जयललिता और करुणानिधि के बगैर कैसा होगा तमिलनाडु का विधानसभा चुनाव?

तमिलनाडु की जनता आगामी विधानसभा चुनाव में एक नया अध्याय रचने जा रही है. 

Written by - Navin Chauhan | Last Updated : Feb 27, 2021, 07:56 PM IST
  • साल 2016 में हो गया था जयललिता का निधन
  • 2018 में करुणानिधि भी कह गए दुनिया को अलविदा
जयललिता और करुणानिधि के बगैर कैसा होगा तमिलनाडु का विधानसभा चुनाव?

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव की तारीखों का शुक्रवार को चुनाव आयोग ने ऐलान कर दिया. पूरे देश के लोगों की सबसे ज्यादा निगाह पश्चिम बंगाल के चुनाव पर है जहां दीदी की 10 साल से चल रही दबंगई को सीधे तौर पर चुनौती देने भारतीय जनता पार्टी उतरी है. 

ऐसे में दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जहां 4 दशक में पहली बार विधान सभा चुनाव जयललिता और एम करुणानिधि की गैरमौजूदगी में लड़ा जाएगा. 54 साल में पहली बार तमिलनाडु की जनता 'राजनीतिक हीरो या हीरोइन' के बगैर राज्य के नए भाग्य विधाता के साथ-साथ अपने भाग्य का भी फैसला करेगी. दो बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी में तमिलनाडु की जनता आगामी विधानसभा चुनाव में एक नया अध्याय रचने जा रही है. 

जयललिता और करुणानिधि के निधन से पैदा हुआ राजनीतिक शून्य

चार दशक में पहली बार तमिलनाडु के मतदाताओं को बड़े ही मुश्किल राजनीतिक प्रश्न से रूबरू होना पड़ा है. 40 साल से तमिल राजनीति के प्रमुख केंद्र माने जाने वाले करुणानिधि और जयललिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. दिसंबर 2016 में जयललिता का देहांत हो गया था. वहीं करुणानिधि अगस्त 2018 को दुनिया को अलविदा कह गए. ऐसे में किसे और क्यों वोट दिया जाए इस सवाल का जवाब राज्य की जनता को नहीं सूझ रहा है. इन दो दिग्गजों के बगैर तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है. 

विकल्प के रूप में उभरे थे रजनीकांत 

जिस राज्य में फिल्म और राजनीति एक सिक्के के दो पहलू हैं. वहां थलाइवा रजनीकांत ने अपना राजनीतिक सफर शुरू करते ही खत्म कर दिया. फिल्मों में असंभव को संभव करके करोड़ों प्रशंसकों का विश्वास जीतने वाले रजनीकांत अभिनेता से राजनीति की राह में ज्यादा दूर तक नहीं कर सके और घर वापसी का फैसला कर दिया. पहले माना जा रहा था कि रजनी की राजनीति में एंट्री तमिलनाडु की राजनीति को एक नई दिशा देगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका. 

दोनों पार्टियों में चल रही है आंतरिक कलह 

एआईडीएमके की कमान इस बार मुख्यमंत्री पलानीस्वामी के हाथों में होगी वहीं डीएमके की कमान एमके स्टालिन संभालंगे. हालांकि दोनों टीमों के अंदर वर्चस्व की लड़ाई चल रही है. अम्मा के निधन के बाद ओ पनीरसेलम राज्य के नए मुख्यमंत्री बने थे उन्होंने जयललिता की तस्वीर को सामने रखकर कैबिनेट की बैठकें कीं. अम्मा के अस्पताल में इलाज के वक्त वो कार्यवाहक मुख्यमंत्री की भी भूमिका में भी थे. ऐसे में वो मौजूदा मुख्यमंत्री पलानीस्वामी के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं. 

साल 2016 में दोनों पार्टियों का ऐसा था प्रदर्शन

साल 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में जयललिता की पार्टी ने 136 सीट जीती थीं और लगातार दूसरी बार राज्य में सरकार बनाने में सफल रही थीं. हालांकि उनकी पार्टी को साल 2011 की तुलना में कम सीटें मिली लेकिन वो डीएमके को सत्ता से दूर रखने में सफल रही. हालांकि पिछली बार डीएमको का प्रदर्शन 2011 की तुलना में बेहतर था और वो 98 सीट पर कब्जा करने में सफल रही. साल 2011 में डीएमके के खाते में केवल 31 सीट आई थीं. 

क्या होगी शशिकला की भूमिका
जयललिता की सहयोगी मानी जाने वाली शशिकला ने अपनी अलग पार्टी का एएमएमके(अम्मा मक्कल मुनेत्र कडिघम) का गठन किया था. ऐसे में उन्होंने चुनाव से पहले राजनीति में वापसी के संकेत देते हुए बयान दिया है कि जयललिता चाहती थीं कि  AIADMK राज्य की सत्ता में 100 साल बाद भी रहे. ऐसे में उन्होंने कहा है कि आगामी चुनाव एआईएडीमके और एएमएमके को साथ मिलकर लड़ना चाहिए. 

6 अप्रैल को होगा मतदान, एक चरण में होंगे चुनाव 

तमिलनाडु की 234 सीटों के लिए एक चरण में 6 अप्रैल को मतदान होगा और फैसला 2 मई को आएगा. ऐसे में बेहद कम समय में राजनीतिक विवादों को दूर करके पूरे राज्य में चुनावी समीकरणों को साधना दोनों पार्टियों के लिए मुश्किल और चुनौतीपूर्ण काम होगा. चुनावी बाजी इस बार किसके हाथ लगेगी ये कहना मुश्किल नजर आ रहा है लेकिन पलानीसामी ने जिस तरह पार्टी और सत्ता को संभाला उसे देखते हुए AIADMK का दावा फिलहाल मजबूत नजर आ रहा है. 

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