ZEE जानकारी: एक बार फिर सामने आया ISIS का सरगना बगदादी!

ISIS ने 18 मिनट लम्बा एक Video जारी किया है. जिसमें दावा किया गया है, कि वीडियो में दिखाई दे रहा व्यक्ति अबु बक्र अल बगदादी है.

ZEE जानकारी: एक बार फिर सामने आया ISIS का सरगना बगदादी!

पूरी दुनिया के सामने येती कब प्रकट होगा, ये तो हम नहीं कह सकते. लेकिन आज हम आपको इतना ज़रुर बता सकते हैं, कि दुनिया का Most Wanted आतंकवादी और ISIS का सरगना बगदादी एक बार फिर प्रकट हो गया है. और वो भी 5 वर्षों के बाद. 

ISIS ने कल रात 18 मिनट लम्बा एक Video जारी किया है. जिसमें दावा किया गया है, कि वीडियो में दिखाई दे रहा व्यक्ति अबु बक्र अल बगदादी है. इस वीडियो में बगदादी को एक आलीशान गद्दे पर बैठा हुआ दिखाया गया है. और उसके पीछे AK Series की बंदूक भी रखी हुई है. ये बंदूक बिल्कुल वैसी है जैसी ओसामा बिन लादेन के पास थी. बगदादी के अलावा जितने भी लोग कमरे में मौजूद हैं, उनके चेहरों को ढक दिया गया है. ताकि उनकी पहचान ना हो सके. ये वीडियो कब और कहां Record किया गया है, अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है. 

इससे पहले बगदादी का आखिरी वीडियो जुलाई 2014 में आया था. जब वो इराक के मोसुल शहर की अल-नूरी मस्ज़िद में आतंक और दहशत फैलाने वाला भाषण दे रहा था. अगर ये मान लिया जाए, की ताज़ा तस्वीर में दिखाई देने वाला व्यक्ति बगदादी ही है. तो इससे दो चीज़ें स्पष्ट होती हैं. 2014 के मुकाबले 2019 में बगदादी बूढ़ा दिख रहा है. पहले के मुकाबले उसका वज़न बढ़ गया है. 

इन दोनों ही Videos में एक बात समान है. और वो ये, कि 5 साल पहले वाला बगदादी भी पूरी दुनिया में आतंक फैलाने की बात करता था. और 2019 वाला बगदादी भी वही धमकियां दे रहा है. ताज़ा Video में बगदादी ने श्रीलंका में हुए आत्मघाती हमलों का ज़िक्र किया है. बगदादी ने श्रीलंका में आतंकवादी हमले के लिए अपने आत्मघाती हमलावरों की तारीफ की है. वो अमेरिका और यूरोप के नागरिकों की मौत से बहुत प्रसन्न है. और उसने कहा है, कि ये हमला सीरिया के बघौज़ में ISIS के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई का बदला है. सीरिया का ये इलाका ISIS का आखिरी गढ़ था. जहां उसे हार मिली है.

हालांकि, दिलचस्प बात ये है, कि इस वीडियो में जब वो श्रीलंका में हुए हमलों का ज़िक्र कर रहा था, उस वक्त Screen पर बगदादी की नहीं, बल्कि श्रीलंका के हमलों से जुड़ी तस्वीरें दिख रही थीं. इससे इस वीडियो पर संदेह होता है. हो सकता है कि ये Video पुराना हो. और ISIS ने बगदादी की आवाज़ का इस्तेमाल करके, श्रीलंका में हुए हमलों का Credit लेने की कोशिश की है. पिछले 5 वर्षों में कई बार बगदादी के गंभीर रुप से घायल होने या मारे जाने की ख़बरें आई. जून 2017 में दो बार ये दावा किया गया, कि बगदादी मारा जा चुका है. लेकिन, ISIS का दावा है कि बगदादी अब भी जीवित है. 

बगदादी के जीवित होने का दावा सच हो या झूठ. इससे फर्क नहीं पड़ता. फर्क इस बात से पड़ता है, कि ऐसे आतंकवादियों और संगठनों ने अब सीधे लोगों के घर में प्रवेश कर लिया है. 

ISIS जैसे संगठनों को भारत या श्रीलंका जैसा देश सूट करता है. लोकल पार्टनर्स की मदद से उनकी पहुंच भारत और श्रीलंका के अंदर तक हो चुकी है. वो भी हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे-बैठे. अब ISIS जैसा संगठन सीधे हमले नहीं करता. बल्कि हमलों को Out Source कर देता है. श्रीलंका में उसने नेशनल तौहीद जमात नामक संगठन को अपना लोकल पार्टनर बनाया और उसकी मदद से हमला कराया. ISIS ने भारत में भी अपने लोकल पार्टनर्स बनाए हुए हैं. 

