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महाराष्ट्र में शिवसेना का बदलता स्वरूप! यहां पढ़ें- 'ठाकरे फैमिली' का पूरा इतिहास

महाराष्ट्र विधानसभा में वोटिंग के दिन चुनावी मैदान पर घमासान का सिलसिला जारी है. सूबे में शिवसेना और ठाकरे परिवार की हालिया राजनीति पर हर किसी की निगाहें टिकी है, क्योंकि इस बार पहली दफा ठाकरे परिवार का कोई सदस्य रणभूमि में बतौर योद्धा किस्मत आजमा रहा है.

महाराष्ट्र में शिवसेना का बदलता स्वरूप! यहां पढ़ें- 'ठाकरे फैमिली' का पूरा इतिहास

नई दिल्ली: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर हर किसी में खासा उत्साह देखा जा रहा है. पूरे प्रदेश में मेले जैसा माहौल है. लेकिन महाराष्ट्र का सियासी गणित हर किसी को आसानी से समझ नहीं आता है. महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे का बेहद ही अहम किरदार रहा है.

इमरजेंसी और बाल ठाकरे

साल 1975 में जब देश में इंदिरा गांधी सरकार ने इमरजेंसी लगा दी थी. विपक्षी नेताओं को जेल भेजा जाने लगा. महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण ने ठाकरे के सामने दो विकल्प रखे या तो दूसरे विपक्षी नेताओं की तरह गिरफ्तार हो जाएं या फिर मुंबई स्टूडियों मे जाकर इमरजेंसी के समर्थन का ऐलान कर दें. बाला साहेब ने जेल जाना मुनासिब नहीं समझा. वो राजनीति और अपनी जिंदगी को अपनी तरह से जीना चाहते थे. 

ठाकरे परिवार की सियासत में एंट्री

इमरजेंसी के बाद बाल ठाकरे के परिवार ने भी राजनीति में एंट्री लेनी शुरू कर दी. बाल ठाकरे के सबसे बड़े बेटे का नाम बिंदू माधव ठाकरे, दूसरे बेटे का नाम जयदेव ठाकरे और सबसे छोटे बेटे का नाम उद्धव ठाकरे. वहीं बाल ठाकरे के छोटे भाई श्रीकांत ठाकरे का एक बेटा राज ठाकरे भी था. जिसे सालों तक बाल ठाकरे का उत्तराधिकारी माना जाता रहा. बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने जे. जे. स्कूल ऑफ आर्टस से फाइन आर्ट की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजनीति में रूचि लेना शुरू कर दिया. राज ठाकरे भी बाला साहेब की तरह शुरू में कार्टून बनाने लगे. साल 1990 में पहली बार राज की सियासत में एंट्री हुई. राज ठाकरे को शुरू में विद्धार्थी सेना का अध्यक्ष बनाया गया. राज ठाकरे अपने चाचा बाल ठाकरे के हर अंदाज को बारीकी से देखकर उसकी कॉपी करने लगे थे जिसकी वजह से शिवसेना में जूनियर बाल ठाकरे के रूप में उनका कद तेजी से बढ़ने लगा.

1989 में पहली बार शिवसेना का एक उम्मीदवार सांसद पहुंचा. 1995 के विधानसभा चुनावों में शिवसेना बीजेपी गठबंधन की जीत हुई. महाराष्ट्र में बालासाहेब इतना बड़ा चेहरा होने के बाद मुख्यमंत्री नहीं बने लेकिन सत्ता की चाबी उन्हीं के पास रही.

बाला साहब ठाकरे को झटका

1995 में महाराष्ट्र में शिवसेना बीजेपी की सरकार बनी. ये वो वक्त था जब तक बाल ठाकरे, शिवसेना के बाला साहब ठाकरे हो चुके थे. और सियासत के किंगमेकर कहे जाने लगे थे. ऐसा इसलिए भी कि उस वक्त बाला साहब खुद को सूबे की सत्ता के सिरमौर की कुर्सी पर काबिज कर सकते थे लेकिन उन्होंने नहीं किया. लेकिन हां सत्ता की चाबी अपने पास जरूर रखी. इसी दौरान राज ठाकरे, बाला साहेब की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए खुद को तैयार कर रहे थे. सभी ये मानकर बैठे थे कि राज ठाकरे ही उनके राजनीतिक वारिस होंगे. 

