वंशवाद की चपेट में झारखंड की राजनीति, विरासत बचाने की होड़

राजनीति में परिवारवाद की कहानी कोई नई बात नहीं. सियासी खेल लोकतंत्र के दायरे के अंदर रह कर ही बड़ी सफाई से खेला जाता है. परिवारवाद तो जैसे अब इसका हिस्सा ही बन गया है. झारखंड भी इससे अछूता नहीं रहा है. विधानसभा चुनाव का पहला चरण समाप्त हो चुका है. कई पार्टी और राजनेताओं की राजनीतिक विरासत खतरे में है या यूं कहें कि परिवार भरोसे है.   

वंशवाद की चपेट में झारखंड की राजनीति, विरासत बचाने की होड़

रांची: झारखंड में 81 विधानसभा सीटों पर चुनाव चल रहा है. इनमें से कई सीटें ऐसी हैं जहां जनता का प्रतिनिधि चुने जाने का कम बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन बचाने का चुनाव ज्यादा है. परिवार की नाक बचाने की इस लड़ाई में सारे दम-खम से लगे पड़े हैं. पिता-पुत्र से लेकर भाई- भतीजा तक और पति-पत्नी तक इस शह और मात के खेल में लगे पड़े हैं. रविवार को झामुमो ने अपने 13 प्रत्याशियों की अपनी एक सूची जारी की जिसमें ज्यादातर उम्मीदवार अपने राजनीतिक विरासत को बचाने उतर रहे हैं. 

लिट्टीपाड़ा से झामुमो के विधायक रहे साइमन मरांडी की जगह इस बार उनके बेटे दिनेश विलियम मरांड़ी को टिकट दिया गया है. यहां उन्हें भाजपा उम्मीदवार से मिल रही चुनौती को पार करनी है. वहीं रामगढ़ विधानसभा सीट से पिछली सरकार में मंत्री रहे चंद्रप्रकाश चौधरी की विरासत को बचा कर रखने की जिम्मेदारी मिली है 

उनकी पत्नी सुनीता चौधरी को. चंद्रप्रकाश चौधरी अब सांसद बन चुके हैं. इसलिए उनकी जगह भरने के लिए उनकी पत्नी सुनीता चौधरी को टिकट दिया गया है.

भाजपा नेता की पत्नी संभाल रही हैं मोर्चा

लोहरदगा से पूर्व विधायक कमल किशोर भगत की पत्नी नीरू शांति भगत को चुनावी मैदान में उतारा गया है ताकि परिवार की राजनीतिक विरासत किसी गैर के हाथों में न चली जाए. भाजपा की पुरानी सहयोगी दल आजसू जो इस बार अकेले चुनाव लड़ रही है, उसने सुनीता चौधरी को पार्टी की टिकट दी है. झरिया विधानसभा सीट से विधायक संजीव सिंह का टिकट कटा और मिला उनकी ही पत्नी रागिनी सिंह को. संजीव सिंह भाजपा के नेता थे. फिलहाल ववे एक हत्या के मामले में हवालात में बंद हैं. 

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अदालत ने पूर्व विधायकों के चुनाव लड़ने पर लगाई रोक

यहीं हाल सिल्ली और गोमिया सीट का भी है. सिल्ली के पूर्व विधायक अमित महतो की जगह उनकी पत्नी सीमा महतो को मोर्चेबंदी करने के लिए टिकट दे दिया है झामुमो ने तो वही गोमिया से पूर्व विधायक योगेंद्र प्रसाद की जगह उनकी पत्नी बबीता महतो को उम्मीदवार बनाया गया है. दिलचस्प बात यह है कि न्यायालय के आदेश के बाद दोनों पूर्व विधायकों को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है. अब सियासी लड़ाई में किसी तरह पत्नियां ही परिवार की विरासत को बचाने उतरी हैं.

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कांग्रेस भी है दौड़ में

बड़कागांव से योगेंद्र साव की पुत्री अंबा प्रसाद अपने पिता की राह पर चल कर उनकी ही नाक बचाने को उतरी हैं. उन्हें कांग्रेस ने अपनी उम्मीदवार बनाया है. सिमडेगा के कोलेबिरा से विधायक और मंत्री रहे एनोस एक्का की राजनीतिक विरासत को बचा कर रखने की जिम्मेदारी पुत्री आइरिन एक्का को दी गई है. पलामू के पांकी सीट से पूर्व विधायक विदेश सिंह का टिकट काटा गया है और उन्हीं के बेटे देवेंद्र सिंह को सौंप दिया गया है. 

पिता-पुत्र से ज्यादा कमाल दिखा रही पति-पत्नी और पिता-पुत्री की जोड़ी

झारखंड में अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बचाने की जिम्मेदारी में बेटियां बेटों से ज्यादा आगे दिखाई दे रही हैं. पिता-पुत्र की जुगलबंदी के बाद पिता-पुत्री और पति-पत्नी का खेल प्रचलन में है. खैर लोकतंत्र में कहने के लिए ही सही पर जनता मालिक है. उसके वोट के बाद ही असली विरासत की पहचान हो सकती है. 

झारखंड की 81 सीटों पर विधानसभा चुनाव चल रहा है. पांच चरणों में चुनाव में पहला चरण 30 नवंबर को निपट चुका है. दूसरे चरण का चुनाव 7 दिसंबर को, तीसरे चरण का 12 दिसंबर, चौथे चरण का 16 दिसंबर को और पांचवें व अंतिम चरण का चुनाव 20 दिसंबर को होना है. वोटों की गिनती 23 दिसंबर को होगी, जो यह तय कर देगी कि किसके सर सेहरा सजता है.