एंजेला मर्केल के सामने गठबंधन संबंधी चुनौती, धुर-दक्षिणपंथी 'तूफान' से होगा सामना

एएफडी के नेताओं ने मर्केल को ‘देशद्रोही’ बताया जिसकी वजह यह है कि मर्केल ने वर्ष 2015 से दस लाख शरणार्थियों को प्रवेश की इजाजत दी है.

एंजेला मर्केल के सामने गठबंधन संबंधी चुनौती, धुर-दक्षिणपंथी 'तूफान' से होगा सामना
जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने चुनाव में चौथी बार जीत हासिल की है. (Reuters/25 Sep, 2017)

बर्लिन: जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल लगातार चौथी बार चुनाव जीत गई हैं, लेकिन गठबंधन सरकार गठित करने के लिए अब उनको काफी जद्दोजहद करनी पड़ेगी क्योंकि उनसे बहुत सारे मतदाता छिटक गए और उन्हें नए साझेदार बनाने होंगे. मर्केल के लिए एक और चुनौती यह भी है कि प्रवासी विरोधी पार्टी ‘एएफडी’ पहली बार जर्मन संसद के निचले सदन बुनडेसटैग में पहुंच रही है. इस बार मर्केल की कंजर्वेटिव पार्टी और मध्य-वाम सोशल डेमोक्रेट दोनों कमजोर हुए. दोनों के लिए दशकों में ये नतीजे काफी खराब हैं. सोशल डेमोक्रेट के नेता मार्टिन सेल्ज ने अपनी पार्टी की हार स्वीकारी है.

सेल्ज ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी विपक्ष में रहेगी. इससे पहले उनकी पार्टी मर्केल की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार में शामिल है. मर्केल ने कहा, ‘‘हमें नयी सरकार बनाने का जनादेश मिला है और हमारे खिलाफ कोई दूसरी सरकार नहीं बन सकती.’’ उन्होंने कहा, ‘‘मौजूदा समय में हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्थिर समय में रह रहे हैं. मेरा इरादा जर्मनी में एक स्थिर सरकार बनाने का है.’’ 

स्थिरता और निरंतरता के वादे पर बीते 12 वर्षों से चल रहे मर्केल के सीडीयू/सीएसयू ब्लॉक को 32.9 फीसदी मत मिले जबकि मार्टिन सेल्ज की सोशल डेमोक्रेट्स को 20.8 फीसदी मत मिले. इस्लाम विरोधी दल अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) 13 फीसदी मतों के साथ तीसरा सबसे बड़ा दल बना. इस दल ने मर्केल की आव्रजन और शरणार्थी संबंधी नीति को लेकर उनका विरोध करने का संकल्प जताया.

बुनडेस्टैग में धुर-दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी दर्जनों सांसदों के प्रवेश के साथ द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के जर्मनी में एक ठहराव खत्म हुआ है जिसे वहां के एक बड़े अखबार ‘बिल्ड’ ने ‘राजनीतिक तूफान’ करार दिया है.अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी के एलेक्जेंडर गॉलैंड ने कहा, ‘‘हम अपना देश वापस लेंगे.’’ हालांकि अन्य दलों ने एएफडी के साथ मिलकर काम करने की संभावना से इनकार कर दिया है. एएफडी के नेताओं ने मर्केल को ‘देशद्रोही’ बताया जिसकी वजह यह है कि मर्केल ने वर्ष 2015 से दस लाख शरणार्थियों को प्रवेश की इजाजत दी है.

जर्मनी की 'आयरन लेडी' एंजेला मर्केल, जो अपने बूते बदलाव लाने का माद्दा रखती हैं

एंजेला मर्केल एक बार फिर इतिहास दोहरा चुकी हैं. वह जर्मनी के संघीय चुनाव में जीत दर्ज कर चौथी बार देश की चांसलर बनने जा रही हैं. हालांकि, उनकी यह जीत उतनी आसान नहीं रही. इस बार शरणार्थी संकट, बेरोजगारी और हिचकोले खाती देश की अर्थव्यवस्था जैसे कुछ ऐसे मुद्दे थे, जो मर्केल की उम्मीदों पर पानी फेर सकते थे, लेकिन मर्केल ने अपने करिश्माई व्यक्तित्व के कारण यह अग्निपरीक्षा पास कर ली. एंजेला विश्व की एकमात्र ऐसी महिला नेता हैं, जो अपने बूते परिवर्तन लाने का माद्दा रखती हैं. वह कई मायनों में दुनिया के अगुवा पुरुष नेताओं को भी पीछे छोड़ देती हैं. उन्हें जमीन से जुड़ी हुई नेता के तौर पर देखा जाता है, जो हर चीज पर कड़ा होमवर्क करती हैं.

एंजेला के करिश्माई व्यक्तित्व के बारे में अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर हर्ष पंत कहते हैं, "एंजेला मर्केल की गिनती उन गिने-चुने नेताओं में की जाती है, जिनके बिना कोई भी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन अधूरा माना जाता है. वह हर चीज पर कड़ा होमवर्क करती हैं. उनका हर मुद्दे पर अपना रुख है, जिस पर वह अडिग रहती हैं." एंजेला को राजनीतिक गुर विरासत में मिले हैं. उनकी मां सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की सदस्य थीं, जो महिलाओं के मुद्दे पर काफी मुखर थीं. यही गुर एंजेला में भी हैं. वह महिलाओं की समस्याओं को कभी नजरअंदाज नहीं करतीं और महिला वर्ग में उनकी अच्छी पैठ होने का यही कारण है.

एंजेला साल 2000 से क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) पार्टी से जुड़ी थीं और 2005 में देश की पहली महिला चांसलर बनीं. उन्होंने ने साल 2013 में अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी पर फोन टैप करने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी. वह यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने यूरोपीय सम्मेलन में अमेरिका पर तंज कसते हुए कहा था, "दोस्तों में जासूसी कभी स्वीकार नहीं की जाती." एंजेला की सीडीयू और क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) पार्टी के गठबंधन को लगभग 34 फीसदी वोट मिले हैं. हालांकि, एंजेला की पार्टी का जनाधार पिछले चुनाव की तुलना में घटा है.