Zee जानकारी : एक लॉक-तंत्र में तब्दील हो रहा दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका

अमेरिका को दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र माना जाता है। लेकिन अब अमेरिका एक लॉक-तंत्र में तब्दील हो रहा है। क्योंकि अमेरिका के नये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के दरवाज़ों पर लॉक लगा दिया है। अब अमेरिका एक ऐसा समाज बन रहा है जिसके दरवाज़े दूसरे देशों के लोगों के लिए बंद किए जा रहे हैं। सवाल ये है कि अमेरिका की ये तालाबंदी उसके हित में है या इससे अमेरिका का नुकसान होगा। और इससे भी बड़ी बात ये है कि अमेरिका का ये नया अवतार दुनिया पर किस तरह का असर डालेगा? 

Zee जानकारी : एक लॉक-तंत्र में तब्दील हो रहा दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका

नई दिल्ली : अमेरिका को दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र माना जाता है। लेकिन अब अमेरिका एक लॉक-तंत्र में तब्दील हो रहा है। क्योंकि अमेरिका के नये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के दरवाज़ों पर लॉक लगा दिया है। अब अमेरिका एक ऐसा समाज बन रहा है जिसके दरवाज़े दूसरे देशों के लोगों के लिए बंद किए जा रहे हैं। सवाल ये है कि अमेरिका की ये तालाबंदी उसके हित में है या इससे अमेरिका का नुकसान होगा। और इससे भी बड़ी बात ये है कि अमेरिका का ये नया अवतार दुनिया पर किस तरह का असर डालेगा? 

अमेरिका के नए राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने 7 मुस्लिम देशों से आने वाले शरणार्थियों और नागरिकों को वीज़ा देने पर पाबंदी लगा दी है। डॉनल्ड ट्रंप ने जिस आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं। उसके मुताबिक अगले 120 दिनों तक अमेरिका में किसी भी शरणार्थी को प्रवेश नहीं मिलेगा चाहे वो किसी भी देश का हो।  सीरिया से आने वाले शरणार्थियों पर ये प्रतिबंध अनिश्चित समय के लिए लागू किया गया है। इतना ही नहीं अगले 90 दिनों तक सीरिया, ईरान, इराक, सोमालिया, सूडान, लीबिया और यमन के किसी भी नागरिक को अमेरिका में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। चाहे उसके पास अमेरिका का ग्रीन कार्ड ही क्यों ना हो। 

यहां आपको बता दें कि जिन गैर-अमेरिकी लोगों को ग्रीन कार्ड दिया जाता है वो असीमित समय तक अमेरिका में रह सकते हैं और काम कर सकते हैं। लेकिन ट्रंप के इस नए आदेश के बाद से इन सात मुस्लिम देशों से अमेरिका आने वाले लोग अमेरिका के अलग-अलग एयरपोर्ट्स पर फंस गए हैं। कई लोगों को अमेरिका जाने वाले विमानों में बैठने ही नहीं दिया जा रहा है। और जो लोग अमेरिका पहुंच चुके हैं उन्हें गहन जांच के बाद ही अमेरिका में प्रवेश दिया जा रहा है। वैसे इन 7 देशों के राजनयिकों पर ये प्रतिबंध लागू नहीं होगा। ट्रंप के इस आदेश की पूरी दुनिया में आलोचना हो रही है। और अमेरिका में भी कई समूह इन आदेशों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। 

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि रिफ्यूजी को रोककर और सात देशों के नागरिकों पर यात्रा प्रतिबंध लगाकर अमेरिका आतंकवाद के खतरे को कम करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका की कूटनीति में आए इस सबसे बड़े बदलाव पर हमने अमेरिका में रहने वाले कई विशेषज्ञों से फोन पर बात की है। और इस बातचीत के दौरान एक दूसरा पहलू भी सामने आया है और वो ये है कि जिन देशों के नागरिकों पर यात्रा प्रतिबंध लगाया गया है उन देशों की सुरक्षा एजेंसियां अमेरिका जाने वालों की ठीक से जांच नहीं कर पाती हैं और ऐसे में कई बार संदिग्ध लोग भी अमेरिका पहुंच जाते हैं। और इसी को रोकने के लिए इन देशों को प्रतिबंधित सूची में डाला गया है। इसके अलावा अमेरिका ने शरणार्थियों को प्रवेश देने की सीमा को भी 1 लाख से घटाकर 50 हज़ार कर दिया है। यानी अब अमेरिका में हर साल सिर्फ 50 हज़ार शरणार्थियों को ही शरण मिलेगी। लेकिन हैरानी की बात ये है कि जिन देशों के लोगों पर यात्रा प्रतिबंध लगाया गया है उनमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब शामिल नहीं है। जबकि अमेरिका में 2001 में हुए 9/11 हमले के लिए ज़िम्मेदार ज़्यादातर हमलावर सऊदी अरब, लेबनान और इजिप्ट से थे। 

मुस्लिम देशों के लोगों पर यात्रा प्रतिबंध लगाने का विचार डोनल्ड ट्रंप को पहली बार वर्ष 2015 में आया था। उन्होंने ये विचार San Bernar-dino में हुए आतंकवादी हमले के बाद दिय़ा था। इस आतंकवादी हमलें में 14 लोग मारे गए थे और इस हमले को सैय्यद रिज़वान फारूख नामक हमलावर और उसकी पत्नी तशफीन मलिक ने अंजाम दिया था। 

