दक्षिण भारत के इस मंदिर में अदृश्य है शिवलिंग, दिखता है केवल 16 फीट ऊंचा घी का टीला

 Sawan Lord Shiva Pooja Vadakunatha Shivling Trishoor: स्थानीय भाषा में वडकु का अर्थ उत्तर होता है. इस तरह मंदिर के नाम का अर्थ हुआ उत्तर के नाथ. यानि यह मंदिर दक्षिण के केदारनाथ और अमरनाथ के रूप में पूजित है.

Written by - Vikas Porwal | Last Updated : Aug 3, 2021, 09:28 AM IST
  • केरल के त्रिशूर जिले में वडकुनाथ मंदिर का ज्ञात इतिहास 1000 साल पुराना है
  • इस मंदिर के संरक्षण के लिए यूनेस्को का उत्कृष्टता पुरस्कार-2015 भी मिला है
दक्षिण भारत के इस मंदिर में अदृश्य है शिवलिंग, दिखता है केवल 16 फीट ऊंचा घी का टीला

नई दिल्लीः Sawan Lord Shiva Pooja Vadakunatha Shivling Trishoor: सावन के इस पावन माह में बाबा भोलेनाथ के भक्त उनकी भक्ति में डूबे हुए हैं. कोरोना के कारण कांवड़ यात्रा नहीं निकाली गई है, ऐसे में शिवभक्त, आस-पास के शिवालयों में जल चढ़ाकर ही उनकी आराधना कर रहे हैं. भारत में देश में कई मंदिर ऐसे हैं जो चमत्कारों से भरे पड़े हैं.

ऐसा ही एक मंदिर दक्षिणभारत में है. भगवान शिव के इस मंदिर की दिलचस्प बात यह है कि यहां शिवलिंग दिखाई ही नहीं देता है. जिसे लोग वडकुनाथ मंदिर धाम के नाम से जानते हैं. 

त्रिशूर जिले में है वडकुनाथ मंदिर
भारत के मानचित्र में दक्षिण की ओर बसा राज्य है केरल. धार्मिक दृष्टिकोण से इसे भगवान का अपना घर कहा जाता है. पौराणिक मान्यताओं में इसे पाताल लोक की संज्ञा भी दी जाती है, क्योंकि दैत्य बलि यहीं का राजा था और वामन अवतार में श्रीहरि ने उसे पाताल लोक भेज दिया था. इसी केरल राज्य में एक जिला है त्रिशूर.

मान्यता है कि यह स्थल भगवान शिव के त्रिशूल की तीसरी नोंक पर स्थित है. यही वजह कि इसे त्रिशूर कहा गया. भगवान शिव की अपनी नगरी होने के कारण त्रिशूर में उनकी बहुत मान्यता है और कहा जाता है कि उनके पुत्र कार्तिकेय ने यहां शिव आराधना की थी. 

शिवलिंग का होता है घी से अभिषेक
उन्होंने ही यहां शिवलिंग स्थापित कर उसे वडकुनाथ कहा था. स्थानीय भाषा में वडकु का अर्थ उत्तर होता है. इस तरह मंदिर के नाम का अर्थ हुआ उत्तर के नाथ. यानि यह मंदिर दक्षिण के केदारनाथ और अमरनाथ के रूप में पूजित है. ऐसा मानने के पीछे भी एक दिलचस्प वजह है.

दरअसल, यहां धार्मिक परंपरा के अनुसार शिवलिंग का घी से अभिषेक किया जाता है. घी से अभिषेक करने की इस परंपरा को केरल में नइयाभिषेकम् कहा जाता है. 

इसलिए नहीं दिखता है शिवलिंग
हजारों सालों से लगातार घी से हो रहे अभिषेक का यह असर रहा है कि शिवलिंग पूरी तरह घी से ढक गया है और सदियां बीत गईं, लेकिन इसे किसी ने देखा ही नहीं है. पूरी तहर घी से ढंके होने के कारण शिवलिंग दिखाई नहीं देता. घी की एक मोटी परत हमेशा इस विशाल शिवलिंग को ढंकी रहती है. यह एकमात्र मंदिर है जहां शिवलिंग दिखाई नहीं देता. भक्तों को यहां केवल 16 फीट उंचा घी का टीला ही नजर आता है. यह बर्फ से ढंके कैलाश पर्वत और बर्फ से बनने वाली अमरनाथ गुफा शिवलिंग का भी प्रतिनिधित्व करता है. 

इस मंदिर में नहीं हैं चीटियां
ऐसा माना जाता है कि यहां चढ़ाने वाले घी में कोई गंध नहीं होती और यह गर्मियों के दौरान भी पिघलता नहीं है. मंदिर में एक रहस्य और भी है. स्थानीय निवासी बताती हैं कि मंदिर परिसर में एक भी चींटियां नहीं हैं. जबकि घी, मिष्ठान्नन, प्रसाद आदि की वजह से इस मंदिर में चींटियों का पाया जाना कोई बड़ी बात नहीं होती, लेकिन ऐसा नहीं है और यही बात श्रद्धालुओं-तीर्थयात्रियों को और भी अपनी ओर खींचती है. 

भगवान परशुराम ने की थी स्थापना
केरल स्थित इस मंदिर के निर्माण और सबसे पहले पुजारी के रूप में भगवान परशुराम का नाम आता है. ब्रह्मांड पुराण में इस कथा का जिक्र आता है. इसके मुताबिक, पृथ्वी से 21 बार क्षत्रियों का विनाश करने और अपने पिता जमदग्नि की हत्या का बदला ले लेने के बाद विष्णु के अवतारी परशुराम का मन क्षोभ से भर गया. उन्होंने एक बड़ा यज्ञ करके सारी पृथ्वी और महादेव शिव को दान कर दी और इस तरह धरती पर उनका कोई अधिकार नहीं रह गया. 

