ना विचार, ना सरोकार सबसे ऊपर सरकार! महाराष्ट्र में कैसे चलेगी 'समझौता एक्सप्रेस'?

महाराष्ट्र में शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी से रिश्ते खत्म करने के बाद एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के साथ नया प्रेम गठन का कार्यक्रम चला रही है. लेकिन सवाल ये है कि सरकार बनाने के लिए एक गाड़ी में सवार दो विपरीत विचारों का गुजारा 5 साल तक कैसे होगा?

ना विचार, ना सरोकार सबसे ऊपर सरकार! महाराष्ट्र में कैसे चलेगी 'समझौता एक्सप्रेस'?

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के बाद भी शिवसेना की सरकार बनाने की कोशिशें जारी हैं. शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस के नेता साथ मिलकर सरकार बनाने का फॉर्मूला तैयार करने में जुटे हैं. दावा है कि नए साल में महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की नई सरकार बन सकती है. भविष्य की खिड़की से इन दलों को अपनी सरकार बनने की पूरी संभावना दिख रही है.

तैयार हो गई कांग्रेस-एनसीपी की ढाल

कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा वाली शिवसेना से समझौते पर बचाव के लिए एनसीपी और कांग्रेस ने ढाल तैयार कर ली है. इस ढाल का नाम है कॉमन मिनिमम प्रोग्राम यानी सीएमपी को तमाम सवालों का जवाब बताने की कोशिश है. कहा जा रहा है कि हमारा मकसद आम लोगों को ज्यादा से ज्यादा फायदा देना होगा.

एनसीपी और कांग्रेस मिलकर हफ्ते भर में कॉमन मिनमम प्रोग्राम तय करेगी. फिर इसे शिवसेना के सामने रखा जाएगा. जिसके बाद सरकार बनाने की तैयारी और तेज होगी. इसके लिए कांग्रेस नेता बालासाहेब थोरात उद्धव ठाकरे से मिले.

पावर दिखाने के मूड में पवार

50 साल के राजनीतिक जीवन के अनुभव की सारी पूंजी लेकर शरद पवार दिन रात एक कर रहे हैं. पवार का पावर गेम फिर क्लाइमेक्स पर है. चुनाव में भले ही एनसीपी तीसरे नंबर की पार्टी हो. लेकिन पवार के समर्थकों को लगता है कि उनका मराठा क्षत्रप पार्टी को अब सत्ता में लाकर ही दम लेगा.

तो ये है कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना का फॉर्मूला?

अंदर खाने से आ रही चर्चा की मानें तो शिवसेना और एनसीपी में आधे-आधे कार्यकाल के मुख्यमंत्री पद अपने पास रखने का फॉर्मूला तय हुआ है. सूत्रों की मानें तो कांग्रेस ने डिप्टी सीएम और विधानसभाध्यक्ष पद पर दावेदारी ठोंकी है. यही नहीं पार्टी ने 4 विधायक पर 1 मंत्री बनाने का फॉर्मूला भी सामने रखा है. कांग्रेस-एनसीपी, शिवसेना के साथ बीएमसी का फॉर्मूला भी अभी से तय कर लेना चाहती है. लेकिन अभी तीनों दल अभी खुलकर कुछ कहने को तैयार नहीं है. ये अपनी तरफ से होमवर्क पूरा कर लेना चाहते हैं. जिससे अगर राष्ट्रपति शासन हटाकर सरकार बनाने का मौका देने की मांग तेज की जा सके. लेकिन ये मांग आखिरकार कब उठेगी ये देखना वाकई दिलचस्प होगा.

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कांग्रेस का धर्मसंकट है कि अगर पार्टी को सत्ता नहीं मिली तो महाराष्ट्र में वजूद का संकट ना पैदा हो जाए. एनसीपी की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है. और शिवसेना का पहला मकसद राज्य में अपने मुख्यमंत्री को हर हाल में गद्दी पर बिठाना है. जाहिर है ऐसे में विचारधारा की कोई अहमियत नहीं.

चर्चा बस इस बात पर हो रही है कि सरकार की गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर कौन होगा. चाबी किसके पास होगी और ब्रेक किसके हाथ में. और इस पर अभी लंबी चर्चा के आसार हैं.

