DNA ANALYSIS: कोरोना के इलाज में देनी पड़ी रिश्वत, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में खुलासा

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने पिछले साल अक्टूबर से दिसम्बर के बीच एक सर्वे किया, जिसमें 40 हजार लोगों की राय ली गई और इनमें से एक तिहाई लोगों ने माना कि उन्होंने अस्पताल में इलाज के लिए अपनी जान पहचान और सिफारिश का फायदा उठाया.

DNA ANALYSIS: कोरोना के इलाज में देनी पड़ी रिश्वत, ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में खुलासा

नई दिल्ली: अब हम यूरोप से एक ऐसी रिपोर्ट के बारे में बताएंगे, जिससे ये पता चलता है कि कोविड के समय में दवाईयों से लेकर अस्पतालों के बेड्स तक वहां जबरदस्त भ्रष्टाचार फैला हुआ है.

पश्चिमी मीडिया ने कोविड को लेकर भारत की काफी बदनामी करने की कोशिश की और इस दुष्प्रचार में अक्सर ये भी कहा जाता है कि भारत के हेल्थ सेक्टर में बहुत भ्रष्टाचार फैला हुआ है और आप भी अक्सर यही सोचते होंगे कि भारत में ऑक्सीजन के सिलिंडर से लेकर कोविड की दवाइयों तक सब पर कालाबाजारी हो रही है, लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं होता होगा. लेकिन ये धारणा पूरी तरह गलत है.

यूरोपियन यूनियन के 27 देशों में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने यूरोप को लेकर अपनी एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके मुताबिक कोरोना महामारी के दौरान अस्पताल में भर्ती होने और दूसरी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए यूरोप के देशों में लोगों को रिश्वत देनी पड़ी और अपनी जान पहचान या सिफारिश का इस्तेमाल करना पड़ा और ये रिपोर्ट कहती है कि यूरोपियन यूनियन के 27 देशों में ऐसे करने वालों लोगों की संख्या 29 प्रतिशत है. 

सोचिए जो देश इस बात का डंका पीटते हैं कि उनके यहां ईमानदारी है, वहां असल में भ्रष्टाचार चरम पर है.

हमारे देश में जब किसी व्यक्ति का कोई कागजी काम नहीं हो पाता तो उससे दो तरह के सवाल पूछे जाते हैं. पहला सवाल होता है कि क्या वो विभाग में किसी को जानता है? क्या उसकी कोई जुगाड़ है? और दूसरा सवाल ये पूछा जाता है कि वो इस काम के लिए रिश्वत दे सकता है. ये सवाल ही मिल कर भ्रष्टाचार और रिश्तखोरी को जन्म देते हैं और यूरोप में भी ऐसा ही हुआ है.

इलाज के लिए सिफारिश

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने पिछले साल अक्टूबर से दिसम्बर के बीच एक सर्वे किया, जिसमें 40 हजार लोगों की राय ली गई और इनमें से एक तिहाई लोगों ने माना कि उन्होंने अस्पताल में इलाज के लिए अपनी जान पहचान और सिफारिश का फायदा उठाया.

उदाहरण के लिए Czech Republic में 54 प्रतिशत लोगों ने ऐसा किया.

पुर्तगाल में 46 प्रतिशत लोगों को सिफारिश पर अस्पताल में भर्ती किया गया.

और हंगरी में 41 प्रतिशत लोगों को बिना लाइन में लगे निजी जान पहचान या सिफारिश से स्वास्थ्य सुविधाएं मिल गईं.

स्थितियां अब भी सुधर नहीं रहीं

अब यूरोप के देशों की जैसी छवि पूरी दुनिया में है, उसके मुताबिक, तो इन देशों में लोगों को स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए इसकी जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए थी, लेकिन इसके बावजूद ऐसा हुआ. सोचिए अगर अस्पतालों में इलाज लोगों को इस बात पर मिले कि उनकी जान पहचान स्वास्थ्य मंत्री या अस्पताल के डॉक्टर से है तो वो देश खुद को ईमानदार कैसे बता सकता है.

भारत में भी ये एक बड़ी समस्या है, लेकिन भारत हमेशा से इस समस्या को स्वीकार करता आया है, लेकिन यूरोप के देशों ने हमेशा से ही ऐसा रुख दिखाया कि उनके देश के लोग अपना काम कराने के लिए रिश्वत नहीं देते, जबकि ये सच नहीं है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की यही रिपोर्ट कहती है कि अस्पताल में इलाज कराने के लिए वहां लोगों को रिश्वत तक देनी पड़ी.

रोमानिया में 22 प्रतिशत लोगों ने इलाज के लिए रिश्वत दी

बुल्गारिया में 19 प्रतिशत लोगों ने इस काम के लिए रिश्वत दी

और हंगरी में रिश्वत देने वाले लोगों की संख्या 17 प्रतिशत है

अगर यूरोपियन यूनियन के सभी 27 देशों की बात करें तो इनकी 45 करोड़ की आबादी में से 6 प्रतिशत लोगों ने अपना इलाज रिश्वत देकर करवाया.

अब सवाल है कि क्या यूरोप अब भी यही मानेगा कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार सिर्फ़ भारत और अफ्रीका के देशों की समस्या है?

ये सर्वे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल नाम की जिस अंतरराष्ट्रीय संस्था ने किया है, वो हर साल Corruption Perceptions Index भी जारी करती है. इसमें दुनिया के 180 देशों को इस आधार पर रैंक दी जाती है कि वहां भ्रष्टाचार कितना कम है और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यूरोप के अधिकतर देश इस इंडेक्स में हर साल टॉप 20 में अपनी जगह बनाते हैं और इससे ऐसा लगता है कि इन देशों में लोग ईमानदार हैं और रिश्वतखोरी का बिल्कुल समर्थन नहीं करते.

ऐसे देशों के समाज के लिए क्लीन और विजिलेंट सोसायटीज जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं. यानी यहां लोग अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदार माने जाते हैं, लेकिन ये सर्वे बताता है कि यूरोप जैसा दिखाता है, वैसा है नहीं. 

यूरोप में भी लोग रिश्वत देकर अपना काम करवाते हैं और वहां भी भ्रष्टाचार है और ये बात वहां के लोग भी मानते हैं.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप के 62 प्रतिशत लोग मानते हैं कि वहां भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या है और 76 प्रतिशत लोग मानते हैं कि स्थितियां अब भी सुधर नहीं रही हैं.

यूरोप में रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब यूरोपियन कमीशन कोरोना से प्रभावित अपने देशों की अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूत करने के लिए 800 बिलियन यूरो यानी लगभग 70 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना को मंजूरी देने वाला है और ऐसा कहा जा रहा है कि इस फंड में भी काफी हिस्सा भ्रष्टाचार के रूप में लीक हो सकता है.

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