तब उन्होंने तपस्या और अनुष्ठान के लिए कुछ भूमि मांगी. महादेव ने वरुण देव से इसके लिए कह दिया. वरुण देव परशुराम का सागर तट पर ले गए और कहा, यहां जितनी भूमि चाहिए, आप ले लीजिए समुद्र पीछे हट जाएगा. तब परशुराम ने अपना फरसा उठा कर फेंका. वह फरसा जहां गिरा, जल उसके पीछे तक लौट गया. यही स्थान आज का केरल है. तपस्या की शुरुआत के लिए भगवान परशुराम ने ही त्रिशूर में मंदिर बनवाया और आज यह मंदिर भारत की सांस्कृतिक परंपरा का धरोहर है. 

यूनेस्को ने दिया उत्कृष्टता पुरस्कार-2015
बात धरोहर की हो रही है तो इस पर भी निगाह डाल लेते हैं. अभी हाल ही में यूनेस्को ने कर्नाटक के रामप्पा मंदिर और हड़प्पा सभ्यता की पहचान वाले शहर धोलावीरा को विश्व विरासत स्थल के तौर पर मान्यता दी है. वडकुनाथ मंदिर को यह श्रेय 2015 में ही मिल चुका है.

भारत के वडक्कुनाथन मंदिर के संरक्षण के लिए यूनेस्को का उत्कृष्टता पुरस्कार-2015 में दिया गया था. यह मंदिर वर्षों पुरानी परंपराओं तथा वास्तु शास्त्र से प्राप्त संरक्षण की तकनीकों को समेटे हुए है. 

आदि शंकराचार्य के माता-पिता ने यहीं की थी पूजा
इस मंदिर के साथ एक और सनातनी गौरव भी जुड़ा हुआ है. त्रिशूर महाभारतकालीन शहर है. यह वही मंदिर है जहां आदि शंकराचार्य के माता- पिता ने संतान प्राप्ति के लिए अनुष्ठान किये थे. वडकुनाथन मंदिर के आसपास कभी कई एकड़ में फैला घना सागौन का जंगल हुआ करता था. 

कोचीन रियासत से जुड़ा इतिहास
मंदिर का आधुनिक इतिहास कोचीन रियासत से जुड़ा है. भूतपूर्व कोचिन रियासत के महाराजा राम वर्मा (1790 – 1805) के समय त्रिशूर रियासत की राजधानी भी रही थी. नगर के मध्य में 9 एकड में फैले ऊंचे परकोटे वाला यह विशाल शिव मंदिर उन्होंने ही बनवाया था. इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर कभी एक पूर्व द्रविड़ कवू (देव स्थल) था. बाद में यह मंदिर छठी शताब्दी के बाद अस्तित्व में आए नए धर्म संप्रदायों के प्रभाव में आया, जिसमें बौद्ध धर्म, जैन धर्म और वैष्णववाद शामिल थे.

1000 साल पुराना है ज्ञात इतिहास
केरल के त्रिशूर जिले में स्थित इस मंदिर का ज्ञात इतिहास 1000 साल पुराना है. इसे टेंकैलाशम और तमिल भाषा में ऋषभाचलम् भी कहते हैं. यह देवस्थल केरल के सबसे पुराने और उत्तम श्रेणी के मंदिरों में गिना जाता है. यह स्थान उत्कृष्ट कला और वास्तु कला के लिए प्रसिद्ध है, जो केरल की प्राचीन शैली को भी दर्शाता है. यह मंदिर लगभग 9 एकड़ के क्षेत्र में फैला हैं.

मंदिर शहर के केंद्र में एक ऊंचे पहाड़ी इलाके पर स्थित है. यह प्राचीन मंदिर विशाल पत्थर की दीवारों से घिरा हुआ है. इस मंदिर के चारो दिशा में प्रवेश द्वार बनवाये गए है जिन्हें स्थानीय भाषा में गोपुरम कहा जाता है. आंतरिक मंदिर और बाहरी दीवारों के बीच, एक बड़ा खुला भाग है.

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अनापुरम महोत्सव है वार्षिक आयोजन
इस मंदिर में मुरल शैली में महाभारत के चित्र बनवाये गए है जिनमें वासुकीशयन की प्रतिमा भव्यता के साथ दिखाई देती है. इसी मंदिर में एक संग्रहालय है जिसमे बहुत सारी पुरानी पेंटिंग, लकड़ी पर बनाये हुए नक्काशी और बहुत कुछ पुरानी चीजें देखने को मिलती है. वडक्कुनाथन मंदिर में हर वर्ष आनापुरम महोत्सव आयोजित किया जाता है जिसमें हाथियों को खाना खिलाया जाता है.

इस महोत्सव की शुरुआत सबसे छोटे हाथी को भोजन देकर हाथियों का भोज शुरू किया जाता है. यहां उन्हें उन्हें गुड़, घी और हल्दी के साथ मिला चावल खाने को दिए जाते हैं. साथ ही भोजन में नारियल, गन्ना, केले और ककड़ी भी शामिल होते हैं. 

ऐसे पहुंचे इस मंदिर
वडकुनाथ मंदिर पहुंचने के लिए आप परिवहन के तीनों मार्गों से पहुंच सकते हैं. यहां का नजदीकी हवाईअड्डा कोच्चि एयरपोर्ट है. सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन त्रिशूर रेलवे स्टेशन हैं. सड़क मार्ग से भी यह जगह अच्छी तरह जुड़ी है. केरल से त्रिशूर की 84 किमी है. त्रिशूर रेलवे स्टेशन से यह मंदिर कुछ ही दूर स्थित है. 

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