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महाराष्ट्र के सियासी दंगल में कौन मचाएगा धूम, भाजपा-शिवसेना की 'राह नहीं आसान'

महाराष्ट्र की सियासी रणभूमि पर राजनीति के राणबांकुरों ने युद्ध के लिए अपनी-अपनी कमर कस ली है. काफी जद्दोजहद के बाद भाजपा-शिवसेना ने गठबंधन तो कर लिया. लेकिन उन्हें कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन को हल्के में आंकने की भूल नहीं करनी चाहिए. क्योंकि एक छोटी सी भूल 2009 के नतीजों जैसा रूप धारण कर सकती है.

महाराष्ट्र के सियासी दंगल में कौन मचाएगा धूम, भाजपा-शिवसेना की 'राह नहीं आसान'
फोटो साभार: ट्विटर

नई दिल्ली: वो चुनाव जिसके नतीजों से ये तय हो जाएगा कि अगले पांच साल तक महाराष्ट्र की बागडोर किसके हाथों में रहेगी. यानी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है, महज कुछ दिनों बाद 21 अक्टूबर को प्रदेश की कुल 288 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे. 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन को शरद पवार की पार्टी एनसीपी और कांग्रेस ने जबरदस्त पटखनी दी थी. हालांकि आज के दौर में कांग्रेस की हालत काफी नाजुक है. लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है, ऐसे में भाजपा-शिवसेना को एक छोटी सी भूल महंगी पड़ सकती है. शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रहे अंदरूनी कलह को जगजाहिर नहीं होने दिया गया.

दरअसल, शिवसेना की तरफ से पहली बार कोई ठाकरे परिवार का चुनावी मैदान में ताल ठोक रहा है. ऐसे में शिवसैनिकों की दिली ख्वाहिश है कि उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे की बतौर सीएम ताजपोशी की जाए. लेकिन ये इतना आसान नहीं है, जिनती आसानी से इसकी चर्चा हो रही है. क्योंकि भाजपा इतनी आसानी से सीएम की कुर्सी अपने सहयोगी दल के हाथों में नहीं सौंप सकती है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब आदित्य को सीएम उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा ने जोर पकड़ा तो बीजेपी ने बिल्कुल चुप्पी साथ ली. इतना ही नहीं भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन का ऐलान करने में देरी करके ये संकेत दे दिया है कि वो किसी भी कीमत पर झुकने के लिए तैयार नहीं है.

कांग्रेस-एनसीपी का वर्चस्व कितना?

कांग्रेस और एनसीपी इस चुनाव में पूरी ताकत झोंकने में जुटी हुई है. चुनाव प्रचार के अलावा भाजपा या शिवसेना की एक भी खामी को भुनाने में राहुल-पवार की सेना कोई कसर नहीं छोड़ रही है. इस बीच खुद शरद पवार ने एक ऐसा बयान दिया जो भाजपा के लिए परेशानी की वजह बन सकती थी. दरअसल, शरद पवार ने ये दावा किया कि फडणवीस सरकार में मंत्री रहे भाजपा नेता एकनाथ खडसे उनके संपर्क में हैं. हालांकि, पवार के इस दावे को खुद खडसे ने खारिज कर दिया था. खडसे ने अपनी सफाई में ये कहा था कि मेरी 3 साल से कोई बातचीत नहीं हुई है. ऐसे में इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन इस चुनाव को अपने नाम करने के लिए हर एक पैंतरा आजमाने की तैयारी में है.

हाल ही में ईडी ने महाराष्ट्र सहकारी बैंक घोटाले में एनसीपी प्रमुख शरद पवार समेत 70 अन्य लोगों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग और कई अन्य मामले में पेश होने का नोटिस जारी किया था. जिसके बाद एनसीपी ने इसे राजनीतिक कार्रवाई करार दिया था. इसके खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले थे. इसके अलावा फडणवीस को सुप्रीम कोर्ट से मिले झटके के बाद कांग्रेस-एनसीपी ने उनके इस्तीफे की मांग भी खूब जोर-शोर से उठाई थी. 

2009 और 2014 से क्यों अलग है इस बार का चुनाव?

साल 2009 में जहां भाजपा और शिवसेना एकसाथ चुनाव लड़कर सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए थे. वहीं साल 2014 में रार के बावजूद चुनावी नतीजों के बाद दोनों में समझौता हो गया था.

नीचे दिए आंकड़ों से समझिए दोनों चुनावों में अंतर

  • 2009 में भाजपा- 46 सीट पर जीत
  • 2014 में भाजपा- 122 सीट पर विजय
  • 2009 में शिवसेना- 44 सीट पर जीत
  • 2014 में शिवसेना- 63 सीट पर विजय

Vs

  • 2009 में कांग्रेस- 82 सीट पर जीत
  • 2014 में कांग्रेस- 42 सीट पर विजय
  • 2009 में एनसीपी- 62 सीट पर जीत
  • 2014 में एनसीपी- 41 सीट पर विजय
  • 2009 में एमएनएस- 13 पर कब्जा
  • 2014 में एमएनएस- महज 1 सीट
  • 2009 में अन्य- 41 सीट पर जीत
  • 2014 में अन्य- 19 सीट पर विजय

इन आंकड़ों को देखकर ये समझना आसान हो जाता है कि चुनावी मैदान पर होने वाली जंग में कभी भी कोई भी बाजी मार सकता है. ये ऐसा युद्ध है जहां किसी भी छोर पर खड़े योद्धा को छोटी से छोटी गलती का खामियाजा भुगतना पड़ता है. महाराष्ट्र के सियासी राजगद्दी पर कौन काबिज होगा, इसकी तस्वीर तो आने वाले 24 अक्टूबर को ही साफ हो पाएगी.