DNA ANALYSIS: US में नस्लीय भेदभाव का चेहरा, पूर्व सैनिक को देशभक्ति साबित करने के लिए उतारनी पड़ी शर्ट

Racism In America: अमेरिका की कड़वी सच्चाई यही है कि वो मानव अधिकारों पर पूरी दुनिया को लेक्चर तो देता है और वहां के थिंक टैंक इस पर दूसरे देशों के लिए रेटिंग पॉइंट्स भी जारी करते हैं, लेकिन इस सबके दौरान अमेरिका ये भूल जाता है कि उसके यहां कैसे मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है.

DNA ANALYSIS: US में नस्लीय भेदभाव का चेहरा, पूर्व सैनिक को देशभक्ति साबित करने के लिए उतारनी पड़ी शर्ट

नई दिल्‍ली: अब हम मानव अधिकारों और नस्लीय भेदभाव जैसे मुद्दों पर दुनियाभर को लेक्चर देने वाले अमेरिका से आई एक ऐसी खबर का विश्लेषण करेंगे, जो अमेरिका के चरित्र और उसके दोहरे मापदंड की पोल खोलती है.

अमेरिका के ओहियो राज्य से कुछ तस्‍वीरें आई हैं, जहां एक टाउन हॉल मीटिंग के दौरान ली वॉन्‍ग (Lee Wong) नाम के एक पूर्व सैनिक ने कुछ ऐसा किया, जिसने अमेरिका में बढ़ते नस्लीय भेदभाव पर एक नई बहस छेड़ दी.

LEE WONG

अमेरिका का असली चरित्र 

उन्होंने टाउन हॉल के दौरान अपना कोर्ट उतारा और फिर शर्ट खोल कर अपने शरीर पर आई चोटें मीडिया को दिखाईं. ऐसा करते हुए उनकी जुबान पर यही शब्द थे कि क्या ये चोटें उन्हें देशभक्त साबित करने के लिए काफी हैं? इन तस्वीरों में इतनी ताकत थी कि इसने अमेरिका में एशियाई मूल के नागरिकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा के मुद्दे को जीवित कर दिया और हमें लगता है कि अमेरिका को इससे काफी तकलीफ हुई होगी.

दरअसल, अमेरिका जानता है कि ये तस्वीरें उसके असली चरित्र के बारे में दुनिया को बताती हैं, जिसे अब तक छिपाता रहा है. अमेरिका की कड़वी सच्चाई यही है कि वो मानव अधिकारों पर पूरी दुनिया को लेक्चर तो देता है और वहां के थिंक टैंक इस पर दूसरे देशों के लिए रेटिंग पॉइंट्स भी जारी करते हैं, लेकिन इस सबके दौरान अमेरिका ये भूल जाता है कि उसके यहां कैसे मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है.

एशियाई मूल के नागरिकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं 

अमेरिका में जब से कोरोना वायरस का संक्रमण फैला है, तब से वहां एशियाई मूल के नागरिकों पर हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं और इनमें भारतीय मूल के लोग भी हैं. कैलिफोर्निया स्‍टेट यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार, 2020 में अमेरिका में एशिया-अमेरिकियों  पर होने वाले हमलों में 150 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यही नहीं मार्च से सितम्बर 2020 के बीच में ऐसी ढाई हजार हिंसक घटनाएं सामने आईं.

अमेरिका में बढ़ती नस्लीय हिंसा को आप कुछ दिनों पुरानी एक घटना से भी समझ सकते हैं. 16 मार्च को अमेरिका के अटलांटा में अंधाधुंध गोलीबारी हुई थी और इसमें 8 लोगों मारे गए थे, जिनमें से 6 एशियाई मूल के थे और ये सभी महिलाएं थीं.

सोचिए, जो देश मानव अधिकारों के उल्लंघन और नस्लीय भेदभाव को बड़ी बीमारी बताता है. वही देश इन दोनों बीमारियों से इतनी बुरी तरह संक्रमित है. हालांकि इसके बावजूद अमेरिका अपने गिरेबान में झांक कर देखने के लिए तैयार नहीं है.

यूएस स्‍टेट डिपार्टमेंट अब से कुछ दिनों में मानव अधिकारों को लेकर एक रिपोर्ट जारी करने वाला है, जिसमें वो दुनिया के 195 देशों को ये बताएगा कि मानव अधिकारों की रक्षा और इनके पालन के लिए उन्हें क्या करना चाहिए. यही नहीं इस रिपोर्ट के बहाने वो इन देशों में लोकतंत्र और लोगों के अधिकारों की समीक्षा भी करेगा.अब आप खुद सोचिए कि जिस देश में नस्लीय भेदभाव इतना ज्‍यादा है, जहां एक पूर्व सैनिक को अपनी देशभक्ति साबित करनी पड़ रही है, वो देश पूरी दुनिया को मानव अधिकारों पर उपदेश दे रहा है. ये ठीक वैसा ही है जैसे परीक्षा में कोई छात्र फेल होने के बावजूद दूसरे छात्रों को ये सिखाए कि उन्हें पास कैसे होना है. 

जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या

आपको याद होगा पिछले साल अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या कर दी गई थी. अब इस मामले में कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई है और इस कोर्ट ट्रायल को अमेरिका के असली लोकतंत्र का ट्रायल भी माना जा रहा है. यानी अमेरिका दूर से तो चैम्पियन दिखता है लेकिन अगर आप पास से देखें तो सच्चाई ये है कि अमेरिका में अश्वेत नागरिकों के खिलाफ हिंसा होती है.

एशियाई मूल के नागरिक, जिनमें भारतीय भी हैं, वो नस्लीय अपराधों के शिकार होते हैं और हर दूसरे दिन वहां निर्दोष लोग मास शूटिंग में मारे जाते हैं, लेकिन अमेरिका इन लोगों के मानव अधिकारों की बात नहीं करता. हमें लगता है कि अमेरिका में नस्लीय भेदभाव एक तरह की बहुत बड़ी महामारी है, जिसकी वैक्सीन आज तक नहीं ढूंढी जा सकी है. 

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