आज से ठीक 5 साल पहले पूरी दुनिया की घड़ियों में क्यों जोड़ा गया था एक अतिरिक्त सेकंड

आज से ठीक 5 साल पहले लंदन में पूरी दुनिया की घड़ियों में एक सेकंड अतिरिक्त जोड़ा गया था. इसे लीप सेकंड (Leap Second) भी कहा जाता है. आपका यह सोचना स्वाभाविक है कि आखिर घड़ियों में एक सेकंड जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?

आज से ठीक 5 साल पहले पूरी दुनिया की घड़ियों में क्यों जोड़ा गया था एक अतिरिक्त सेकंड
फाइल फोटो

नई दिल्ली: आज से ठीक 5 साल पहले लंदन में पूरी दुनिया की घड़ियों में एक सेकंड अतिरिक्त जोड़ा गया था. इसे लीप सेकंड (Leap Second) भी कहा जाता है. आपका यह सोचना स्वाभाविक है कि आखिर घड़ियों में एक सेकंड जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी? तो हम आपको बता दें कि धरती के घूमने की गति में लगातार फर्क आता रहता है और इसकी वजह से समय में भी फर्क आ जाता है. ऐसे में अगर लीप सेकंड नहीं जोड़ा जाएगा तो हमारी घड़ियों में दिखने वाला समय धीरे-धीरे गलत साबित हो जाएगा. यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार धरती के घूमने के वक्त पर नजर रखते हैं और उसे एटॉमिक घड़ी से मिलाते रहते रहते हैं. जब भी समय में कोई फर्क दिखाई देता है, तो वैज्ञानिक घड़ियों में लीप सेकंड जोड़ देते हैं.

सबसे पहले लीप सेकंड जोड़ने की शुरुआत 1972 में हुई थी और तब से अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं. अक्सर लीप सेकंड जोड़ने का काम 30 जून या फिर 31 दिसंबर को ही किया जाता है. 2015 में ऐसा पहली बार हुआ था जब लीप सेकेंड को व्‍यापारिक घंटों के दौरान जोड़ा गया. इस दौरान बाजार खुले रहे.

दरअसल, एक दिन में 86,400 सेकंड होते हैं, लेकिन धरती एक नियमित आवर्तन को पूरा करने के लिए 84,400.002 सेकंड लेती है. ग्रह, सूरज और चांद की अपनी-अपनी चाल के कारण पैदा होने वाले गुरुत्‍वाकर्षण बल से धरती की गति में परिवर्तन आता रहता है. जिसके परिणाम स्वरूप औसत सौर समय का आणविक समय या वैश्विक समय के साथ तालमेल बिगड़ जाता है. लिहाज़ा जब औसत सौर समय और वैश्विक समय के बीच फर्क 0.9 सेकंड तक पहुंच जाता है, तो आणविक घड़ियों के जरिये वैश्विक समय में लीप सेकंड के नाम से एक अतिरिक्त सेकंड जोड़ दिया जाता है.

अब आप सोच रहे होंगे कि एक अतिरिक्त सेकंड के जुड़ने से क्या फर्क पड़ता है. बेशक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन उपग्रह संचालन, अंतरिक्ष विज्ञान और संचार जैसे क्षेत्रों के लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, जहां हर कार्य एकदम सटीक वक्त की जरूरत होती है. 2012 में लीप सेकंड जोड़ने से कई कंपनियों के सॉफ्टवेयर क्रैश हो गए थे और जावा के प्रोग्रामों में गड़बड़ी आ गई थी. इसे देखते हुए सॉफ्टवेयर कंपनियां अब पहले से ज्यादा सतर्कता बरतने लगी हैं.  

जब भी औसत सौर समय का आणविक समय या वैश्विक समय के साथ तालमेल बिगड़ जाता है, तो  इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन ऐंड रेफरेंस सिस्टम्स सर्विसेस (IERS)  एक लीप सेकंड जोड़ने की घोषणा करता है. यह घोषणा सेकंड जोड़े जाने से कई महीने पहले कर दी जाती है. यह अतिरिक्त सेकंड आधी रात के समय ही जोड़ा जाता है और इसके लिए 30 जून या फिर 31 दिसंबर का दिन चुना जाता है.