जन्‍म के वक्‍त मरा समझ छोड़ दिया, अब 7 साल बाद मां को मिला अपना बच्‍चा

दरअसल 2011 में मां ने एक बच्‍चे को जन्‍म दिया. बच्‍चा बहुत बीमार था. डॉक्‍टरों ने कहा कि उसको बचा पाना मुश्किल है, लिहाजा उसको अस्‍पताल में ही छोड़ दिया जाना चाहिए. दिल पर पत्‍थर रखकर माता-पिता घर चले गए. पांच दिन बाद फिर बच्‍चे का हाल लेने पहुंचे.

जन्‍म के वक्‍त मरा समझ छोड़ दिया, अब 7 साल बाद मां को मिला अपना बच्‍चा
2011 में बच्‍चे का जन्‍म हुआ.(प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

सीन-1: कभी-कभी जिंदगी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है कि सहसा कुछ यकीन करना मुश्किल हो जाता है. ऐसा ही अद्भुत वाकया रूस के वोल्‍वोग्राड शहर के एक दंपति के साथ हुआ. दरअसल 2011 में मां ने एक बच्‍चे को जन्‍म दिया. बच्‍चा बहुत बीमार था. डॉक्‍टरों ने कहा कि उसको बचा पाना मुश्किल है, लिहाजा उसको अस्‍पताल में ही छोड़ दिया जाना चाहिए. दिल पर पत्‍थर रखकर माता-पिता घर चले गए. पांच दिन बाद फिर बच्‍चे का हाल लेने पहुंचे. उनको बताया गया कि डॉक्‍टरों के लाख प्रयासों के बावजूद उसको बचाया नहीं जा सका. दंपति के ऊपर दुखों का पहाड़ टूट गया. कुछ समय बाद वह संभले और एक बार फिर अपनी बिखरी जिंदगी शुरू की.

सीन-2: इस दुखद घटना के सात साल बाद महिला को अपने एक पुराने बैंक अकाउंट की याद आई. पहुंचने पर पता चला कि उसके बैंक अकाउंट को बहुत पहले ही लॉक कर दिया गया है. पूछने पर पता चला कि उनके नाम पर करीब ढाई लाख रुपये का बिल बकाया है. दरअसल उनको बताया गया कि यह उनका अनाथालय का बकाया बिल है. पहले तो उनकी कुछ समझ में नहीं आया लेकिन जब उनको बताया गया कि उनका बच्‍चा अनाथालय में पल रहा है. यह बिल उसी अनाथालय को भुगतान करना है तो यह सुनने के बाद वह बेहोश हो गईं.  

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चूंकि इस बीच महिला ने अपना मकान बदल लिया था, सो अनाथालय उनके घर तक नहीं पहुंच पाया. लेकिन जिस अस्‍पताल ने उस बच्‍चे को अनाथालय में दिया था, उसने महिला के घर समेत बैंक डिटेल भी दी थी. सो, उस अनाथालय ने बिल की पेमेंट के लिए पुलिस और बैंक से संपर्क साधा. मकान बदलने के कारण महिला को जब पुलिस नहीं खोज पाई तो मामला कोर्ट में गया. अदालत के आदेश पर उसके बैंक खाते को लॉक कर दिया गया.

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सीन-3: फिर क्‍या था, अपने बच्‍चे के जिंदा होने की बात पता चलते ही दंपति बिना एक क्षण गंवाए अनाथालय पहुंचे. वहां उनकी जन्‍म के बाद पहली बार उस बच्‍चे से मुलाकात कराई गई. मेडिकल जांच में इस बात की पुष्टि हुई कि यही बच्‍चा उनका जैविक पुत्र है. इस अतुलनीय खुशी को पाने के बाद अभिभावक और बच्‍चे का अधिकार पाने के लिए कोर्ट पहुंचे. जज ने भी बिना देर किए कानूनी तौर पर उनको बच्‍चा सौंपने का आदेश दिया. हालांकि दंपति ने अब अस्‍पताल पर केस ठोंक दिया है. अस्‍पताल से यह बताने को कहा गया है कि उसने दंपति को बच्‍चे के बारे में गलत जानकारी क्‍यों दी? दूसरा, अनाथालय का बिल उनके नाम पर क्‍यों बनाया गया? अस्‍पताल अब इन सवालों का जवाब खोज रहा है. 

(इनपुट: एजेंसी)

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