शिवसेना के इस 'कुर्सी प्रेम' से बढ़ सकती हैं उसकी राजनीतिक मुश्किलें! 'धर्मसंकट' में उद्धव

शिवसेना की मुख्यमंत्री के कुर्सी की चाहत कहीं उसकी राजनीति खतरे में ना डाल दे, क्योंकि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने उस दौर को अपने मोह के सामने दरकिनार कर दिया है. जिस वक्त अटल बिहारी वायपेयी और बाल ठाकरे मंच पर होते थे, तो उस समय उद्धव फोटोग्राफी किया करते थे.

शिवसेना के इस 'कुर्सी प्रेम' से बढ़ सकती हैं उसकी राजनीतिक मुश्किलें! 'धर्मसंकट' में उद्धव

नई दिल्ली: महाराष्ट्र की राजनीति का ये महा उलटफेर है, राज्य की सियासी जमीन का नक्शा ही बदलता नजर आ रहा है. ऐसा शिवसेना बीजेपी की 30 साल पुरानी दोस्ती टूटने की वजह से हुआ है. शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी से नाता तोड़ लिया है. अपनी राह पूरी तरह अलग कर ली है. पार्टी ने एनडीए से अलग होने का भी ऐलान कर दिया है.

शिवसेना का कुर्सी मोह

राज्य में अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए शिवसेना ने एनसीपी से हाथ मिलाने के बाद कांग्रेस का भी समर्थन हासिल कर लिया. शिवसेना नेताओं ने राज्यपाल से मुलाकात की, लेकिन ये कहना गलत नहीं होगा कि शायद ही किसी ने सोचा हो कि चुनाव के प्रचार के दौरान, जिस उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फड़नवीस ने एक दूसरे की जमकर तारीफ की थी. वही चुनाव बाद एक दूसरे पर निशाना साधेंगे.

24 अक्टूबर को जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के चुनावी नतीजे आए थे. तो भाजपा-शिवसेना गठबंधन को महाविजय मिली थी. तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि सरकार के फॉर्मूले पर दोनों दलों में दूरियां इस कदर बढ़ जाएंगी.

उद्धव ठाकरे ने दी दलील

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मीडिया के सामने आकर अपनी दुहाई पेश करनी शुरू कर दी है. उन्होंने भाजपा के आरोप का खंडन करते हुए कहा कि 'उन्होंने उसे झूठ कहा, ये इल्जाम मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा. पूरी दुनिया ये जानती है कि शिवसेना प्रमुख या उनके परिवार का कोई सदस्य कभी झूठ नहीं बोल सकता. अमित भाई से जब मेरी बात हुई थी कि एक ना एक दिन शिवसेना का हम मुख्यमंत्री बनाएंगे. ऐसा हमने पिताजी को वचन दिया है. अगर आपके साथ रहकर संभव है तो ठीक नहीं तो आपके बिना.'

भले ही उद्धव ठाकरे अपने ताजा रुख के पीछे बाला साहब ठाकरे के सपने को वजह बता रहे हों. लेकिन ये भी याद रखना चाहिए कि शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे ने कभी चुनाव नहीं लड़ा था. वे ना तो कभी मुख्यमंत्री बने और ना ही अपने परिवार के किसी सदस्य को ही सीएम की कुर्सी पर बिठाया. जबकि वो चाहते तो ऐसा कर सकते थे.

परंपरा को किया 'साइड लाइन'

बाल ठाकरे ने हमेशा हिन्दुत्व की राजनीति को मजबूत करने की बात की. समान विचारधारा की वो जमीन ही थी. जिस पर भाजपा और शिवसेना के गठबंधन की बुनियाद खड़ी हुई थी. लेकिन उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना अब अलग रंग में है. बदलाव की पहली झलक तो तभी मिली थी, जब उद्धव ठाकरे ने परिवार की परंपरा से अलग हटकर बेटे आदित्य ठाकरे को चुनाव मैदान में उतारा. और अब भाजपा के आधे-आधे कार्यकाल के लिए दोनों दलों के मुख्यमंत्री के फॉर्मूले से इनकार के बाद शिवसेना ने दोस्ती का द एंड कर दिया है.

