उद्धव को डर है, सीएम कुर्सी आए पर वजूद चला न जाए

एक मशहूर शेर है, आईना जब भी उठाया करो, पहले देखा करो फिर दिखाया करो. महाराष्ट्र में सीएम कुर्सी के लिए उद्धव ठाकरे की हां या ना के पीछे कुछ ऐसी ही मनोदशा है. वह शायद इसलिए परेशान हैं कि आज तक जिन विरोधी दलों को वह आईना दिखाते रहे हैं उन्हीं के साथ गलबहियां करने पर जनता उन्हें किस नजर से देखेगी. एक पल में सत्ता का सुख दिखता है तो अगले ही पल ठाकरे सरनेम का दशकों पुराना आभामंडल सिर चढ़ जाता है. 

उद्धव को डर है, सीएम कुर्सी आए पर वजूद चला न जाए

मुंबईः इस वक्त अजय देवगन अपनी आने वाली फिल्म तानाजी को लेकर चर्चा में हैं. शिवाजी के सिपहसालारों में खास तानाजी सिंहगढ़ की लड़ाई के लिए जाने जाते हैं. 1670 ईस्वी में जब शिवाजी महाराज ने सिंहगढ़ का किला फतह किया तो तानाजी को इस युद्ध में वीरगति मिली. दुःखी शिवाजी ने कहा, गढ़ तो आया पर सिंह चला गया. इस समय हमारी आंखों के सामने महाराष्ट्र की विधानसभा है. इसकी सीएम कुर्सी खाली है. उद्धव ठाकरे कभी हां तो कभी ना वाले मोड में हैं. इस हां-ना की अनसुलझी पहेली के पीछे कहीं एक डर तो नहीं ? कहीं यह डर वीर शिवाजी के ऐतिहासिक वाक्य जैसा तो नहीं, कि सीएम पद तो आए पर अस्तित्व, अस्मिता, साख हाथ से चली जाए ? 

एक विचार, एक आंदोलन रही है शिवसेना
शिवसेना भले ही लंबे समय से चुनावी रण में हिस्सा लेती रही है, लेकिन इसकी भूमिका कभी भी राजनीति करने वाली पार्टी की तरह नहीं रही है. बल्कि कई दफा यह किंगमेकर बन कर रही है. यह किसी पार्टी से अधिक एक विचार रही है जो मराठा मानुष की सोच खुद में जिंदा रखती आई है, इस अस्मिता को एक व्यक्ति का जामा पहनाती आई है और इस साख को एक नाम से पुकारती आई है.

कुल मिलाकर बाला साहेब ठाकरे की छवि लोकतंत्र के बीच में भी रहते हुए उस राजा की तरह थी, जिसका राज्याभिषेक तो नहीं हुआ है, लेकिन जनता के समर्थित विचारों ने उसमें अपना प्रतिनिधि खोजा है. यही वजह है कि मातोश्री की साख किसी राजदरबार जैसी रही है. उद्धव पर यह साख बनाए रखने का दबाव है. उन्हें डर है कि सीएम बनने के बाद वह शायद ही इले बचा पाएं. लिहाजा वह इस कुर्सी के लिए कभी हां तो कभी ना कर रहे हैं. 

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ठाकरे का खून और जी-हजूरी, आखिर कैसे?
बाला साहेब ठाकरे वाले राजनीति के दौर को याद करें, जो आभा जेहन में आती है, उसमें ठाकरे ही नेता नजर आते हैं और उनका नाम ही विचारधारा की तरह दिखता है. बतौर संगठन शिवसेना का भरोसा लोकतंत्र के मूल्यों में बहुत अधिक नहीं रहा. इस तथ्य के लिए शिवसेना के तौर-तरीकों पर भी गौर कर लेना चाहिए. यानी कि 1991 का वह साल आंखों के आगे आता है जब भारत-पाक मैच का विरोध करने के लिए शिवसैनिकों ने कथित तौर पर वानखेड़े स्टेडियम की पिच खोद डाली थी.

इसी तरह फिल्मों का विरोध, वैलेंटाइन का विरोध इसी कड़ी में शामिल हैं. महाराष्ट्र का नाम लेते ही जो ठाकरे नाम सामने आता है उसका आभामंडल ही शिवसेना और परंपरागत मतदाताओं को उत्साहित करता रहा है. सरकार चलाने के लिए जरूरी होगा कि कई बार सहयोगी दलों की जी-हजूरी की जाए, रूठने-मनाने का दौर चले. यह सारे चरित्र शिवसेना का रेखांकन नहीं करते हैं. लिहाजा उद्धव मुख्यमंत्री के ताज को कांटों भरा समझ रहे होंगें.

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नैतिकता और आत्मा भी कचोटती होगी
यह तीसरा बिंदु कितना सार्थक है वह तो उद्धव ही जानें, लेकिन हम घटनाओं पर बात कर सकते हैं. जब भाजपा-शिवसेना गठबंधन को जीत मिली तो इसे सीधे तौर पर जनादेश समझना चाहिए, वह इसलिए मिला क्योंकि जनता कांग्रेस व एनसीपी को  नकार रही है. जब शिवसेना ने अपनी महत्वकांक्षा जाहिर की तो भाजपा के चाणक्य अमित शाह दिल्ली छोड़कर मातोश्री नहीं पहुंचे. इसके पीछे की वजह नरेंद्र मोदी की उस बात को माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने कहा अब भाजपा को महाराष्ट्र में खुद के दम पर खड़ा होना चाहिए.

इस तरह शिवसेना पर चुप्पी साधने का मतलब कि उनके पास दो ही विकल्प छोड़े गए, या तो भाजपा की बात मानो या फिर साथ छोड़ो. यह साथ छोड़ने वाला विकल्प उद्धव के गले की फांस है. क्योंकि सीधे तौर पर वैचारिक पहचान से समझौता करना फिर उसी जनता का सामना करना बेहद मुश्किल होगा. यानी कि सीएम कुर्सी पर उद्धव बैठेंगे तो अंतरात्मा क्या कहेगी. 

मुख्यमंत्री पद के लिए उद्धव के नाम पर सहमति