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दिल्ली आए नीतीश ने केजरीवाल के सुर से सुर मिलाया! कर दी ये मांग

बिहार में गठबंधन के अंदर सब ठीक चल रहा है यह औपचारिक और ऊपरी बातें हो सकती है. लेकिन भाजपा और जदयू के कई मौकों पर बदलते तेवर इस बात की ओर इशारा है कि एनडीए के दोनों घटक दल गठबंधन में भी अपने हित की पहले सोचेंगे. 

दिल्ली आए नीतीश ने केजरीवाल के सुर से सुर मिलाया! कर दी ये मांग

नई दिल्लीः आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जदयू मुखिया नीतीश कुमार बुधवार को दिल्ली पहुंचे. यहां उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया और उनसे जी जान से इसके लिए जुट जाने की अपील की. इस मौके पर उन्होंने दिल्ली सरकार की तरह ही दिल्ली को अलग राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की और इस बात के स्पष्ट संकेत दिए कि पार्टी अब भाजपा की नीतियों से बिल्कुल अलग विचारधारा रखती है. जदयू इसके पहले ही दिल्ली में अपने बूते चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है. 

दिल्ली में भाजपा से जुदा है इनकी 'अदा'!

मुख्यमंत्री कुमार के इस बयान को पूर्वांचल के वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला बताया जा रहा है. पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि बिहार को विशेषाधिकार का दर्जा दिए जाने की मांग के तर्ज पर ही दिल्ली को भी राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर उनकी पार्टी का रुख एकदम स्पष्ट है. नीतीश कुमार के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जदयू के दांव ठोकने के बाद मामला यहां चतुष्कोणीय होता दिख रहा है. जदयू ने इससे पहले भी एनडीए के अपने सहयोगी दल भाजपा से अलग जा कर कई चुनाव लड़े हैं. अगले वर्ष झारखंड और दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी जदयू सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है. 

केजरीवाल की लाइन से 'खाया मेल'

एक ओर जहां मुख्यमंत्री कुमार का दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाए जाने का बयान आप के मुख्यमंत्री केजरीवाल के पॉलिटिकल लाइन और मांग से मेल खाता है वही दूसरी ओर यह भाजपा के विचारों से अलग भी दिखता है. अनुच्छेद 370 को लेकर भी इससे पहले जदयू और भाजपा के विचारों में टकराव देखने को मिली थी.

दरअसल, लोकसभा चुनाव के दौरान ही जदयू ने राष्ट्रीय पार्टी बनने की चाह से विस्तारवाद की जमीन तैयार करनी शुरू कर दी थी. नॉर्थ-ईस्ट के कई राज्यों में जदयू ने न सिर्फ चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे बल्कि अरुणाचल में तो भाजपा के बाद सबसे ज्यादा सीट पर जीत दर्ज करने वाली पार्टी बनी. जदयू के इस विस्तारवाद से इतना तो तय हो गया है कि बिहार में गठबंधन की गांठ भले ही मजबूत दिखाई दे रही हो पर दल की स्थिति के हिसाब से दोनों ही पार्टियां अपनी-अपनी राह चुनती रहेंगी.