साल 1996 में बालासाहेब ठाकरे की जिंदगी की चार बड़ी घटना

  1. उनके सबसे छोटे बेटे उद्धव ठाकरे ने राजनीति में एंट्री की.
  2. उनकी पत्नी मीना ठाकरे का निधन हो गया.
  3. सबसे बड़े बेटे बिंदु माधव सड़क दुर्घटना में मारे गए.
  4. 1996 में ही राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच की वर्चस्व और बिरासत की लड़ाई भी सामने आने लगी.

इन चारों घटनाओं ने बाला साहब ठाकरे को जेहनी तौर पर कमजोर कर दिया. एक किंगमेकर के भरोसे की इमारत टूट कर बिखरने लगी. और इसी का नतीजा 1999 में विधानसभा में देखने को मिला. इन चुनाव में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की करारी हार हुई.

भाई भाई न रहा

1996 शुरू हुई भाई भाई के बीच कलह 2002 तक खुल कर सामने आने लगे. पहली बार ऐसा हुआ कि राज ठाकरे ने खुली बगावत कर दी. राजनीतिक गलियारों में ये माना जाने लगा कि ये कलह शिवसेना को हासिये पर ले आएगा. राज ठाकरे की बगावत के बावजूद 2002 के चुनावों में उद्धव की जीत हुई. 2003 में हुए पार्टी सम्मेलन में ठाकरे वंश का बंटवारा हमेशा के लिए हो गया, क्योंकि उद्धव ठाकरे को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया. 2005 में ठाकरे परिवार टूट गया और राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ने की घोषणा कर दी. 2006 में राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी बनाई जिसका नाम रखा महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना रखा. मराठियों की वोट बैंक की खातिर अपने चाचा बालासाहेब के नख्शे कदम पर चलते हुए उत्तर भारतीयों के खिलाफ मुहिम छेड़ दी. लेकिन वो दौर कुछ और था और ये दौर कुछ और. राज ठाकरे को अपने इस मुहिम के चलते फायदे से ज्यादा नुकसान हुआ. बीएमसी चुनावों में तो राज ठाकरे, शिवसेना को नुकसान नहीं पहुंचा पाए. ये वो वक्त था जिसके बाद राज ठाकरे भूल सुधार करते हुए जनता से माफी भी मांगी और इसी का नतीजा था कि 2009 के विधानसभा के चुनावों में राज ठाकरे ने शिवसेना के वोट बैंक में सेंध लगा दी. शिवसेना चौथे पायदान पर आ गिरी जबकि राज ठाकरे की पार्टी ने 13 सीटों पर कब्जा कर लिया.

नवंबर 2012 में बाला साहब ठाकरे का निधन हो गया. कई दशक तक जो परिवार महाराष्ट्र में किंगमेकर की भूमिका अदा कर रहा था उसे किसी की पनाह में जाना पड़ा. साल 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में 25 साल पूराने गठबंधन को तोड़कर बीजेपी से अलग होकर चुनाव लड़ने की गलती ने शिवसेना से किंगमेकर का ओहदा छीन लिया. बीजेपी अकेले राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. आखिरकार दोबारा गठबंधन की सरकार बनी. मख्यमंत्री बीजेपी के देवेंद्र फड़नवीस बने. राज्य में शिवसेना के साथ बीजेपी का गठबंधन तो हुआ लेकिन पहले जैसी बात नहीं रही. 

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पहली बार ठाकरे परिवार के किसी सदस्य ने ताल ठोकी है. ऐसे में इस वक्त हर किसी की नजर आदित्य ठाकरे पर है. आदित्य मुंबई की वर्ली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. इस बार के चुनावी नतीजे किसे महाराष्ट्र में दिवाली मनाने की इजाजत देंगे, ये आने वाले 24 अक्टूबर को ही मालूम चल पाएगा.