DNA ANALYSIS: आर्कटिक में रूस का 'समुद्र मंथन', बेशकीमती खजाने पर 8 बड़े देश कर रहे दावा

आर्कटिक में रूस का मिलिट्री बेस है और इसमें एक साथ 150 सैनिक रह सकते हैं. बर्फ के इस रेगिस्तान में रूस का ये अकेला सैन्य ठिकाना नहीं है, बल्कि रूस ने इस इलाके में कई जगहों पर अपने सैनिक और आधुनिक हथियार तैनात कर दिए हैं.

DNA ANALYSIS: आर्कटिक में रूस का 'समुद्र मंथन', बेशकीमती खजाने पर 8 बड़े देश कर रहे दावा

नई दिल्ली: आज हम आपको युद्ध के उस नए मैदान में लेकर चलते हैं, जो वैसे तो चारों तरफ से बर्फ, वीरान जमीन और समुद्र से घिरा है, लेकिन अब दुनिया के बड़े बड़े देश इस पर कब्जा करने के लिए जी जान से जुटे गए हैं. दुनिया का जो भी देश इस पर कब्जा कर लेगा, उसकी अर्थव्यवस्था को 2 हजार 610 लाख करोड़ रुपये का फायदा होगा. ये रकम अमेरिका और चीन की आज की कुल अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है.

आर्कटिक पर रूस समेत आठ देशों का दावा

हम उत्तरी ध्रुव यानी नॉर्थ पोल पर मौजूद आर्कटिक सर्किल की बात कर रहे हैं. साल के ज्यादातर समय बर्फ से घिरे रहने वाले आर्कटिक पर रूस समेत करीब आठ देश अपना दावा करते हैं, लेकिन रूस अपने दावे को मजबूत करने के लिए सबसे ज्यादा जोर लगा रहा है.

आर्कटिक में रूस का मिलिट्री बेस है और इसमें एक साथ 150 सैनिक रह सकते हैं. इसमें रडार की सुविधा भी है और यहां एक एयरफील्ड भी है, जिस पर किसी भी विमान को उतारा जा सकता है. बर्फ के इस रेगिस्तान में रूस का ये अकेला सैन्य ठिकाना नहीं है, बल्कि रूस ने इस इलाके में कई जगहों पर अपने सैनिक और आधुनिक हथियार तैनात कर दिए हैं.

इसके अलावा रूस परमाणु शक्ति से चलने वाले ऐसे 4 समुद्री जहाजों का भी निर्माण कर रहा है, जो आर्कटिक में बर्फ की मोटी परत को तोड़कर आगे बढ़ने में सक्षम होंगे.

समुद्र पर कब्जा करने से रूस को क्या मिलेगा?

आप सोच रहे होंगे कि इस बर्फीले समुद्र पर कब्जा करने से रूस को क्या मिलेगा, तो इसका जवाब भी आर्कटिक की पिघलती हुई बर्फ में छिपा है. पूरी दुनिया के लिए आर्कटिक की बर्फ का पिघलना जलवायु परिवर्तन का मुद्दा है, लेकिन रूस इस जलवायु परिवर्तन का फायदा उठाना चाहता है.

जैसे ही आर्कटिक की ये बर्फ पिघलेगी वैसे ही यहां से समुद्री जहाजों के लिए एक नया रूट खुल जाएगा. इसे नॉर्दर्न सी रूट कहते हैं.

रूस इस नए समुद्री रास्ते को सेज नहर की तर्ज पर विकसित करना चाहता है. सेज नहर (Suez Canal) दुनिया के सबसे प्रमुख समुद्री रास्तों में से है, जहां से हर रोज दुनिया का 30 प्रतिशत समुद्री ट्रैफिक गुजरता है.

अगर रूस इस नए नॉर्दर्न सी रूट को खोलने में सफल रहा, तो एशिया और यूरोप के बीच की समुद्री दूरी बहुत हद तक घट जाएगी. अभी एक जहाज को एशिया से यूरोप पहुंचने में 25 से 30 दिन का समय लगता है, लेकिन इस नए रूट से जाने पर सिर्फ 18 दिनों का समय लगेगा.

रूस चाहता है कि वो भविष्य में इस रूट एक टोल रोड की तरह इस्तेमाल करे यानी यहां से गुजरने वाले दूसरे देशों के जहाजों से रूस शुल्क वसूलेगा, लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है.

आर्कटिक के समुद्र में 35 ट्रिलियन डॉलर का खजाना 

आर्कटिक के समुद्र में 35 ट्रिलियन डॉलर यानी 2 हजार 610 लाख करोड़ रुपये का खजाना छिपा है और इस खजाने की कीमत अमेरिका की 21​ ट्रिलियन डॉलर और चीन की 15 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा है.

