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महाराष्ट्र के सियासी ज्वार के बीच आखिर क्यों शांत हैं नितिन गडकरी

बेबाक अंदाज, स्पष्ट राय और जन समर्थन, राजनीति में किसी को कद्दावर हैसियत दिलाने वाले यह तीनों तत्व नितिन गडकरी के पास रहे हैं. फिर भी क्या वजह है कि वह महाराष्ट्र में जारी सियासी घमासान के बीच बिल्कुल चुप हैं. इधर एक उड़ती खबर यह भी आई कि शिवसेना ने भी उन्हें सीएम बनाने की मांग की है. इसके बावजूद उनकी ओर से कोई बयान नहीं आया. क्या 2014 के बाद जिसकी सुगबुगाहट थी वह सच में तब्दील हो रहा है. क्या महाराष्ट्र की सियासत में ऊंचाई रखने वाले नितिन गडकरी भाजपा में अलग-थलग कर दिए गए हैं.

महाराष्ट्र के सियासी ज्वार के बीच आखिर क्यों शांत हैं नितिन गडकरी

नई दिल्लीः महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों के नतीजे आए पूरे 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक सरकार बनने की सुहबुगाहट नहीं लग पा रही है. शिवसेना के अपने हित हैं और भाजपा के अपने. इन दोनों कि निजी हितों का टकराव अभी तो यह साबित कर रहा है कि जनादेश का कोई मतलब नहीं है और चुनाव के बाद भी एक राज्य की विधानसभा को इतने दिनों तक पसोपेश में रखा जा सकता है. खैर लोकतंत्र का जो मजाक उड़ रहा है वह तो जारी ही है और एक-एक कर देवेंद्र फडणवीस, ठाकरे परिवार, अमित शाह, शरद पवार सभी की आवाज सुनाई दे रही है, लेकिन एक कद्दावर शख्स पूरे मंच से नदारद दिख रहा है, वह हैं महाराष्ट्र की राजनीति में दम और खम दोनों रखने वाले नितिन गडकरी

आखिर कहां हैं नितिन गडकरी
महाराष्ट्र की राजनीति के कैनवस पर जो इतने रंग बिखरे पड़े हैं उनमें नितिन गडकरी की रंगत अलग ही है, लेकिन इतने बड़े सियासी ज्वार में वह ठहरे पानी से व्यवहार क्यों कर रहे हैं समझ से परे है. भाजपा-शिवसेना के जारी गतिरोध के बीच एक उड़ती खबर यह भी आई कि शिवसेना अपनी कई मांगों के साथ इस पर भी अड़ी है कि वह फडणवीस के बजाय नितिन गडकरी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रही है. इस पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने तो चुप्पी साधकर रखी ही, लेकिन नितिन गडकरी की ओर से भी कोई बयान नहीं सामने आया. यहां तक कि उन्होंने इसे खारिज भी नहीं किया. 

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खैर, वह चुनाव में भी नजर नहीं आए थे
राज्य में जब विधानसभा चुनाव चरम पर थे, तब भाजपा की प्रचार सभाओं में नितिन गडकरी का नाम कहीं नहीं दिख रहा था. चुनाव प्रचार के बैनर-पोस्टर तक से उनका चेहरा नदारद रहा था. इस समय वह सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय का पदभार संभाल रहे हैं, और इससे जुड़े काम और उपलब्धियों के बयान लगातार जारी कर रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी और शाह ने महाराष्ट्र में चुनावी रैलियां की गडकरी नहीं दिखे, इस समय सरकार नहीं बन पा रही है, गडकरी नहीं बोल रहे हैं. उनकी खामोशी भी अलग-अलग अटकलों को हवा दे रही है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति में अप्रासंगिक बनाने की कोशिश तो नहीं हो रही है. 

शपथ ग्रहण में भी अलग दिखे थे


मोदी सरकार की दूसरी पारी का शपथ ग्रहण समारोह था. सभी मंत्री-नेता एक-दूसरे से मिल रहे थे. बातचीत कर रहे थे. इसके विपरीत नितिन गडकरी व्यवहार के बिल्कुल उलट चुपचाप से थे. वह अकेले ही थे बल्कि शपथ समारोह में भी पहले ही पहुंच गए थे. इस दौरान वह किसी साथी मंत्री या नेता के साथ घुलेमिले भी नहीं. मीडिया में जारी एक विडियो में राजनाथ सिंह व अमित शाह तो आपस में बात कर रहे थे, लेकिन उनके ठीक बगल में बैठे नितिन गडकरी बेहद गंभीर व शांत थे. उन्होंने मीडिया से भी बात नहीं की थी और मंत्री बनने के बाद भी कुछ नहीं बोले थे. उसी शाम वह नागपुर के लिए रवाना हो गए थे. 

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क्या शाह पर निशाना साधना है वजह
गडकरी की चुप्पी को लेकर विपक्ष ही नहीं बल्कि भाजपा के भीतर की ही खुसुर-फुसुर बाहर आ रही है. कहा जा है कि वे काफी पहले से अलग-थलग किए जा रहे हैं और इसकी शुरुआत तब से होती है जब चुनाव से पहले उन्होंने शीर्ष नेतृत्व खासकर अमित शाह की कार्यशैली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे. मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जब भाजपा के हाथ से सत्ता निकली तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर सीधा निशाना साधा था. उन्होंने कहा था, जब विधायक और सांसद हारते हैं तो जिम्मेदारी पार्टी अध्यक्ष की ही होती है. यह बयान शाह को नागवार गुजरा था. इसके बाद से वह अलग पड़ गए. महाराष्ट्र चुनाव 2014 में सीएम पद के तौर पर उनकी राह रोक दी गई और राजनीति में उनसे कई साल जूनियर रहे देवेंद्र फडणवीस सीएम बन गए.

आरएसएस के रहे हैं चहेते, पर शायद अब नहीं
साल 2010 से 2013 तक नितिन गडकरी पार्टी अध्यक्ष रहे हैं. 2014 आते तक उनका नाम प्रधानमंत्री की दावेदारी वाली सूची से बाहर हो गया. विधानसभाओं में हार के बाद उन्होंने भड़ास निकाली थी, लेकिन आरएसएस ने इस पर कुछ नहीं कहा. इसके बाद 2019 में जब मोदी-शाह की जोड़ी ने बहुमत हासिल किया तो आरएसएस अब कुछ और कहने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं रह गई. सूत्र बताते हैं कि इसके पहले गडकरी को पार्टी के मार्गदर्शन मंडल का समर्थन मिल रहा था. इसमें कुछ केंद्रीय मंत्री और संघ से जुड़े लोग भी शामिल थे. उस दौरान सहयोगी दलों की ओर से यह कहा जाने लगा था कि 2019 में भाजपा को अगर बाहर से समर्थन की जरूरत पड़ी तो वे नितिन गडकरी के नाम पर सहमत हो सकते हैं. लेकिन ऐसा मौका ही नहीं आया और गडकरी अकेले पड़ गए.

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