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भारत ने दिखाई दरियादिली, पड़ोसी देश ने कहा, अब हमारा 'सारा उधार चुकता हो जाएगा'

विक्रमसिंघे ने कहा कि उनका देश इस साल 14 जनवरी को अब तक का सबसे बड़ा कर्ज भुगतान करने वाला है.

भारत ने दिखाई दरियादिली, पड़ोसी देश ने कहा, अब हमारा 'सारा उधार चुकता हो जाएगा'
.(प्रतीकात्मक तस्वीर)

कोलंबो: श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसंघे ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के साथ मुद्रा अदला-बदली सहायता से देश के गिरते विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मदद मिलेगी. विक्रमसिंघे ने संसद को बताया, ‘‘आरबीआई दक्षेस मुद्रा अदला-बदली कार्यक्रम के तहत हमारे केंद्रीय बैंक को 40 करोड़ डॉलर देने पर सहमत हुआ है. वे (आरबीआई) इससे भी बड़ी राशि देने पर विचार कर रहे हैं.’’ श्रीलंका के केंद्रीय बैंक ने बुधवार को कहा था कि रिजर्व बैंक उसे दक्षेस मुद्रा अदला-बदली व्यवस्था के तहत उसे 40 करोड़ डॉलर देने पर सहमत हुआ है.

इसके अलावा एक अरब डॉलर की ऐसी और व्यवस्था पर भी रिजर्व बैंक विचार कर रहा है. विक्रमसिंघे ने कहा कि उनका देश इस साल 14 जनवरी को अब तक का सबसे बड़ा कर्ज भुगतान करने वाला है. यह भुगतान 260 करोड़ डॉलर का होगा. उन्होंने कहा, ‘‘वर्ष 2019 में ही हमें विदेशी कर्ज की किस्त और ब्याज पर 590 करोड़ डॉलर का भुगतान करना है. ’’ उन्होंने कहा कि करीब दो महीने तक चले राजनीतिक संकट का श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है. विक्रमसिंघे ने कहा, ‘‘उन 51 दिनों के दौरान हमारा रुपया (श्रीलंकाई) 3.80 प्रतिशत गिर गया. 

जब अन्य सभी मुद्राएं मजबूत हो रही थीं, हमारी मुद्रा गिर रही थी.  हमारे देश से पूंजी की निकासी हो रही थी. ’’ उन्होंने कहा कि इस दौरान देश का विदेशी मुद्रा भंडार 799.10 करोड़ डॉलर से गिरकर 698.50 करोड़ डॉलर पर आ गया. राजनीतिक संकट के कारण क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों फिच रेटिंग्स, स्टैंडर्ड एंड पुअर्स और मूडीज ने श्रीलंका की स्वायत्त रेटिंग कम कर दी.

विक्रमसिंघे ने कहा कि श्रीलंका की सरकार विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिये 1.90 अरब डॉलर जुटाने की प्रक्रिया में है. श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला श्रीसेना ने नीतिगत मुद्दों पर मतभेद के चलते एक नाटकीय घटनाक्रम में 26 अक्तूबर को प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को पद से हटा दिया था और महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री की कुसी पर बिठा दिया.  इस दौरान दो महीने तक राजनीतिक उठापटक के चलते देश में कोई कामकाजी सरकार नहीं रह गई थी.  अंत में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद श्रीसेना को विक्रमसिंघे को फिर से प्रधानमंत्री नियुक्त करना पड़ा.  

इनपुट भाषा से भी