आरोप है कि बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के वक्त वादा किया था कि विधानसभा चुनाव में गठबंधन की विजय के बाद महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री शिवसेना का होगा. भाजपा ने इसे झूठ करार दिया है. तो शिवसेना इसे वचन भंग बता रही है.

महाराष्ट्र में राजनीतिक धर्मसंकट

महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति एक बड़े धर्मसंकट का सबब बन गई है. जनता धर्मसंकट में है कि आखिर उसके जनमत का क्या हुआ. सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी धर्मसंकट में है कि अपने 30 साल पुराने सहयोगी दल के इस उलटफेर वाले दांव पर कैसे भड़ास निकालें. सरकार बनाने की राह पर आगे बढ़ रही शिवसेना अंदरखाने धर्मसंकट में है कि धुर विरोधी एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलाने पर उठनेवाले सवालों का क्या जवाब देगी.

 

हिंदुत्व के मुद्दे पर समान विचारों वाले दो दलों की दोस्ती का टूटना सिर्फ सियासत में एक मोड़ की तरह नहीं है. दरअसल ये देश की राजनीति में एक अध्याय का खत्म होने जैसा है.

30 सालों का याराना टूटा

शिवसेना ने बीजेपी के साथ सबसे पहले 1989 में गठबंधन किया था. तब पार्टी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर चुनाव मैदान में उतरी थी. इसके बाद 2014 को छोड़कर तमाम चुनाव में दोनों पार्टी ने साथ चुनाव लड़ा. लेकिन 2019 आते-आते सिर्फ दोनों दलों का नेतृत्व करने वाली पीढ़ी ही नहीं बदली. दोस्ती की कैमिस्ट्री भी बदल गई. और आखिरकार 30 साल पुरानी दोस्ती सरकार की अगुवाई करने के सवाल पर टूट गई.

अगर इतिहास के 3 दशक पुराने पन्ने को पलटें तो शिवसेना और बीजेपी के गठबंधन को सदाबहार दोस्ती कहा जाता था. जब भाजपा को सियासी गलियारे में अछूत माना जाता था. तब शिवसेना ने भाजपा के साथ समान विचारधारा की दुहाई देकर दोस्ती की थी. इस दोस्ती की जड़ को बाला साहब ठाकरे और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने सींचा था. इस मित्रता को भगवा राजनीति का प्रतीक माना जाता था.

कैमरा लेकर तस्वीरें खींचते उद्धव

21 साल पुरानी बात है, 1998 में जब लोकसभा चुनाव के दौरान मुंबई में भाजपा और शिवसेना की महारैली हुई थी. तब उद्धव ठाकरे अपने हाथ में कैमरा लेकर शिवसेना और बीजेपी की साझा रैली की तस्वीरें उतारते थे. उद्धव ने भाजपा और शिवसेना की दोस्ती की साझा ताकत को कैमरे में कैद किया था. वे इस रैली में उमड़ी भीड़ को कैमरे के पैमाने से नापते नजर आए थे. 

 

जब उद्धव तस्वीरें उतार रहे थे, तो मंच पर शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक साथ मौजूद थे. बाला साहब के हाथ में शिवसेना का चुनाव चिन्ह तीर धनुष था. तो वाजपेयी के हाथ में कमल. 1998 की इस रैली के मंच पर लिखा था कि भगवा दिल्ली की ओर बढ़ चला है. लालकिले के बैकग्राउंड में बने इस विशाल मंच पर मराठी में लिखे ये शब्द कभी भाजपा और शिवसेना के गठबंधन की पहचान जाहिर करने वाले थे.