इसके दो उदाहरण देखिए. श्रीलंका हमले के मास्टरमाइंड जाहरान हाशिम, केरल और तमिलनाडु में लंबे समय से सक्रिय था. रिपोर्ट्स के मुताबिक उसने लगभग तीन महीने भारत में भी गुज़ारे. इस हमले के लिए ज़िम्मेदार नेशनल तौहीद जमात नामक संगठन, दक्षिण भारत के Tamil Nadu तौहीद जमात के वहाबी विचारों से प्रभावित था. दक्षिण भारत में सक्रिय इस संगठन को वहाबी विचारधारा के गढ़ सऊदी अरब से पैसा मिलता है. और इस संस्था को श्रीलंका के तौहीद जमात का एक हिस्सा माना जाता है. हालांकि, श्रीलंका में हुए हमलों के बाद इस संस्था को भारत की सुरक्षा एजेसियों ने Intelligence Watch List में डाल दिया है.

इस वक्त ताज़ा स्थिति ये है, कि इराक और सीरिया में ISIS जैसे संगठन का कोई Physical Presence नहीं है. इनका कोई दफ़्तर नहीं है, इनकी कोई इमारत नहीं है.

लेकिन इंटरनेट और Social Media में इन संगठनों ने अपने अड्डे बना रखे हैं.

परेशानी की बात ये है, कि ज़मीनी स्तर पर मौजूद किसी आतंकवादी संगठन के दफ़्तर पर हमला किया जा सकता है. लेकिन इंटरनेट पर मौजूद, इन अड्डों पर बमबारी नहीं की जा सकती.

अलग अलग देशों के बॉर्डर होते हैं, लेकिन इंटरनेट पर कोई बॉर्डर नहीं है. इंटरनेट और Social Media एक खुला मैदान है. यहां पर कोई सैनिक नहीं है. जो इन आतंकवादियों और उनके विचारों को रोक सके. 

ISIS के आतंकवादी पैदल चलकर भारत जैसे देश में प्रवेश शायद ना कर पाएं. लेकिन Social Media के ज़रिए इनकी सोच आपके घर के अंदर तक पहुंच गई है. 

ये आतंकवादी अब लोगों के दिमाग को प्रभावित कर रहे हैं. 

आपने ध्यान दिया होगा, एक ज़माने में जो लोग बेरोज़गार और गरीब हुआ करते थे, वो आतंकी बनते थे. 

लेकिन, 2016 में ढाका के एक Cafe में हुए हमले में पढ़े-लिखे और अमीर घर के लड़कों ने आतंकवादी हमला किया.

और श्रीलंका में हुए हमलों में शामिल दो आत्मघाती हमलावर, कोलंबो के सबसे रईस मसाला व्यापारी के बेटे थे. ये व्यापारी, भारत को हर वर्ष हजारों टन कालीमिर्च की सप्लाई करता था. 

यानी अब अमीर घरों के पढ़े लिखे बच्चे आतंकवादी बन रहे हैं. और ISIS के बहकावे में आ रहे हैं. ये इस संगठन के बढ़ते प्रभाव की निशानी है. 

पूरी दुनिया में ISIS अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने के लिए Social Media का इस्तेमाल करता है. बाद में इन्हीं समर्थकों का Brain Wash करके इन्हें आंतकवादी बनाया जाता है.

Cyber आतंकवाद को Track कर पाना मुश्किल होता है. Track करने के बाद संदिग्ध व्यक्तियों को पकड़ना भी मुश्किल होता है.

भारत जैसे देश आज भी Internet और Social Media पर Fake News से युद्ध लड़ने के बारे में सोच रहे हैं. 

लेकिन, इसी दौरान ना जाने कितने आतंकवादियों और संगठनों ने इंटरनेट की दुनिया में अपने अड्डे बना लिए हैं.

