बच्चे के बोलने के तरीके से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पता करेगा अवसाद

एक नये शोध के मुताबिक यह प्रणाली संभवत: कम उम्र के लोगों में उन स्थितियों का पता लगाने का तेज एवं आसान तरीका है जिनके बारे में यह जानना मुश्किल है और अक्सर इन्हें नजरअंदाज किया जाता है.

बच्चे के बोलने के तरीके से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पता करेगा अवसाद
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एक ऐसी प्रणाली विकसित की गई है. (फाइल फोटो)

वाशिंगटन: वैज्ञानिकों ने कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जो छोटे बच्चों के बातचीत के तरीके में चिंता एवं अवसाद के संकेतों का पता लगा सकती है. 

एक नये शोध के मुताबिक यह प्रणाली संभवत: कम उम्र के लोगों में उन स्थितियों का पता लगाने का तेज एवं आसान तरीका है जिनके बारे में यह जानना मुश्किल है और अक्सर इन्हें नजरअंदाज किया जाता है. करीब पांच में से एक बच्चा चिंता एवं अवसाद से ग्रस्त होता है जिन्हें समुचित रूप से “आंतरिक विकार” के तौर पर जाना जाता है.

8 साल से कम के बच्चे को होती है परेशानी
हालांकि आठ साल से कम उम्र के बच्चे अपनी भावनात्मक पीड़ा को सही ढंग से नहीं बता पाते और वयस्कों को उनकी मानसिक स्थिति को समझने तथा संभावित मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को पहचनाने की जरूरत होती है.

नहीं मिल पाता जरूरी इलाज
मनोचिकित्सकों के साथ अप्वाइंटमेंट के लिए प्रतीक्षा करना, बीमा का मुद्दा एवं परिजन का इन लक्षणों को पहचाने में विफल रहना इस सब के कारण बच्चों को जरूरी इलाज नहीं मिल पाता.

शोधकर्ताओं ने किया अध्ययन
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में तीन से आठ साल के 71 बच्चे शामिल किए और उनसे तीन मिनट की एक कहानी सुनाने को कहा. साथ ही उनसे कहा गया कि उन्हें बाद में बताया जाएगा कि उनकी कहानी कितनी दिलचस्प थी.

अमेरिका की वर्मोन्ट यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एवं इस अध्ययन की मुख्य शोधकर्ता एलेन मैकगिनिस ने बताया कि यह कार्य थोड़ा तनावपूर्ण बनाया गया था और बच्चों को इस बात के लिए तैयार किया गया था कि कोई निर्णय कर रहा है.

इस परीक्षण के जरिए शोधकर्ता बच्चों में आंतरिक विकार का 80 फीसदी सटीकता से पता लगाने में कामयाब रहे. यह शोध ‘बायोमेडिकल एंड हेल्थ इंफॉर्मेटिक्स’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है.