रिम्स में भर्ती लालू यादव क्या शरद यादव के जरिए कर रहे हैं महागठबंधन को मैनेज ?

झारखंड चुनाव का असर सीधे बिहार विधानसभा पर पड़ेगा, इस बात को राजद सुप्रीमो लालू यादव और शरद यादव खूब समझते हैं. महागठबंधन के सीनियर नेताओं ने रांची में मुलाकात की और झारखंड में महागठबंधन की राह में अटकाने जा रहे जीतनराम मांझी को मैनेज करने का प्लान बना रहे हैं.

रिम्स में भर्ती लालू यादव क्या शरद यादव के जरिए कर रहे हैं महागठबंधन को मैनेज ?

पटना/रांची: रविवार को लोकतांत्रिक जनता दल के मुखिया शरद यादव रांची रिम्स में लालू प्रसाद यादव से मिले. दोनों की मुलाकात में महागठबंधन के भविष्य के विषय में चर्च हुई. शरद यादव, लालू प्रसाद से सदाबहार करीबियों में दे एक हैं. माना तो यह भी जाता है कि 2015 में लालू यादव (राजद)और नीतीश कुमार (जदयू) के बीच जो दो धुरियों वाला गांठ बन सका, उसका सूत्र शरद यादव ने ही तैयार किया था. अब एक बार फिर महागठबंधन को बिखरने से बचाने के प्रयास में जुटे लोजद प्रमुख ने झारखंड विधानसभा चुनाव में बिहार के पूर्व सीएम व हम के नेता जीतनराम मांझी को मनाने का जिम्मा अपने कंधों पर ले लिया है. चर्चा तो इस बात की भी है कि शरद यादव हम प्रमुख मांझी को मना कर राज्य के चुनाव में महागठबंधन की ओर से प्रचार में भी उतारेंगे.  

झारखंड में जोर-आजमाइश में लगी सारी पार्टियां

दअरसल, महागठबंधन के घटक दलों में से एक हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के मुखिया जीतनराम मांझी पिछले कुछ दिनों से नाराज चल रहे हैं. नाराजगी के कारण उन्होंने राजनीतिक दबाव बनाना भी शुरू कर दिया था. झारखंड चुनाव में महागठबंधन से अलग अपना एक मोर्चा खोलने की जुगत में लग गए थे. इससे झारखंड में जो झामुमो,कांग्रेस और राजद का महागठबंधन बना, उड़की चिंता बढ़ गई थी. झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन, राजद की कमान संभाल रहे तेजस्वी यादव की मुश्किलें बढ़ने लगी थी. और बढ़े भी क्यों न झारखंड में पहले से कम से कम आठ बड़ी पार्टियां चुनावी दंगल में जोर-आजमाइश में लगी हैं. महागठबंधन का सिरा वैसे ही बहुत मजबूत नजर नहीं आ रहा. अब उसी बीच हम के अलग चुनाव लड़ने और महागठबंधन के साथ न देने से थोड़ा ही सही पर दलों को नुकसान उठाना पड़ सकता है. 

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महागठबंधन को लेकर चिंतित हैं लालू 

जीतनराम मांझी के अलग मोर्चा खोलने के फैसले से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की चिंता और भी बढ़ गई थी. राजनीतिक गलियारों में तो चर्चा इस बात की भी थी कि लालू यादव को झारखंड में अलग खोले गए इस मोर्चे के असर बिहार में आगामी विधानसभा में भी होता साफ दिखने लगा था. ऐसे में जीतनराम मांझी को मैनेज करने का फॉर्मूला शरद यादव के पास ही है. दोनों ही कभी जदयू का हिस्सा रहे थे. दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही नेता यह मानते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना राजनीतिक ऊल्लू सीधा करने के लिए इनका इस्तेमाल किया और जब काम बन गया तो चलते बने. 

झारखंड चुनाव का असर होगा बिहार में भी

झारखंड विधानसभा चुनाव के तार बिहार विधानसभा से सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं. भाजपा, जदयू, राजद, कांग्रेस, लोजपा और झामुमो ये ऐसी पार्टियां हैं जो दोनों ही प्रदेशों में चुनाव लड़ती हैं. 2000 से पहले बिहार का हिस्सा रहे इस प्रदेश में पार्टियां अपने चुनावी समीकरण बिठाने में जुटी रहती हैं. राजनीतिक विस्तार  के लिए झारखंड के चुनावी मैदान में इस बार में कई नए योद्धा उतर रहे हैं. जदयू और लोजपा के अलावा मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा पार्टी भी इसी राह पर थी. लेकिन अब लगता है शरद यादव मीडिएटर की भूमिका से उन्हें मना लेंगे. 

महागठबंधन का सब करना चाहते हैं नेतृत्व 

यह जान लेना भी जरूरी है कि महागठबंधन की इन पार्टियों के बीच आखिर किस बात को लेकर खींचतान चल रही है. और क्या जीतनराम मांझी इतने बड़े फैक्टर थे कि शरद यादव को लालू प्रसाद यादव से मिलकर योजना बनानी पड़ी उन्हें मनाने के लिए. दरअसल, बात सिर्फ जीतनराम मांझी तक ही सीमित नहीं हैं और न ही झारखंड में इस उठापटक से राजद और लोजद को कुछ खास फर्क पड़ता है.

यह सारी जद्दोजहद 2020 में बिहार चुनाव में महागठबंधन या यूं कहें कि तेजस्वी यादव की राह आसान कराने के लिहाज से किया जा रहा है. पिछले कुछ दिनों से महागठबंधन के घटक दलों में विधानसभा चुनाव के दौरान नेतृत्वकर्ता के नाम और रार की खबरें लगातार सुर्खियों में है. रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा से ले कर हम के जीतनराम मांझी तक नेतृत्वकर्ता के लिए अपना दांवा ठोंक रहे हैं. 

राजद की कमजोरी का फायदा उठाने की जुगत में घटक दल

महागठबंधन के घटक दलों को लोकसभा चुनाव परिणाम के दौरान आपसी कलह से ये आभास होने लगा कि तेजस्वी यादव में अभी परिपक्वता नहीं आई है. उनका मानना है कि नेतृत्व में अगर बदलाव नहीं किया गया तो महागठबंधन का प्रदर्शन काफी निराशाजनक हो सकता है.  कुछ राजनीतिक पंडित तो यह भी कहते हैं कि उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी के लिए यह एक अच्छा मौका है कि लालू प्रसाद यादव की गैर मौजूदगी में कमजोर राजद से नेतृत्व छीन कर खुद को स्थापित किया जा सके. 

झारखंड चुनाव का परिणाम 23 दिसंबर को आएगा. हो न हो इसका असर बिहार के चुनाव पर भी खूब पड़ेगा. भाजपा और जदयू यहां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं. वहीं महागठबंधन में शामिल राजद 7 सीट पर तो कांग्रेस 31 सीट पर उतरी है. जो भी पार्टी यहां बढ़त बना लेने में सफल होती है, वह बिहार में भी एज वन पाने में सफल होगी, ऐसा माना जा रहा है.