सैय्यद का जन्म अमेरिका में हुआ था, लेकिन उसके माता-पिता पाकिस्तान से अमेरिका आए थे, जबकि उसकी पत्नी तशफीन का जन्म भी पाकिस्तान में हुआ था और उसकी पढ़ाई लिखाई भी वहीं हुई थी। जून 2016 में अमेरिका के ऑरलैंडो में भी एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। इस हमले में 49 लोग मारे गए थे। इस हमले को मतीन नामक आतंकवादी ने अंजाम दिया था। मतीन का जन्म अमेरिका में हुआ था लेकिन उसके माता-पिता अफगानिस्तान से अमेरिका आए थे। जांच में पता लगा था कि मतीन भी आईएसआईएस का समर्थक था। 

लेकिन ये सब जानने के बाद भी डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी अरब, लेबनान या इजिप्ट के नागरिकों पर यात्रा प्रतिबंध नहीं लगाया है। हालांकि ट्रंप प्रशासन का दावा है कि प्रतिबंधित किए गए देशों की लिस्ट में पाकिस्तान का नाम जोड़ने पर विचार हुआ था, लेकिन फिर ऐसा किया नहीं गया। वैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान और सऊदी अरब से अमेरिका जाने वाले लोगों की अब पहले के मुकाबले ज्यादा कड़ी जांच होगी। लेकिन इन देशों पर प्रतिबंध नहीं लगाकर ट्रंप ने अपने विरोधियों को मौका दे दिया है। क्योंकि जिन देशों पर प्रतिबंध लगाया गया है उनके नागरिक अमेरिका में हुए किसी भी आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।

ट्रंप के इस फैसले का विरोध अमेरिका की बड़ी कंपनियां और CEOs भी कर रहे हैं। अमेरिका की एक बड़ी कॉपी शॉप चेन स्टारबक्स ने कहा है कि वो अगले 5 वर्षों में 10 हज़ार रिफ्यूजी को भर्ती करेंगी। अमेरिका की एक वित्तीय संस्था गोल्डमैन सैश ने कहा है कि ट्रंप की नीतिया ऐसी नहीं है जिनका समर्थन किया जाए।

जबकि गूगल ने शरणार्थी संकट से निपटने के लिए 2 मिलियन डॉलर्स का फंड बनाने का ऐलान किया है और ये भी कहा है कि उसके कर्मचारी भी 2 मिलियन डॉलर्स डोनेशन के रूप में जमा करेंगे। इसी तरह एप्पल के CEO टिम कुक ने कहा है कि उनकी कंपनी ट्रंप की नीतियों का समर्थन नहीं करती। एप्पल की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि अगर प्रवासी ना होते तो एप्पल जैसी कंपनी का अस्तित्व भी ना होता। इंटरनेट पर मनोरंजन की सुविधा देने वाली कंपनी नेटफ्लिक्स ने इसे 'अन अमेरिकन एक्शन' कहा है। यानी एक ऐसा कदम जिसे अमेरिकी नहीं माना जा सकता।

दुनिया भर के विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप की नीतियों का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। लेकिन दुनिया के परमाणु वैज्ञानिक ट्रंप को विनाश की वजह मानने लगे हैं। दुनिया भर के परमाणु वैज्ञानिकों ने विनाश की घड़ी यानी 'डूम्सडे क्लॉक' को आधी रात से सिर्फ ढाई मिनट पीछे सेट कर दिया है। वैज्ञानिकों की भाषा में जब इस घड़ी में रात के 12 बजेंगे तब दुनिया का विनाश हो जाएगा। और वैज्ञानिकों के मुताबिक अब इसमें सिर्फ ढाई मिनट का वक्त बचा है। जबकि पिछले वर्ष ये घड़ी विनाश के समय से 3 मिनट पीछे थी। 

अमेरिका के शिकागो में स्थित एक संस्था हर साल इस घड़ी के वक्त में बदलाव करती है। इस संस्था का नाम है 'बुलेटिन ऑफ द एटमिक साइंटिस्ट्स' और ये संस्था दुनिया भर में हो रहे घटनाक्रम को आधार बनाकर घड़ी की सुइयों को आगे या पीछे करती हैं। पिछले 64 वर्ष में इस घड़ी की सुईयां विनाश वाले वक्त के सबसे ज्यादा करीब हैं। 'डूम्सडे क्लॉक' की शुरुआत 1953 में अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच चल रहे शीत युद्ध के दौरान हुई थी। उस वक्त अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ गया था। लेकिन अब एक बार फिर दुनिया परमाणु युद्ध की तरफ बढ़ रही है। 'बुलेटिन ऑफ द एटमिक साइंटिस्ट्स' का मानना है कि ट्रंप के आने से परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ गया है। ट्रंप कई बार साफ कर चुके हैं कि नॉर्थ कोरिया से निपटने के लिए जापान और साउथ कोरिया को परमाणु संपन्न बनाना होगा। इसके अलावा भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव भी परमाणु युद्ध की वजह बन सकता है।

कुल मिलाकर दुनिया एक अनिश्चितता से भरे माहौल में प्रवेश कर रही है। जहां युद्ध की मार झेल रहे लोगों के पास सिर छिपाने की जगह नहीं है..और दुनिया के तमाम देश अपना सिर ऊंचा करने के लिए दूसरे को बर्बाद करने की धमकियां देने से नहीं चूक रहे।