ये खजाना है, पेट्रोलियम, नैचुरल गैस, मिनरल्स यानी खनिज पदार्थ, कीमती पत्थर और सोना. ये भंडार इतना बड़ा है कि इसका इस्तेमाल सैकड़ों वर्षों तक हो सकता है, लेकिन इस खजाने के दावेदार भी कई हैं और उसका कारण ये है कि आर्कटिक की सीमाएं कई देशों से मिलती हैं. लेकिन रूस अपनी सैन्य ताकत के दम पर इस इलाके पर अपना दावा मजबूत करना चाहता है.

इसके लिए वो इस इलाके में हर तरीके के हथियारों का परीक्षण कर चुका है. इनमें बैलिस्टिक मिसाइलों से लेकर न्यूक्लियर टॉरपीडोज (Nuclear Torpedoes) और ऐसी हाइपरसोनिक मिसाइलें भी शामिल हैं, जो धव्नि की गति से भी ज्यादा रफ्तार से उड़ सकती हैं.

समुद्री जहाजों में लगातार इजाफा कर रहा रूस

आर्कटिक जैसी बर्फ को तोड़ने के लिए विशेष प्रकार के समुद्री जहाजों की जरूरत पड़ती है. रूस के पास पूरी दुनिया के मुकाबले ऐसे जहाजों की संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन रूस फिर भी इनकी संख्या में लगातार इजाफा कर रहा है. इस इलाके पर अपना दावा मजबूत करने के लिए रूस ने आर्कटिक के समुद्र की सतह पर टाइटेनियम से बना अपने देश का एक झंडा भी लगा दिया है. रूस ये सब इसी खजाने को हासिल करने के लिए कर रहा है.

Beluga Whale से जासूसी 

अब आप इस इलाके में तैनात रूस के जासूसों से मिलिए. यहां Beluga Whale रूस के लिए जासूसी का काम करती हैं.

वर्ष 2019 में नॉर्वे के कुछ मछुआरों ने एक ऐसी ही Beluga Whale को पकड़ा था, जिसकी गर्दन पर एक कैमरा और कुछ उपकरण लगे हुए थे और उन उपकरणों पर लिखा था कि ये रूस की प्रॉपर्टी हैं. हालांकि तब रूस की सरकार ने जासूसी की बात से इनकार किया था.

इसी साल मार्च के महीने में रूस ने आर्कटिक में एक मिलिट्री ड्रिल की थी. इस दौरान अचानक से इस इलाके में तीन पनडुब्बियां बर्फ को चीरकर बाहर निकलीं.

इन पनडुब्बियों ने यहां बर्फ की डेढ़ मीटर से मोटी परत को तोड़ दिया था. रूस ने बाकायदा ड्रोन कैमरों की मदद से इस पूरी ड्रिल को फिल्माया और फिर इसे ऑनलाइन पोस्ट भी कर दिया, ताकि दुनिया इस इलाके में रूस की ताकत देख सके.

रूस ने प्रशांत महासागर के ऊपर उड़ रहे अमेरिका के एक प्लेन को अपने फाइटर जेट्स की मदद से वापस लौटने पर मजबूर कर दिया था. प्रशांत महासागर के एक बड़े इलाके पर भी रूस का नियंत्रण है और वो किसी भी कीमत यहां अपनी पकड़ कमजोर नहीं करना चाहता. कुल मिलाकर रूस समंदरों की महाशक्ति बनना चाहता है. ताकि वो समुद्री रास्तों पर निर्भर दुनिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर सके और आर्कटिक की पिघलती बर्फ पर भी रूस इसीलिए अपनी नजरें जमाए हुए है.

रूस ही इस इलाके का सबसे बड़ा खिलाड़ी नहीं 

लेकिन सिर्फ रूस ही इस इलाके का सबसे बड़ा खिलाड़ी नहीं है, बल्कि अमेरिका और चीन की नजरें भी इस इलाके पर हैं. अब हैरानी की बात ये है कि अमेरिका तो उन आठ देशों में शामिल है, जिनकी सीमाएं आर्कटिक सर्किल से मिलती है, लेकिन चीन के साथ ऐसा नहीं है. फिर भी वो खुद को इस इलाके के एक दावेदार के रूप में स्थापित करना चाहता है क्योंकि, जैसा कि हमने आपको बताया आर्कटिक में मौजूद प्राकृतिक खजाने की कीमत चीन की मौजूदा अर्थव्यवस्था से भी दोगुनी है.

