भारत ही नहीं दुनिया के 20 बड़े देश भी प्रदूषण से परेशान

दिल्ली का दम घुट रहा है. प्रदूषण आतंकवाद से भी ज्यादा खतरा बन चुका है. देश की 60 करोड़ आबादी परेशान है. देश की राजधानी दिल्ली सहित पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश और बिहार के कुछ हिस्से जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं. लेकिन मात्र हम ही नहीं दुनिया के 20 बड़े देश भी इस जानलेवा प्रदूषण से जूझ रहे हैं. इस जानलेवा समस्या का कारण है हमारा विकास का मॉडल.

भारत ही नहीं दुनिया के 20 बड़े देश भी प्रदूषण से परेशान

नई दिल्ली: 2015 का दौर याद होगा आपको जब भारत ने गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर के दिन पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर कर उसके शर्तों को स्वीकार किया था. फिर 2017 में अमेरिका में चुनाव हुए और राष्ट्रपति चुनकर आए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प. ट्रम्प ने अपने से पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के पेरिस समझौते को नकार दिया और उससे पीछे हट गए. आपको लग रहा होगा इन सब उद्हारणों की अभी क्या जरूरत. जरूरत है. हाल ही में जी-20 देशों की प्रायोजित एक गैर-लाभकारी संस्था New Brown to Green ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें यह पाया गया कि विश्व की 20 सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था सिर्फ आर्थिक आधार पर ही नहीं बढ़ रहीं हैं बल्कि प्रदूषण बढ़ाने में भी उसी गति से बढ़ रही हैं. और क्योंकि भारत भी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से है, तो वह इस रिपोर्ट में पीछे कैसे रह सकता है. 

पेरिस समझौते का लक्ष्य क्या हो पाएगा पूरा ?

न्यू ब्राउन टू ग्रीन रिपोर्ट में कहा गया कि इन तेजी से बढ़ते 20 देशों में कार्बन उत्सर्जन भी उतनी ही तेजी से बढ़ा है. विकास की दौड़ में लगे सभी देश औद्योगिकरण की तरकीब अपना रहे हैं. यहीं औद्योगिकरण बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन को पैदा कर रहा है. अब यह एक बड़ी समस्या पर्यावरण के हिसाब से तो हैं ही लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देशों की प्रतिबद्धता का भी सवाल है. दरअसल, जिस पेरिस समझौते का जिक्र बार-बार किया जाता है, असल में उसमें हर देश की यह जिम्मेदारी थी कि 2030 तक तीस फीसदी कार्बन उत्सर्जन को कम किया जाएगा. और इससे क्या होगा ? इससे होगा यह कि कार्बन की मात्रा पर्यावरण में कम होने से वैश्विक ताप में कम से कम 1.5 डिग्री सेल्सियस की कमी आएगी. 

तत्काल प्रभाव से जुट जाएं देश 

अब यह टारगेट जरा दूर होता दिख रहा है. जी-20 देशो की ओर से प्रकाशित 2019 की रिपोर्ट में यह तय किया गया है कि 2030 तक कार्बन कट की जो बात कही गई थी, वह इस रिपोर्ट के बाद अधर में लटकी दिखने लगी है. देशों को अब यह लक्ष्य तत्काल प्रभाव से 2020 से ही शुरू कर देना होगा. जी-20 देशों ने न्यू ब्राउन टू ग्रीन रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अब देशों को 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान घटाने के लक्ष्य को पाने के लिए ज्यादा कार्बन उत्सर्जन घटाना होगा, वो भी तत्काल प्रभाव से. 

अक्षय ऊर्जा इस्तेमाल अब भी काफी कम

रिपोर्ट के कुछ बिंदुओं में कहा गया है कि 2018 में ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उतनी ही ज्यादा मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन किया गया. पिछले साल तकरीबन कार्बन उत्सर्जन में तकरीबन 1.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. रिपोर्ट में कुछ सलाह भी दिए गए जिसमें यह कहा गया कि अब भी अक्षय ऊर्जाओं का मात्र 25 फीसदी हिस्सा ही उपयोग में लाया जा रहा है, ऐसे में कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को हासिल कर पाना संदेहास्पद लगता है. 

अग्रणी देश भारत भी हो रहा है फेल

भारत पेरिस समझौते पर अपनी सहमति जताने वाले उन अग्रणी देशों में रहा है जिसने Nationally determined contributors यानी कि वैसे राष्ट्रों में शामिल है जिनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही अन्य देशों से ज्यादा है. लेकिन भारत की राजधानी दिल्ली में हाल ही में प्रदूषण की वजह से पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी लग जाना और फिर इसके बाद रिपोर्टों में यह राज खुलना कि यहां भी कार्बन उत्सर्जन कम नहीं हुआ है. भारत में तमाम मुहिमों और योजनाओं के बाद असल में अब जमीनी स्तर पर काम करने की जरूरत है. जिन जी-20 देशों की सूची में भारत खड़ा है जो कार्बन उत्सर्जन में अग्रणी देश बने बैठे हैं, उनमें भारत में अब भी अक्षय ऊर्जा के प्रयोग काफी अच्छी नहीं है. बल्कि ब्राजील और जर्मनी ने तो अक्षय ऊर्जा के लिए नीतिगत काम करने भी शुरू कर दिए हैं. भारत और चीन जैसे तेजी से बढ़ते देशों को इस कार्बन उत्सर्जन का खास ख्याल रखना होगा.