कर्नाटक के तर्ज पर महाराष्ट्र का महा'ड्रामा'! तो क्या वैसा ही होगा अंजाम? जानें, पूरा घटनाक्रम

महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे का पूर्णतया बखान कर पाना तो फिलहाल बेहद मुश्किल है. लेकिन, ये पूरा घटनाक्रम कर्नाटक के नाटक वाले रास्ते पर चलता दिखाई दे रहा है. अबतक की कहानी हूबहू कर्नाटक के समकक्ष देखी गई. तो क्या आगे भी कर्नाटक के इतिहास को ही महाराष्ट्र में दोहराया जाएगा?

कर्नाटक के तर्ज पर महाराष्ट्र का महा'ड्रामा'! तो क्या वैसा ही होगा अंजाम? जानें, पूरा घटनाक्रम

नई दिल्ली: महाराष्ट्र की राजनीति का गणित समझ पाना उतना ही मुश्किल हो गया है, जितना कि अल्बर्ट आइंस्टाइन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक E=mc^2 को बूझना जटिल है. महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन का कोई तोड़ नहीं है. उसी तरह से महाराष्ट्र की राजनीति के रणबांकुरों के दिमाग को पढ़ना भी रेत से पानी निकालने के समान हो चुका है.

कर्नाटक के बाद अब महाराष्ट्र की बारी

महाराष्ट्र में अगले दिन क्या होगा तो छोड़िए, अगले घंटे, यहां तक कि अगले पल क्या होने वाला है इसका किसी को अंदेशा तक नहीं है. ऐसा ही कुछ हाल कर्नाटक का था. जब भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने सीएम पद की इस्तीफा लेकर कुर्सी पर बैठ गए थे. अगर महाराष्ट्र की भविष्यवाणी करें तो, कर्नाकट की पुरानी तस्वीरें जेहन में जरूर आती हैं. प्रदेश की राजनीति में एक ऐसी रात आई जब किसी ने ये कल्पना तक नहीं की होगी कि अगले दिन सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देवेंद्र फडणवीस गद्दीनशीन भी हो सकते हैं. लेकिन अचानक से ऐसा हुआ कि हर किसी के होश फाख्ता हो गए. लेकिन अब फडणवीस सरकार गिर चुकी है. सीएम और डिप्टी सीएम ने बैकफुट पर जाते हुए इस्तीफा दे दिया है.

कर्नाटक में ये था सियासी गणित

साल 2018 का वक्त था, जब कर्नाटक में सरकार के गठन का ड्रामा अदालत-कचहरी करने के बाद परवान पर पहुंच गया था. यहां हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा को 104 सीटें, कांग्रेस को 78 और जेडीएस के खाते में 37 सीटें आईं थी. जिसके बाद राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी यानी भाजपा को सरकार बनाने का ऑफर दिया. सरकार बनी और इसके विरोध में कांग्रेस और जेडी(एस) ने देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया. दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में ये मांग रखी थी कि यहां तुरंत फ्लोर टेस्ट कराया जाए.

राज्यपाल ने दिया था 15 दिन का समय

कांग्रेस और जेडीएस की गुहार पर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो चुके येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने का आदेश तो दे दिया, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें इसके लिए 15 दिन का वक्त दिया. अब ऐसे में कांग्रेस को मिर्ची लग गई और उसने एक बार फिर इस 15 दिन की अवधि पर बखेड़ा खड़ा कर दिया. कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जिसके बाद अदालत ने 19 मई 2018 को शाम चार बजे तक बहुमत साबित करने का निर्देश दे दिया. लेकिन भाजपा बहुमत साबित करने की स्थिति में नहीं थी, और फिर बीएस येदियुरप्पा ने विधानसभा में अपने संबोधन के बाद इस्तीफा सौंप दिया. लेकिन इस दौरान उनकी आंखें छलक उठी और वो भावुक भी हो गए. हालांकि, फडणवीस ने इस्तीफे से पहले जो प्रेस कॉन्फ्रेंस किया, उसमें वो भावुक तो नहीं हुए लेकिन उन्होंने महाराष्ट्र के भविष्य पर अपनी चिंता जरूर जाहिर की. ये पूरा घटनाक्रम बिल्कुल ऐसे ही चल रहा है, जिस तरह से कर्नाटक में उठापटक का दौर चला.

सरकार तो बना ली, लेकिन कांग्रेस को झेल नहीं पाई जेडीएस

कर्नाटक के नाटक के बीच भाजपा सरकार गिर गई और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार तो बन गई. लेकिन दोनों की हवा बीच में ही निकल गई. महज 14 महीने में कांग्रेस-जेडीएस की गाड़ी पंचर हो गई. खुद सीएम कुमारस्वामी अपने दर्द का खुलेआम प्रचार करने लगे. कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चलाने में कितनी मुश्किलें हो रही है, वो खुद इसका बखान करने लगे. कांग्रेस इस सरकार को 14 महीने भी नहीं संभाल पाई और और फिर से राज्य में भाजपा की सरकार बन गई.

अब ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि...

माना, 
कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना ने एकसाथ मिलकर सरकार बना लिया.
माना,
उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए.

लेकिन, 
क्या अलग विचारधाराओं से सरकार चलाना आसान होगा?
क्या उद्धव ठाकरे हिंदुत्व के झंडे को छोड़कर आगे बढ़ जाएंगे?
क्या शरद पवार और सोनिया गांधी, शिवसेना से दुश्मनी भुला देंगी?
क्या महाराष्ट्र का अंजाम कर्नाटक जैसा ही होगा?
क्या कर्नाटक की तरह 14 महीने में फिर से फडणवीस की वापसी होगी?