दूर तक एक ख़ला है सो ख़ला के अंदर... सिर्फ़ तन्हाई की सूरत ही नज़र आएगी
मिरी नज़र में है 'क़ाएम' ये काएनात तमाम... नज़र में गो कोई लाता नहीं है यां मुझ को
अपना आप पड़ा रह जाता है बस इक अंदाज़े पर... आधे हम इस धरती पर हैं आधे उस सय्यारे पर
ख़ला में तैरते फिरते हैं हाथ पकड़े हुए... ज़मीं की एक सदी एक साल सूरज का
भुला चुके हैं ज़मीन ओ ज़मां के सब क़िस्से... सुख़न-तराज़ हैं लेकिन ख़ला में रहते हैं
रात दिन गर्दिश में हैं लेकिन पड़ा रहता हूँ मैं... काम क्या मेरा यहां है सोचता रहता हूं मैं
तुम अपने चाँद तारे कहकशां चाहे जिसे देना... मिरी आंखों पे अपनी दीद की इक शाम लिख देना
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है... मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है
चले तो पांव के नीचे कुचल गई कोई शय... नशे की झोंक में देखा नहीं कि दुनिया है