'डोकलाम में झुकने से भारत का इनकार करना चीन के छोटे पड़ोसी देशों को ताकत देगा'

यदि भारत चीन के दबाव में आ जाता तो चीन के छोटे पड़ोसी देशों का उसके खिलाफ खड़ा होना और अधिक मुश्किल हो जाता. इससे भारत की विश्वसनीयता कमतर होती, पहले भूटान में और फिर दक्षिण एशिया के अन्य देशों में.

'डोकलाम में झुकने से भारत का इनकार करना चीन के छोटे पड़ोसी देशों को ताकत देगा'
डोकलाम में एक सड़क बनाने से चीनी सैनिकों को भारतीय सैनिकों द्वारा रोके जाने के बाद 16 जून से इलाके में गतिरोध चल रहा था.

बीजिंग: चीन में नियुक्त रहे पूर्व भारतीय राजदूत अशोक कंठ ने बुधवार (30 अगस्त) को कहा कि इस पड़ोसी देश के भारी दबाव के बावजूद डोकलाम गतिरोध से पीछे हटने का भारत के इनकार से बीजिंग के आक्रामक व्यवहार के खिलाफ क्षेत्र में व्यापक असर पड़ेगा. भारत और चीन ने सोमवार (28 अगस्त) को डोकलाम गतिरोध को खत्म करते हुए अपने - अपने सैनिकों को इलाके से हटा लिया. सामरिक रूप से अहम डोकलाम क्षेत्र में एक सड़क बनाने से चीनी सैनिकों को भारतीय सैनिकों द्वारा रोके जाने के बाद 16 जून से इलाके में गतिरोध चल रहा था.

बीजिंग में साल 2013 से पिछले साल जनवरी तक यहां भारत के राजदूत रहे कंठ ने डोकलाम मुद्दे पर फोन पर एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘जिस तरह से भारत डोकलाम गतिरोध से निपटा है उसका व्यापक असर होगा. चूंकि चीन डोकलाम में जो कुछ करने की कोशिश कर रहा है वह एक बड़ी पद्धति का हिस्सा है.’’ चीन विवादित दक्षिण चीन सागर जैसे एकपक्षीय कार्रवाइयों के जरिए अपने दावे वाले क्षेत्रों को हासिल करने की कोशिश कर रहा है. वहीं, दक्षिण चीन सागर में छोटे देशों ने बीजिंग के विस्तारवादी क्षेत्रीय दावों को स्वीकार कर लिया.

कंठ ने कहा, ‘‘लेकिन डोकलाम में ऐसा नहीं हुआ. भारत और भूटान नहीं झुका, इसलिए चीन को पीछे हटना पड़ा.’’ कंठ आजकल नई दिल्ली आधारित थिंक टैंक द इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज स्टडीज के निदेशक हैं. उन्होंने कहा, ‘‘यदि भारत चीन के दबाव में आ जाता तो चीन के छोटे पड़ोसी देशों का उसके खिलाफ खड़ा होना और अधिक मुश्किल हो जाता. इससे भारत की विश्वसनीयता कमतर होती, पहले भूटान में और फिर दक्षिण एशिया के अन्य देशों में.’’ उन्होंने कहा कि हम जिस तरह से निपटे हैं, वह निश्चित तौर पर क्षेत्र में चीन के आक्रामक व्यवहार के प्रतिरोध में असर डालेगा.

कंठ ने कहा कि भारत ने समझबूझ के साथ और सतर्कता से ‘जैसे को तैसा’ व्यवहार में शामिल नहीं होने की कोशिश की क्योंकि सिर्फ एक शांत कूटनीति ही एक समाधान ढूंढ सकती है. उन्होंने कहा कि भारत की ओर यह आंकलन था कि युद्ध छिड़ने का कोई वास्तवकि जोखिम नहीं है और चीन सहित दोनों पक्षों के लिए भी यह कोई विकल्प नहीं है. उन्होंने कहा कि चीन ने यह भी महसूस किया कि बल प्रयोग भी कोई विकल्प नहीं है. उन्हें एक कूटनीतिक हल ढूंढना था. चूंकि भारत अपने रुख पर दृढ़ रहा, वहीं चीन ने भी नहीं चाहा कि डोकलाम गतिरोध का आगामी ब्रिक्स सम्मेलन पर असर पड़े. कंठ ने कहा कि 73 दिनों के गतिरोध को खत्म करने के लिए भारत और चीन के बीच बनी सहमति पर आने वाले दिनों में व्यापक स्पष्टता आएगी.

नई दिल्ली ने पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ने वाले संकरे भूक्षेत्र के पास सड़क बनाने से चीन को रोकने का अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है. उन्होंने कहा, ‘‘लक्ष्य हासिल कर लिया गया और हम स्थिति को शांत करने में कामयाब रहे.’’ चीन ने शुरुआत में युद्ध जैसा रुख अपनाने के बाद लचीला रुख दिखाया. कंठ ने कहा कि चीन ने शुरू में कहा कि सार्थक वार्ता शुरू करने से पहले भाारत को एकपक्षीय तरीके से अपने सैनिकों को हटाना होगा. लेकिन उन्होंने अपना रुख बदल लिया और पारस्परिक वार्ता केा राजी हुए, जिसे द्विपक्षीय सहमति से हासिल किया गया. हालांकि, उन्होंने कहा कि दोनों देश मौजूदा हालात को शांत करने में कामयाब रहे लेकिन डोकलाम गतिरोध ने द्विपक्षीय संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है.