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हरियाणा में अमित शाह ने एक तीर से साधे 5 निशाने

भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति का चाणक्य उन्हें यूं ही नही कहा जाता है. उन्होंने दुष्यंत चौटाला के सामने हरियाणा का डिप्टी सीएम पद प्रस्तावित करके एक तीर से पांच निशाने साधे हैं. उनके इस एक कदम से भाजपा को पांच फायदे होंगे-

हरियाणा में अमित शाह ने एक तीर से साधे 5 निशाने
हरियाणा में भाजपा की सधी हुई चाल

नई दिल्ली: चुनाव परिणामों के बाद से हरियाणा की राजनीति पर असमंजस की जो छाया मंडरा रही थी, वह अब खत्म हो गई है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक प्रेस कांफ्रेन्स करके घोषणा कर दी कि हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे और जननायक जनहित पार्टी  के हिस्से में उप मुख्यमंत्री का पद आएगा. लेकिन ये फैसला ऐसे ही नहीं ले लिया गया. ऐसा करके भाजपा ने पांच अहम लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. 

1. हरियाणा में फिर से सरकार का गठन करना
हरियाणा में चुनाव परिणाम आने के बाद से ही मनोहर लाल खट्टर पर सवाल खड़े किए जाने लगे थे. पूर्ण बहुमत से कम 40 सीटें आने को भाजपा विरोधी जनादेश बताकर विरोधी पूरी भाजपा पर निशाना साध रहे थे. लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा करते हुए ये साबित कर दिया कि उनके फैसले इतनी आसानी से नहीं बदलते. पर्दे के पीछे क्या हुआ कोई नहीं जानता. लेकिन खट्टर को फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपकर भाजपा ने उन्हें पार्टी से वफादारी का ईनाम जरुर दिया है. लेकिन इस बार मनोहर लाल खट्टर को जजपा के उप मुख्यमंत्री के साथ काम करना होगा. 


अमित शाह ने किस तरह हरियाणा में फिर से भाजपा सरकार बनाने की घोषणा की. यह देखने के लिेए यहां क्लिक करें. 

2. जाट वोट बैंक को फिर से साधा
जजपा का उप मुख्यंमत्री बनाने की घोषणा करके भाजपा ने हरियाणा की हरियाणा की कुल आबादी में एक तिहाई जाट वोट बैंक का दिल जीत लिया है. चौटाला परिवार दशकों से जाट राजनीति की ''चौधर'' अपने पास रखता है. इस परिवार में देवीलाल के पड़पोते दुष्यंत चौटाला ने अपनी ताकत को स्थापित करते हुए ''चौधर'' की पगड़ी हासिल की है. वह युवा जाटों के रोल मॉडल हैं. उनकी पार्टी का उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा करके अमित शाह ने जाटों को एक बार फिर अपने पाले में खींचने में सफलता हासिल की है. जाट पिछले कुछ समय से भाजपा से नाराज चल रहे थे. इसलिए उन्हें मनाना पार्टी के लिए बेहद जरुरी भी था. 


जाटों का भाजपा के पक्ष में आना पड़ोसी राज्य दिल्ली में भी भाजपा की राजनीति की दिशा बदल सकता है. क्योंकि दिल्ली में 25 लाख जाट मतदाता हैं और यहां दो महीने में ही चुनाव होने वाले हैं. 

3. युवा और उर्जावान दुष्यंत को एनडीए के पाले में खींचा
जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला ने 31 साल की बहुत कम उम्र में बड़ी सफलता हासिल की. उन्होंने पारिवारिक झगड़े से जूझते हुए हरियाणा की जाट राजनीति की विरासत हासिल की है. उनकी छवि जुझारु होने के साथ साथ बौद्धिक भी है. उनके नाम देश के सबसे कम उम्र के सांसद होने का रिकॉर्ड है. सिर्फ 28 साल की उम्र में वह सांसद बने थे और संसद की 191 चर्चाओं में शामिल रहे थे. दुष्यंत इतने सक्रिय सांसद रहे हैं कि उन्होंने अपने 5 साल के सांसद के तौर पर कार्यकाल में 582 प्रश्न पूछ लिए. 


