअत कभी कभी

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए... फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आए

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे... ठंडी ठंडी हवा फिर चली सो रहो सो रहो

Published by: Siraj Mahi | Apr 24, 2024

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