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चुनाव होना लेकिन सरकार न बन पाना, महाराष्ट्र का पुराना रोग है

महाराष्ट्र की सीएम कुर्सी बहुत दिनों तक खुद पर किसी का बोझ नहीं सह पाती है, लिहाजा कोई भी सीएम यहां अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है. इसके अलावा सीएम पद के लिए खींचतान के कारण परिणाम आने के 10-15 दिन बाद सरकार का गठन हो पाना भी इस राज्य का पुराना शगल है. इस बार के गतिरोध को ही 17 दिन हो गए हैं.

चुनाव होना लेकिन सरकार न बन पाना, महाराष्ट्र का पुराना रोग है

मुंबईः 21 अक्टूबर को महाराष्ट्र विधानसभा के वोट पड़े, 24 अक्टूबर को रिजल्ट आ गया. इसके हिसाब से भाजपा को सबसे अधिक वोट मिले (105), गठबंधन वाली शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस ने 44 वोटों से संतोष कर लिया. अब कायदे से होना यह था कि भाजपा और शिवसेना गठबंधन में थीं तो उनकी सम्मिलित संख्या सरकार बनाने का दावा करने के लिए काफी थी. एनसीपी विपक्ष में होती और कांग्रेस हाशिए पर जाती. जैसी कि 2014 के बाद से उसकी नियती रही है. अन्य दल सिर्फ अपने बचे-खुचे वोट लेकर विधायक बने रहते और अगले साल की तैयारी करते. सरकार बन जाती और इस वक्त तो कोई मुख्यमंत्री होता.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ.. तो हुआ क्या
जो हुआ वह सब उल्टा-पुल्टा, सनझ से परे और उलझा हुआ है. शिवसेना और भाजपा सीएम पद के लिए उलझ गईं. ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री बनाने से शुरू हुई बात किसी भी जगह खत्म नहीं हो रही है. पूरे 17 दिन बीत गए हैं. भाजपा से अभी तक सीएम रहे फडणवीस ने इस्तीफा दे दिया है. एनसीपी खुद से कह रही है कि कोई बात नहीं जी, हम विपक्ष में बैठ जाएंगे. कांग्रेस को क्या करना है, सिर्फ सोनिया ही जानती हैं, लेकिन उन्होंने अब तक किसी को बताया नहीं है.

अब बची शिवसेना तो उसने दावा कर दिया है कि सरकार हम ही बनाएंगे, उधर प्रवक्ता संजय राउत कह रहे हैं कि कहा है तो हम ही बनाएंगे. कैसे बनाएंगे यह नहीं बताएंगे. कुल मिलाकर लोकतंत्र के साथ खुला खेल चल रहा है. साफ-साफ दिख रहा है कि नेता जो जनता की सेवा का दावा करते हैं वह मनमाफिक पद-प्रतिष्ठा न मिले तो सरकार भी नहीं बनने देते हैं.

लेकिन महाराष्ट्र में यह बीमारी हमेशा रही है
महाराष्ट्र का चुनावी इतिहास हमेशा से ऐसा रहा है. यहां की सीएम कुर्सी बहुत दिनों तक खुद पर किसी का बोझ नहीं सह पाती है. लिहाजा आजादी के बाद से यहां जितने भी विधानसभा चुनाव हुए हैं, उनमें जीत और तमाम समर्थन के बाद जो भी सीएम बना वह पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका. कई मुख्यमंत्री तो 1825 दिन (यानी पांच साल) की दहलीज पर पहुंच रहे थे कि हटा दिए गए. इनमें से महाराष्ट्र के तीसरे सीएम रहे पीके सावंत को महज 10 दिन ही कुर्सी नसीब हुई. उन्होंने 25 नवंबर 1963 से 4 दिसंबर 1967 तक पद संभाला था. यानी कि राजनीतिक अस्थिरता महाराष्ट्र की विरासत है. परिणाम आने के 10-15 दिन बाद जैसे-तैसे सरकार बन पाना तो यहां का शगल रहा है.

2004 का चुनावः 16 दिन की मशक्कत, विलास राव देशमुख बने थे सीएम
आज से 15 साल पीछे चलिए. इतिहास 16 अक्टूबर 2004 की तारीख का पन्ना खोलेगा. इस दिन चुनाव परिणाम आया. एनसीपी को 71 सीटें मिलीं, कांग्रेस को 69, इस तरह इनके गठबंधन ने 140 सीटें जीतीं. भाजपा-शिवसेना को 126 सीटें हासिल हुई थीं तो वे सीन में नहीं थे. कुछ निर्दलीय विधायकों के साथ एनसीपी-कांग्रेस सरकार बना सकती थीं. लेकिन एक दिक्कत आ गई. हुआ यह कि 71 सीटें जीतने वाली एनसीपी ने सीएम पद मांग लिया. (क्योंकि अधिक वोट उनके पास थे) कांग्रेस इस पर राजी नहीं हो रही थी. खींचतान जारी रही, आरोप-प्रत्यारोप के चले 16 दिनी संघर्ष के बाद गठबंधन ने समझौता किया. इसके बाद विलासराव देशमुख ने कांग्रेस की ओर से सीएम पद की शपथ ली. इनका गतिरोध अभी खत्म नहीं हुआ था. सरकार बनने के बाद मंत्रिमंडल का गठन होने में खींचतान शुरू हो गई और 13 दिनों बाद कैबिनेट बन सकी.

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1999 का चुनावः इस साल भी लग गए थे 11 दिन
इस साल भी विलासराव देशमुख ही सीएम बने थे, लेकिन 11 दिनों के संघर्ष के बाद. तब गवर्नर थे पीसी एलेक्जेंडर और उन्होंने चुनाव नतीजों के आधार पर भाजपा -शिवसेना गठबंधन को सरकार बनाने का न्योता दिया था. एनसीपी और कांग्रेस ने तब अलग-अलग चुनाव लड़ा था. इसमें एनसीपी को 58 सीटें, कांग्रेस को 75 सीटें मिलीं. भाजपा को 56 सीट, शिवसेना को 69 सीट मिली थीं. गठबंधन होने के कारण इनके पास सबसे अधिक 125 सीटें थीं, लेकिन यह फिर से चुनाव कराए जाने के लिए वोट मांग रहे थे. जब सरकार बनाने का निमंत्रण मिला तो भाजपा-शिवसेना गठबंधन बहुमत नहीं साबित कर सके. इसके बाद कांग्रेस-एनसीपी के साथ लाकर कुछ निर्दलीय विधायकों के साथ सरकार का गठन किया गया. यह सब होने में 11 दिन लग गए.

5 साल सीएम रहने का गौरव फडणवीस और वसंतराव नाइक को ही मिला
महाराष्ट्र विधानसभा में अस्थिरता का आलम यह रहा है कि यहां अभी तक केवल 2 ही मुख्यमंत्रियों को पूरा कार्यकाल नसीब हुआ है. अभी तक सीएम रहे देवेंद्र फडणवीस कार्यकाल पूरा करने वाले दूसरे सीएम हैं. वह 2014 विधानसभा चुनाव में इस पद पर काबिज हुए थे और अभी तक रहे.

इससे पहले वसंतराव नाइक को यह कीर्तिमान मिला था. वह महाराष्ट्र के चौथे प्रधानमंत्री थे और 5 दिसंबर 1963 को पद पर रहे थे. हालांकि उनका कार्यकाल काफी लंबा रहा है और वह लगातार तीन कार्यकाल में मुख्यमंत्री रहे हैं. उनका कार्यकाल सबसे लंबा 4097 दिन का रहा है.

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