अपने स्कूली जीवन में वह मुक्केबाजी के स्वर्ण पदक विजेता हैं. वह अपनी बास्केटबॉल टीम के कप्तान और हॉकी टीम के गोलकीपर रहे हैं. उन्होंने कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में बैचलर की डिग्री हासिल की है. ऐसे में जाट राजनीति के युवा और एलीट चेहरे के तौर पर वह भाजपा के भविष्य की राजनीति के लिए बेहद कारगर साबित हो सकते हैं. उनके पास राजनीतिक पारी खेलने के लिए लंबा समय मौजूद है.

4. हरियाणा को कांग्रेस मुक्त बनाए रखा
हरियाणा में कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखकर भाजपा अध्यक्ष ने कांग्रेस मुक्त भारत के पीएम मोदी के लक्ष्य को बरकरार रखा. हरियाणा में एक तिहाई सीटें हासिल करके कांग्रेस दिग्गज भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने भाजपा के सामने चुनौती खड़ी करने की कोशिश तो जरुर की. लेकिन उनकी जोड़ तोड़ की कोशिशें ज्यादा समय तक नहीं चल पाईं. बीच में खबर यह भी आई कि कांग्रेस ने जजपा अध्यक्ष दुष्यंत चौटाला को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया है. लेकिन अपनी पार्टी के हिस्से में आए उप मुख्यमंत्री की कुर्सी से संतोष करते हुए भाजपा के साथ जाना उचित समझा. 
इससे कांग्रेस की हरियाणा की सत्ता बैकडोर से संभालने की कोशिश असफल रही. हरियाणा में कांग्रेस के अनुभवी नेता भूपेन्द्र सिंह हुड्डा को अगर एक भी मौका मिल जाता तो वह मनोहर लाल खट्टर पर भारी पड़ सकते थे. उन्हें अपनी पार्टी अध्यक्ष का भरोसा जीतने में काफी समय लग गया. अन्यथा उन्होंने हरियाणा में कांग्रेस को एक मजबूत ताकत के तौर पर स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. 

5. निर्दलीयों के दबाव से पाई मुक्ति
हरियाणा में सरकार बनाने से पहले भाजपा नेतृत्व ने बेहद शातिर चाल चली. उन्होंने पहले निर्दलीयों को साधा और उनका समर्थन हासिल कर लिया. गोपाल कांडा सहित 8 निर्दलीयों का समर्थन हासिल करने के बाद ही भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई थी. लेकिन फिर भी उसने जजपा को उप मुख्यमंत्री का पद देने का फैसला किया. क्योंकि वह निर्दलीय विधायकों के दबाव में नहीं आना चाहती थी. जिसमें से कई लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. इसकी तुलना में साफ सुथरी छवि और बड़े जनाधार वाले दुष्यंत चौटाला का साथ उसके लिए ज्यादा बेहतर रहेगा. 
गोपाल कांडा के भाजपा के बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा करने के बाद से ही विरोधी उनके खिलाफ चल रहे मामलों की याद दिलाते हुए भाजपा पर निशाना साध रहे थे. इसलिए भी भाजपा ने इस दबाव से निकलना बेहतर समझा. 


दरअसल पिछले दो दिनों में भाजपा ने बेहद सधी हुई चाल चली. पहले तो निर्दलीयों का समर्थन हासिल करके सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचकर भाजपा ने दुष्यंत को प्रभावित करके उनका समर्थन हासिल कर लिया. इसके बाद जेजेपी का समर्थन हासिल करके निर्दलीयों के दबाव से मुक्ति हासिल कर ली. अब निर्दलीय विधायक अपने पहले के स्टैण्ड के मुताबिक खट्टर सरकार का समर्थन तो करेंगे. लेकिन उससे किसी तरह की मांग करने की स्थिति में नहीं रहेंगे.