अमेरिका में स्टूडेंट्स का विरोध, ट्यूशन और कैंपस फीस को लेकर केस दर्ज कराया

कोरोना महामारी (Coronavirus) को देखते हुए ‘ऑनलाइन लर्निंग’ पर जोर दिया जा रहा है. कई स्कूल-कॉलेज ऑनलाइन क्लास ले रहे हैं. इन कक्षाओं के नाम पर फीस वसूलने का खेल भी शुरू हो गया है. 

अमेरिका में स्टूडेंट्स का विरोध, ट्यूशन और कैंपस फीस को लेकर केस दर्ज कराया
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी

वाशिंगटन: कोरोना महामारी (Coronavirus) को देखते हुए ‘ऑनलाइन लर्निंग’ पर जोर दिया जा रहा है. कई स्कूल-कॉलेज ऑनलाइन क्लास ले रहे हैं. वहीं इन कक्षाओं के नाम पर फीस वसूलने का खेल भी शुरू हो गया है. हालांकि, अमेरिका से जो खबर सामने आई है, वो ऐसे सभी संस्थानों के लिए एक चेतावनी है.

26 अमेरिकी यूनिवर्सिटीज के छात्रों ने अपने कॉलेजों पर मुकदमा दायर किया है. उनका कहना है कि ऑनलाइन एजुकेशन शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता है. इसलिए उन्हें ट्यूशन और कैंपस शुल्क की कुछ राशि वापस की जाए.

नाराज छात्रों का कहना है कि उन्होंने सामान्य रूप से कक्षाओं में उपस्थित होकर पढ़ाई के लिए भुगतान किया था. उन्होंने लैब, लाइब्रेरी और जिम आदि के लिए फीस भरी है, लेकिन अब उनसे ऑनलाइन पढ़ाई करने को कहा जा रहा है. इसमें कोई शक नहीं है कि छात्रों को टर्म क्रेडिट मिल रहा है, लेकिन इसकी तुलना कैंपस अनुभव से नहीं की जा सकती. कॉलेज में कई नए दोस्त बनते हैं, काफी कुछ नया सीखने को मिलता है, जो ऑनलाइन क्लास में संभव नहीं. यही वजह है कि छात्रों ने फीस वापसी की मांग की है. 

दर्ज हुआ केस

छात्र ऑनलाइन कक्षाओं से निराश हैं. कुछ का कहना है कि लेक्चर लाइव नहीं होते. प्रोफेसर अक्सर वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और कोई चर्चा नहीं होती. जिन कॉलेजों के खिलाफ केस किया गया है उनमें ब्राउन, कोलंबिया और कॉर्नेल जैसे कुछ आइवी लीग (Ivy League) स्कूल शामिल हैं. इसके अलावा, छात्रों ने पब्लिक स्कूलों पर भी अपना गुस्सा जाहिर किया है. उनकी तरफ से कोलोराडो स्थित पर्ड्यू विश्वविद्यालय (University of Purdue) और शिकागो विश्वविद्यालय (University of Chicago) के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया है.

यह है स्कूलों का तर्क

इन कॉलेजों में से अधिकांश का कहना है कि कक्षाएं ऑनलाइन हो सकती हैं, लेकिन प्रोफेसर वही रहते हैं. विवाद बढ़ता देख कुछ स्कूलों ने आवास और भोजन शुल्क में से कुछ राशि छात्रों को वापस कर दी है. लेकिन ज़्यादातर ट्यूशन या कैंपस फीस लौटाने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि कोरोना वायरस की वजह से उन्हें भी काफी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है. इसलिए ट्यूशन या कैंपस फीस वापस करना संभव नहीं होगा.

खराब वित्तीय स्थिति का रोना

कॉलेज अपनी खस्ता हाल वित्तीय स्थिति का भी रोना रो रहे हैं. कुछ का कहना है कि उन्हें प्रति वर्ष लगभग 1 बिलियन डॉलर तक का नुकसान होता है. तो क्या इसे क्या बड़े विश्वविद्यालयों के अंत की शुरुआत कहा जा सकता है? यदि हार्वर्ड को कोरोना वायरस सहायता के लिए 9 मिलियन डॉलर दिए जा सकते हैं, तो कल्पना कीजिए कि संयुक्त राज्य अमेरिका कैंपस में हर साल कितना पैसा लगाता होगा.

लेकिन इस तरह से संस्थानों को वित्तपोषित करना संभव नहीं, वो भी तब जब देश की अर्थव्यवस्था कमजोर दौर से गुजर रही हो. वहीं, शीर्ष विश्वविद्यालयों में भी छात्र नामांकन में गिरावट देखी जा सकती है. क्योंकि कोरोना वायरस ने लोगों में भय पैदा कर दिया है. ऐसे में यह देखना होगा कि क्या विदेशी छात्र वापस कैंपस का रुख करते हैं?

 

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