सोशल मीडिया की मदद से ISIS ने 110 देशों के 40 हज़ार से ज़्यादा नागरिकों को आतंकवादी बनाकर, अपने संगठन में शामिल किया. Facebook का दावा है, कि पिछले साल उसने हर महीने आतंकवाद और आतंकवादियों से जुड़े, औसतन 15 लाख से ज़्यादा Post, Delete किए. इसके अलावा Twitter ने भी 2015 से लेकर अब तक आतंकवादियों और उनसे जुड़े 12 लाख से ज़्यादा Twitter Accounts को बंद किया है. इससे आप सोशल मीडिया पर इनके प्रभाव का अंदाज़ा लगा सकते हैं. यानी आज की स्थिति ऐसी है कि हम Fake News ढूंढते रह जाएंगे. और Cyber आतंकवाद हमारे घर के अंदर प्रवेश कर चुका होगा.

यहां आपको आतंकवाद वाली राजनीति भी समझनी होगी.

अमेरिका और Russia के बीच 1947 से 1991 तक एक शीत युद्ध चल रहा था. ये कोई सीधा युद्ध नहीं था बल्कि ये दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे लंबे समय तक चलने वाला राजनीतिक तनाव था. इस तनाव का अंत 1991 में सोवियत संघ के टूटने के साथ हुआ था. उस दौर में तालिबान का जन्म हुआ था. आपने तालिबान का नाम सुना होगा. तालिबान का गठन 1990 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ था, जब अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेनाएं वापस जा रही थी.

1979 से लेकर 1989 के बीच अमेरिका, अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने में जुटा था. उस वक्त अमेरिका के ही इशारे पर ओसामा बिन लादेन को अपनी ताकत बढ़ाने का मौका मिला था. लादेन ने अमेरिका के कहने पर पैसे जुटाए और सोवियत संघ के खिलाफ लड़ रहे आतंकवादियों को भारी मात्रा में हथियार मुहैया करवाने की कोशिश की. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने...लादेन को बाकयदा ट्रेनिंग भी दी थी. इसी दौरान लादेन ने 1988 में अल कायदा की शुरुआत की. 
इसके बाद जब लादेन ने, अमेरिका के खिलाफ बगावत की.. तो उसने बदले की कार्रवाई करते हुए...वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला कर दिया. इसे 9/11 Attack भी कहा जाता है. इसके बाद अमेरिका ने अपनी गलती सुधारने के लिए ओसामा बिन लादेन को 2011 में मार दिया.

इसी तरह ISIS के जन्म के पीछे भी अमेरिका का सबसे बड़ा हाथ था. अमेरिका के नेतृत्व में 2003 में इराक़ पर हुए हमले के दौरान.... बगदादी एक मस्जिद में मौलवी हुआ करता था. सद्दाम हुसैन के शासनकाल से ही बगदादी एक चरमपंथी जिहादी था. कट्टर चरमपंथ की ओर बगदादी का झुकाव...दक्षिणी इराक़ में स्थित कैंप बक्का में, चार साल तक अमेरिका की हिरासत में रहने के दौरान हुआ. दिसम्बर 2004 में, बगदादी को कैंप बक्का से low level prisoner बताकर छोड़ दिया गया. और बाद में इसी बगदादी ने इराक और सीरिया में लाखों लोगों का खून बहाया.

मूल बात ये है, कि चाहे अल कायदा हो या ISIS, दोनों ही Geo Politics यानी वैश्विक राजनीति का नतीजा हैं. ऐसे संगठनों की फंडिंग वहाबी विचारधारा को बढ़ावा देने वाले सऊदी अरब के संगठनों से होती है. अमेरिका जैसा देश Sanctions वाला राजनीतिक खेल खेलता है और कहता है, कि ईरान से तेल मत खरीदो. और मजबूरी में दुनिया को सऊदी अरब के पास जाना पड़ता है. और फिर इन परिस्थितियों में जो पैसा कमाया जाता है, उसी पैसे से निर्दोष लोगों की हत्या कर दी जाती है.

ISIS और अलकायदा जैसे संगठनों के लिए उन देशों में अपना प्रभाव बढ़ाना आसान होता है जो आंतरिक राजनीति के शिकार हों, जहां की सत्ता में गंठबंधन की मजबूरियां हों, जहां ऐसी अशांति हो जो अचानक गृहयुद्ध में बदल सकती हो.

इसीलिए पिछले कुछ समय से हम लगातार कह रहे हैं, कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर देश के हर नागरिक को एक साथ खड़े होना चाहिए. बिल्कुल उसी तरह जैसे श्रीलंका में हुआ. वहां गठबंधन की सरकार है. वहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री एक दूसरे को पसंद नहीं करते. आपस में उनके मतभेद हैं. इसी वजह से वहां पर सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक हुई. लेकिन, अब पूरा श्रीलंका, देश की सुरक्षा को मज़बूत करने की दिशा में काम कर रहा है.