झारखंड में भाजपा ने सरयू राय समेत कई बागियों को दिखाया बाहर का रास्ता

भाजपा ने झारखंड में अपने ही खिलाफ काफी बागी नेता खड़े कर लिए हैं. उनमें से सबसे प्रमुख बागियों में एक नाम है पार्टी के पुराने सारथी सरयू राय का. सरयू राय ने पार्टी से इतनी बगावत कर दी थी कि आखिरकार भाजपा ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है. 

झारखंड में भाजपा ने सरयू राय समेत कई बागियों को दिखाया बाहर का रास्ता

रांची:  सरयू राय झारखंड में भाजपा के पुराने सहयोगियों में से एक हैं जिन्होंने झारखंड में पार्टी का बेस तैयार करने में मदद की है. सरयू राय का पार्टी के आलाकमान के साथ विवाद उन्हें ऐसे हाल में लेकर आया कि पार्टी ने उन्हें आधिकारिक तौर पर निष्कासित कर दिया. उनके अलावा पार्टी ने ताला मरांडी, शालिनी गुप्ता और अमित यादव को भी भाजपा से निकाल दिया है. सरयू राय झारखंड की राजनीति में एक ऐसा नाम है जो प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ हमेशा से मुखर हो कर बोलता आया हो. सरयू राय ने रघुबर दास सरकार की जो हर मोर्चे पर भ्रष्टाचारी के खिलाफ खड़ा रहने वाली सरकार के रूप में पेश करते हैं, उनका मुखर हो कर विरोध किया है. न सिर्फ प्रदेश के मुख्यमंत्री बल्कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी सरयू राय के बगावती तेवर से खासे नाराज हैं. 

पार्टी के खिलाफ खोला मोर्चा तो दिखाया बाहर का रास्ता

झारखंड चुनाव के पहले जब उम्मीदवारों के नाम की घोषणा सिलसिलेवार ढ़ंग से सीट के हिसाब से हो रही थी तो पार्टी ने सरयू राय का टिकट काटा. सरयू राय को जमशेदपुर पश्चिमी से टिकट नहीं दिया गया. गृहमंत्री अमित शाह ने तो यहां तक कह दिया कि सरयू राय को टिकट न देने के पीछे वे कई तर्क दे सकते हैं.

फिर क्या था सरयू राय ने पार्टी लाइन से इतर हो कर अपने ही मुखिया रघुबर दास की आलोचना भी खुलकर शुरू कर दी और इतना ही नहीं अपनी पारंपरिक सीट से तो निर्दलीय लड़े ही साथ ही रघुबर दास के खिलाफ जमशेदपुर पूर्वी से भी दावा ठोंक दिया. सरयू राय क्योंकि पार्टी के रसूखदार नेताओं में से हैं तो उनके पार्टी से नाराज हो जाने के कारण अन्य नेताओं के भी मोहभंग होने शुरू हो गए हैं. 

नीतीश कुमार के काफी नजदीकी हैं सरयू राय

वहीं दूसरी ओर सरयू राय के निकटतम एनडीए के सहयोगी दल जदयू के मुखिया नीतीश कुमार ने इशारों में ही नाराजगी जाहिर कर दी. उन्होंने कहा कि सरयू राय को टिकट न मिलने से सबसे अधिक हैरानी उन्हें हुई है. सीएम नीतीश कुमार और सरयू राय इतने करीबी नेता हैं कि जब 10 साल पहले झारखंड विधानसभा चुनाव में सरयू राय की हार हो गई थी तो मुख्यमंत्री न उन्हें बिहार आने का न्योता दे दिया था. लेकिन वे उस वक्त तक भाजपा को छोड़ने के मूड में नहीं थे. 

जेपी आंदोलन के बाद बड़े नेताओं में गिने जाते हैं सरयू 

अब आखिर ऐसा क्या है कि सरयू राय की गृहमंत्री अमित शाह के साथ नहीं जम रही और सीएम नीतीश कुमार को इतना प्रेम है. दरअसल, बिहार के मुखिया नीतीश कुमार और सरयू राय छात्र जीवन से ही एक साथ काम करते आए हैं. जेपी आंदोलन के बाद के नेताओं में से इनकी भी गिनती होती है. सरयू राय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता रहे हैं और जेपी आंदोलन के बाद मुख्य रूप से दो कारणों से खूब चर्चा में आए. पहला तो बिहार की राजधानी पटना में जेपी की मूर्ति लगवाने के लिए, वह भी कांग्रेस सरकार में. जो उस वक्त तक सरकार को चुनौती देने वाला माना जाता था. 

झारखंड में भाजपा के संकटमोचक रहे हैं सरयू राय

इसके अलावा कोऑपेरिटव माफियाओं का जमकर विरोध करने और उनके खिलाफ खड़ा होने वाले कुछ चंद नेताओं में से रहे हैं. सहकारिता माफिया के भ्रष्ट कामों के खिलाफ सरयू राय ने आवाज उठानी शुरू की तो कांग्रेस की सरकार ने उनको घेरना शुरू कर दिया था. इतना ही नहीं झारखंड में भाजपा की सरकार सबसे पहले सरयू राय सरीखे नेताओं ने ही मरांडी सरकार बनवाई. 2000 के पहले बिहार के राजनीति में अपनी साफ छवि बनाने वाले सरयू राय ने प्रदेश में इतनी सरकारें देखी जो भ्रष्टाचार में संलिप्त रही, लेकिन कभी किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के केस में उनका नाम नहीं आया. बल्कि हर सरकार में वे भ्रष्टाचार के मुखर विरोधी ही रहे. 

झारखंड में सरयू राय को भाजपा का संकटमोचक कहा जाता है. हालांकि झारखंड की राजनीति में उनकी सक्रियता प्रदेश बनने के पहले से ही रही लेकिन आधिकारिक रूप से वे 2005 के विधानसभा चुनाव में ही उतरे और जीते भी. 

इसके बाद से जमशेदपुर पश्चिमी उनकी पारंपरिक सीट बनते चली गई. अब आधिकारिक रूप से वे भाजपा से निष्कासित कर दिए गए हैं. जमशेदपुर पश्चिमी से निर्दलीय उतरने वाले सरयू राय ने जमशेदपुर पूर्वी से भी रघुबर दास के खिलाफ ही पर्चा भर दिया है. अब ऐसे में पार्टी को कुछ न कुछ फैसला तो लेना ही था.