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जानवरों एवं धरती को बचाने के लिये शाकाहारी जीवन शैली विकसित करने की जरूरत : पेटा

पशु अधिकारों पर काम करने वाले संगठन पेटा ने वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट का हवाला देते हुये दवा किया कि प्रतिवर्ष करीब 51 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिये मांस, अंडे और डेयरी उद्योगों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

जानवरों एवं धरती को बचाने के लिये शाकाहारी जीवन शैली विकसित करने की जरूरत : पेटा
जलवायु परिवर्तन के सबसे खराब प्रभावों से निपटने के लिए दुनिया को शाकाहारी भोजन की ओर जाने की आवश्यकता है. (प्रतीकात्मक फोटो)

नई दिल्लीः मांस उद्योग ग्रीन हाउस गैंसों के उत्सर्जन में सबसे आगे बना हुआ है, जो जलवायु परिवर्तन का कारण है और प्राणियों की जीवित रहने की क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है. पशु अधिकारों पर काम करने वाले संगठन पेटा ने मंगलवार (20 मार्च) यह बात कही. पेटा ने वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट का हवाला देते हुये दवा किया कि प्रतिवर्ष करीब 51 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिये मांस, अंडे और डेयरी उद्योगों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

पेटा इंडिया अभियान की संयोजक आयुषी शर्मा ने कहा, 'कल अंतरराष्ट्रीय वन दिवस है और हम लोगों को जागरूक करना चाहते हैं कि मांस खाने से किस तरह प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाता है.' उन्होंने कहा, 'हमखाने के लिए जानवर पालते हैं और इसके लिये जंगल समाप्त कर रहे हैं. हम उन जानवरों के खाने की फसलें उगा रहे हैं. हम उस वातावरण को प्रदूषित करते हैं, जिसमें ये वन्य जीव रहते हैं. इस प्रकार ये जानवर जल्दी की विलुप्त हो जाएंगे.'

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संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुये संगठन ने एक बयान में कहा, 'जलवायु परिवर्तन के सबसे खराब प्रभावों से निपटने के लिए दुनिया को शाकाहारी भोजन की ओर जाने की आवश्यकता है.' शर्मा ने कहा कि स्वास्थ्य में सुधार और जानवरों एवं धरती को बचाने के लिये शाकाहारी जीवन शैली अपनाये जाने का प्रयास करने की जरूरत है.

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एथिकल ट्रीटमेंट आफ एनीमल, इंडिया (पेटा) के तीन स्वयंसेवकों ने यहां राजधानी के राजीव चौकपर अपने शरीर को चीता, जेब्रा और जिराफ की तरह रंगवाकर प्राणियों के संरक्षण के लिए प्रदर्शन किया.

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