टूट गया भगवा गठबंधन

जिस दोस्ती की दोनों दल कसमें खाते थे. हमेशा साथ निभाने का वादा करते थे. सालों साल, दोनों साथ आगे बढ़ते रहे, लेकिन दो दशक बाद अब ये भगवा गठबंधन टूट गया है. शिवसेना और भाजपा के बीच गठबंधन में दरार तो पहले भी आई थी. दोनों दल अलग-अलग चुनाव भी लड़ चुके हैं. अलग होने के बाद माहौल में जबर्दस्त गर्माहट दिखी. दोनों दलों ने एक दूसरे पर खूब वार-पलटवार किया. लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि शिवसेना ने भाजपा से अलग होकर विपक्षी दलों से हाथ मिलाने का कदम उठाया हो. लेकिन इस बार तस्वीर बदलती दिख रही है.

शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाने के संकेत देकर सबको चौंका दिया. जबकि शिवसेना की विचारधारा का एनसीपी और कांग्रेस की विचारधारा से कोई मेल नहीं है. 

इसी कड़ी में कुछ सवालों का किला खड़ा होना भी वाजिब है.

क्या एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चलाने की हालत में शिवसेना बदल जाएगी?
हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना का रुख क्या पहले जैसा रहेगा?
क्या धर्मनिरपेक्षता की राजनीति पर उद्धव पहले जैसे ही सवाल उठाते रहेंगे?
क्या शिसवेना आगे भी भगवा राजनीति की लीक पर ही चलती रहेगी या फिर उसके रंग ढंग बदल जाएंगे?
ये देखना भी दिलचस्प होगा कि सावरकर को बड़ा देशभक्त और राष्ट्रवादी बताने वाली शिवसेना कांग्रेस के सुर में कैसे सुर मिलाएगी?
अगर ये गठबंधन वैचारिक तौर पर बेमेल है, तो फिर इस दोस्ती की रेल कितनी आगे बढ़ेगी?

कभी महाराष्ट्र में शिवसेना, भारतीय जनता पार्टी के बड़ा भाई के तौर पर पहचानी जाती थी. लेकिन बदले हुए वक्त में भाजपा आगे निकल गई और शिवसेना पीछे रह गई. दोनों के गठबंधन की धुरी ही बदल गई लेकिन शिवसेना इस सच को कबूल करने को तैयार नहीं हुई. 105 सीटें जीतने वाली बीजेपी को 56 सीटें जीतनेवाली शिवसेना ने ड्राइविंग सीट से हटने को कह दिया. बीजेपी ने इस फॉर्मूले वाली बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी. पार्टी ने कहा दोनों दलों की दोस्ती का आधार हिंदुत्व है. सब ठीक हो जाएगा. भाजपा को जो भरोसा था, वो हो नहीं पाया. शिवसेना की नाराजगी बढ़ती गई और आखिरकार शिवसेना ने राहें अलग कर ली.

कहीं कांग्रेस की और मुश्किल ना बढ़ जाए

बदले हुए दौर में भले ही बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस शिवसेना की सरकार का समर्थन करे. लेकिन ये दांव जोखिम से भरा है. डर है कि कहीं कांग्रेस के लिए शिवसेना से हाथ मिलाने से कहीं उसका अल्पसंख्यक वोटबैंक ना छिटक जाए. कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर जिस सेकुलर गठजोड़ की बात करती है. शिवसेना का उसमें शामिल होना सहज नहीं है.

शिवसेना ने विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया गांधी का जबर्दस्त विरोध किया था. अयोध्या आंदोलन हो या राम मंदिर की लंबी राजनीति का दौर हो, शिवसेना ने हमेशा कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली पार्टी करार दिया. शिवसेना से हाथ मिलाने से कांग्रेस केरल जैसे राज्य में धर्मसंकट में पड़ सकती है. जहां उसका गठबंधन इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ है.

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राजनीति में भले ही कुछ भी असंभव ना हो, कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं हो. लेकिन इतना तो तय है कि शिवसेना का नया अवतार खुद उसकी छवि के लिए एक बड़े इम्तिहान जैसा है. अगर शिवसेना की अगुवाई में महाराष्ट्र में सरकार बन भी गई. तो उसके लिए अपनी छवि और अपनी सरकार दोनों को एक साथ कायम रखना आसान नहीं होगा.