बिना सत्ता के राजनीतिक दल जल बिन मछली की तरह तड़प उठते हैं. शायद यही बेचैनी थी जो शिवसेना को उसकी पुराने साथी भाजपा से अलग कर दी और दुश्मन बना दिया. मुख्यमंत्री पद के लिए इस कदर जिद पर अड़ गई कि गठबंधन ही टूट गया. और राज्य राष्ट्रपति शासन लग गया. सत्ता और कुर्सी ही सबसे बड़ा लक्ष्य ना होता तो कांग्रेस और एनसीपी जैसे विरोधी दल शिवसेना से हाथ मिलाने की हामी नहीं भरते.

महाराष्ट्र में 'विधायक बचओ अभियान'

महाराष्ट्र का महाधर्मसंकट हो या फिर कर्नाटक का राजनीतिक नाटक रहा हो. तस्वीरें ज्यादा अलग नहीं दिख रही हैं. हर किसी ने बसों में विधायकों को भरकर होटल के भीतर कैद करने वाली खबर की चर्चा सुनी होगी. अपनी पार्टी को टूट से बचाने के लिए ये हर दल का आजमाया हुआ फंडा है. यही फॉर्मूला महाराष्ट्र में लागू किया जाने लगा है.

महाराष्ट्र में विधायक बचाओ अभियान में बस से लेकर चार्टर्ड प्लेन तक का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. महाराष्ट्र की ताजा तस्वीरें सामने हैं कि कैसे सियासत लोगों के भरोसे का मजाक उड़ा रही है. राज्य की जनता अब खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगी है.

चुनावी नतीजे के बाद शिवसेना तक को अपने विधायकों पर भरोसा नहीं रहा. तभी तो उन्हें बसों में भरकर होटल में शिफ्ट किया गया था. कांग्रेस ने अपने विधायकों को जयपुर तक पहुंचा दिया. जिन्हें अब मुंबई भेजा गया है. महाराष्ट्र से पहले कर्नाटक में भी ऐसा हो चुका है. ये सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं है. ये कहना गलत नहीं होगा कि आज की राजनीति का चरित्र यही है. विचारधारा की खातिर जीवन खपाने की बातें यहां सिर्फ भाषणों तक सिमट कर रह गई हैं.

राजनीति में कुछ भी संभव है

कभी कर्नाटक का नाटक, कभी गोवा की खींचतान, कभी बिहार का बवाल. कभी उतराखंड तो कभी उत्तर प्रदेश की उठापटक. सालों से ऐसी तस्वीरें सामने आती रही हैं. जिससे मतदाता शर्मसार होते रहे हैं लेकिन नेता नहीं. दलगत राजनीति दलदल में धंसती गई और नैतिकता की नाव स्वार्थ के भंवर में डूब गई. लेकिन इससे नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ा.

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कवि कुमार विश्वास ने एक वायरल वीडियो को ट्वीट किया है. इस वीडियो को आज की राजनीति पर एक तंज के रूप में इस्तेमाल किया गया है. जिसमें सत्ता हासिल करने के लिए विधायकों के ज्यादा से ज्यादा जुगाड़ की होड़ लगी है.

वो दौर जाता दिख रहा है. जब विचारधारा के बिना राजनीति रंगहीन कही जाती थी. लेकिन अब इसका रंग फीका पड़ चुका है. ऐसी हालत में आम लोगों को पुराने दिन याद आते हैं. देश की राजनीति में ऐसे भी उदाहरण हैं जब सत्ता की खातिर विचारधारा से समझौते की जगह नेताओं ने इस्तीफा देना ज्यादा बेहतर समझा. अटल बिहारी वाजपेयी का लोकसभा में दिया गया भाषण वैचारिक राजनीति के स्वर्णकाल की तस्वीरों में एक है.

डंके की चोट पर अपनी विचारधारा पर गर्व करना और विरोधियों को चुनौती देना कभी राजनीतिक दलों की ताकत हुआ करती थी. सत्ता और सरकार की जगह राजनीतिक दलों की चिंता सरोकार को लेकर ज्यादा थी.

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देश में भले ही वैचारिक राजनीति की जमीन पहले से कुछ कमजोर दिखती हो. लेकिन ये भी उतना ही बड़ा सच है कि उम्मीदों का सूरज कभी अस्त नहीं होता. देश की सियासत में अच्छे दिन की आशा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है. सूचना क्रान्ति के इस युग में नई पीढ़ी को बरगलाना मुश्किल है. नए हिन्दुस्तान का वोटर सच-गलत का फैसला करने में देर नहीं करता और हर दल का पूरा हिसाब रखता है.