चीन बड़े पैमाने पर कर रहा निवेश 

चीन न सिर्फ आर्कटिक में, बल्कि इसके आस पास मौजूद देशों में भी भारी पैमाने पर निवेश कर रहा है और ऐसा इसलिए है क्योंकि, जो इस इलाको को जीतेगा. वही दुनिया का असली सुपर पावर कहलाएगा. दूसरी तरफ अमेरिका है, जिसका अलास्का राज्य आर्कटिक महासागर को छूता है. अलास्का आकार के हिसाब से अमेरिका का सबसे बड़ा राज्य है और दिलचस्प बात ये है कि ये राज्य कभी रूस का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन 1867 में रूस ने अलास्का को सिर्फ 54 करोड़ रुपये में अमेरिका को बेच दिया था और आज इसी अलास्का के रास्ते अमेरिका आर्कटिक में अपनी पकड़ मौजूद करना चाहता है. दुनिया के तमाम बड़े देशों ने इस ठंडे और वीरान इलाके पर कब्जा करने के लिए एक नए शीत युद्ध की शुरुआत कर दी है.

आर्कटिक की बर्फ के नीचे प्राकृतिक संसाधनों का एक खजाना छिपा है. इस इलाके में दुनिया का वो 13 प्रतिशत तेल भंडार छिपा है, जिसे अभी तक ढूंढा नहीं जा सका है. दुनिया के गैस भंडार का 30 प्रतिशत हिस्सा भी इसी इलाके में मौजूद है और यहां 75 लाख करोड़ रुपये की कीमत के बेशकीमती पत्थर और धातुएं भी छिपी हैं. लेकिन जब तक यहां बर्फ की चादर नहीं पिघलती. तब तक इस खजाने को हाथ लगाना संभव नहीं है. हालांकि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अब यहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है.

आर्कटिक की पिघलती बर्फ भले ही दुनिया में मौसमी संकटों की मार लेकर आए, लेकिन इसके आधे से ज्यादा इलाके पर दावा करने वाले रूस जैसे देशों के लिए ये किसी तोहफे से कम नहीं है.

रूस यहां सड़कों और पोर्ट्स से लेकर हवाई अड्डे तक बना रहा है और सैन्य अड्डों का भी निर्माण कर रहा है, लेकिन अब इस दौड़ में चीन की भी एंट्री हो गई है. आर्कटिक से हजारों किलीमीटर दूर होने के बावजूद चीन इस इलाके पर अपना दावा करना चाहता है. पिछले 2 दशकों में चीन इस इलाके में 33 बार अपने उच्च स्तरीय प्रतिनिधियों को भेज चुका है और चीन इस क्षेत्र में काम करने वाले ज्यातार बड़े संस्थानों के साथ समझौते कर चुका है.

 

चीन की सैन्य गतिविधियों से अमेरिका भी चिंतित

चीन के वैज्ञानिक भी इस इलाके में मौजूद हैं और बर्फ को तोड़ने वाले जहाज भी. चीन इस आर्कटिक में अपनी नौसेना के एक बेड़े को भी भेज चुका है.

इस इलाके में बढ़ती चीन की सैन्य गतिविधियों से अमेरिका भी चिंतित है. अमेरिका पहले से इस इलाके में एक बड़ी शक्ति है, लेकिन अब वो यहां दूसरे देशों के घुस आने से परेशान है. खासकर वो देश जो इसे अपनी सैन्य रणनीति का हिस्सा बनाना चाहते हैं.

आर्कटिक के पास ग्रीनलैंड में अमेरिका का एक सैन्य ठिकाना है, जो कि आर्कटिक और अटलांटिक महासागर के बीच में है. अमेरिका यहां पर सैन्य अभ्यास भी करता रहा है, लेकिन इस इलाके को लेकर अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन की रणनीति क्या होगी ये अभी साफ नहीं है.

कुल मिलाकर बर्फ से ढका एक इलाका अब न सिर्फ ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से, बल्कि इन महाशक्तियों के आपस में टकराने की वजह से भी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है और अब जो देश सबसे पहले आर्कटिक की गहराइयों में कूटनीतिक और रणनीतिक गोता लगाएगा, वही इस समुद्र मंथन का नया सिकंदर बनेगा.

Zee News App: पाएँ हिंदी में ताज़ा समाचार, देश-दुनिया की खबरें, फिल्म, बिज़नेस अपडेट्स, खेल की दुनिया की हलचल, देखें लाइव न्यूज़ और धर्म-कर्म से जुड़ी खबरें, आदि.अभी डाउनलोड करें ज़ी न्यूज़ ऐप.