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धीरे-धीरे ही सही, लोकतंत्र में गहरी पैठ बना रहा है नोटा

नोटा का विकल्प साल 2009 में आया था. तबसे अबतक कई चुनावों में इसका प्रयोग भी किया जा चुका है. हरियाणा चुनाव में इस विकल्प के चलते कई सीटों पर जीत का अंतर काफी कम रहा है तो लातूर में यह विकल्प जीतने वाले प्रत्याशी के बाद दूसरे नंबर पर आया है.

धीरे-धीरे ही सही, लोकतंत्र में गहरी पैठ बना रहा है नोटा

नई दिल्लीः हरियाणा-महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं. इसी के साथ पार्टियां अपनी हार-जीत की समीक्षा में जुटी हुई हैं. इस पूरे लोकतांत्रिक त्योहार में जो ध्यान खींच रहा है वह नोटा का विकल्प है. पिछले कई चुनाव से ईवीएम में शामिल इस बटन को दबाने वाले तो बढ़े हैं, लेकिन भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह विकल्प अभी भी अपने औचित्य की लड़ाई लड़ रहा है.

हरियाणा में नोटा पर एक नजर
हरियाणा के विधानसभा चुनाव में नोटा का वोट प्रतिशत बहुत अधिक तो नहीं है, लेकिन यहां कई सीटों पर प्रत्याशियों के बीच जीत का जो अंतर है वह राजनीतिक पंडितों को आश्चर्य में डाल रहा है. पूरे हरियाणा में नोटा को 0.52 फीसदी समर्थन मिला है. अब कुछ सीटों पर जीते हुए प्रत्याशी और हारे हुए उम्मीदवार के बीच के वोट का अंतर देखें तो यह बेहद दिलचस्प है. सिरसा से जीतने वाले गोपाल कांडा और दूसरे नंबर पर रहे गोपाल सेतिया के बीच मतों का अंतर केवल 602 है. इसी तरह थानेसर सीट से भाजपा के सुभाष सुधा और अशोक अरोरा के बीच जीत का अंतर 842 वोटों से तय हुआ. दोनों ही प्रत्याशियों ने जीत भले ही दर्ज की, लेकिन आंकड़े इस बात के पुख्ता सबूत देते हैं कि इन सीटों पर कई वोट अन्य दलों या उससे भी अधिक नोटा की तरफ खिसके हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो जीतने वाला प्रत्याशी जादुई आंकड़े से जीतता या फिर हारने वाला प्रत्याशी भी जीत के पायदान पर खड़ा हो सकता था. 

महाराष्ट्र के चुनाव में भी खेल गया नोटा
महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में नोटा को पूरे राज्य में 1.35 प्रतिशत वोट समर्थन मिला है. यानि कि यहां भी नोटा की कोई खास स्थिति नहीं है. लेकिन लातूर देहात सीट पर इस बटन ने चुनाव परिणाम में अहम रोल अदा किया. यहां से दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख के बेटे धीरज देशमुख चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन उन्हें टक्कर किसी नेता से नहीं बल्कि नोटा से मिली. हुआ यूं कि राज्य के चुनाव में देशमुख को तो 1,35,006 वोट से जीत मिली, लेकिन दूसरे स्थान पर  27,500 वोटरों के समर्थन के साथ नोटा दूसरे स्थान पर रहा. धीरज देशमुख को लातूर ग्रामीण सीट पर पड़े कुल वैध मतों का 67.64 प्रतिशत वोट मिला, जबकि नोटा का वोटशेयर 13.78 प्रतिशत रहा.मध्यप्रदेश के चुनाव में भी दिखा नोटा राज मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए यादगार रहेंगे. यहां नोटा सीधे-सीधे दोनों पार्टियों के लिए विलेन बन गया. हुआ यूं कि राज्य की 230 सीटों में बाकी तो क्लियर रहीं लेकिन 14 सीटों पर कांटे की टक्कर रही. चुनाव आयोग के आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्यप्रदेश में बहुमत का समीकरण नोटा के चलते बिगड़ा है. मध्यप्रदेश चुनावों में डेढ़ फीसदी (4,666,26) वोटरों ने नोटा पर बटन दबाया था. यहां की वारासिवनी सीट पर निर्दलीय प्रदीप जायसवाल को 45612 वोट मिले, जबकि भाजपा के योगेश निर्मल को 44663 वोट मिले. वहीं नोटा में 1045 वोट पड़े. वहीं टीकमगढ़ में कांग्रेस प्रत्याशी को 44384 और भाजपा को 44573 और नोटा को 986 वोट पड़े. सुवासरा विधानसभा में भाजपा को 89712 और कांग्रेस को 89364 और नोटा पर 2874 वोट पड़े. नोटा का यह गुणा-गणित बता रहा है कि वह धीरे-धीरे ही सही, लेकिन लोकतंत्र में अपनी गहरी पैठ बना रहा है.

राजस्थान की स्थिति को भी याद रखना जरूरी
राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के वोट शेयर में मामूली अंतर था जिसकी वजह से मुख्यमंत्री सत्ता से बेदखल हो गईं. भाजपा का वोट प्रतिशत 38.8 रहा जबकि राज्य में सबसे पड़ी पार्टी बनने वाली कांग्रेस का वोट प्रतिशत 39.3 रहा. दोनों पार्टियों के बीच का मत प्रतिशत का अंतर 0.5 के आसपास का रहा था. कांग्रेस को करीब 13935000 वोट मिले जबकि भाजपा को करीब 13757000 वोट मिले. दिलचस्प बात यह है कि नोटा के विकल्प को करीब 1.3 फीसदी वोट मिले. इस आधार पर यह कहा गया कि भाजपा इस बार नोटा से भी हार गई.फिर भी अपने औचित्य से लड़ रहा नोटा 2009 में लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल हुआ नोटा यानि की नन ऑफ दि अबव (इनमें से कोई नहीं) भारत में मतदाता की शक्ति को बढ़ाता जरूर है, लेकिन फिर भी ईवीएम में शामिल यह बटन अपने औचित्य की तलाश अब भी कर रहा है. दरअसल भारतीय चुनावी व्यवस्था के अनुसार अगर किसी सीट पर सर्वाधिक नोटा पड़ता है तो उसके बाद दूसरे नंबर पर आने वाले प्रत्याशी को जीता हुआ माना जाएगा. नोटा अभी तक केवल प्रत्याशी पसंद न आने का विकल्प भर है. दोबारा चुनाव कराने का जनादेश नहीं.