सैफीना के बेटे तैमूर की एक परदादी जो प्लेन उड़ाने वाली पहली मुस्लिम महिला पायलट थीं

आबिदा सुल्तान भारत की दूसरी महिला और पहली मुस्लिम महिला पायलट थीं, जिनको प्लेन उड़ाने का लाइसेंस मिला था. उन्होंने प्लेन उड़ाना बॉम्बे फ्लाइंग क्लब और कोलकाता फ्लाइंग क्लब से सीखा. प्लेन के साथ साथ-साथ कार चलाने और दौड़ाने का भी बहुत शौक था. 

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : May 11, 2021, 10:10 AM IST
  • आबिदा सुल्तान का जन्म 28 अगस्त 1913 में हुआ
  • 11 मई 2002 को पाकिस्तान में ली आखिरी सांस
सैफीना के बेटे तैमूर की एक परदादी जो प्लेन उड़ाने वाली पहली मुस्लिम महिला पायलट थीं

नई दिल्लीः सारा बॉलीवुड एक तरफ और सैफीना के बेटे तैमूर बाबा का चार्म एक तरफ. इन सबसे अलग तैमूर उम्र के किसी दौर में कभी अपने खानदानी इतिहास पर गौर फरमाएंगे तो नवाबों की फैमिली वाला रुतबा-रुआब तो उन्हें समझ में आएगा ही, साथ ही वह यह भी जानेंगे वह ऐसी रॉयल फैमिली से ताल्लुक रखते हैं जिसका सिक्का न सिर्फ हमवतन में जमा रहा है,

बल्कि पड़ोसी मुल्क में भी उनके खानदान की बड़ी इज्जत है. वहां भी उनका ओहदा ऊंचा ही है. 

आज है आबिदा सुल्तान की पुण्यतिथि
आज अचानक से सैफीना के बेटे के बहाने उनके इतिहास में झांकने का जी इसलिए कर आया कि पदौजी खानदान की एक कड़ी जो भोपाल रियासत से निकलती है, वह पाकिस्तान तक जाती है. इस कड़ी का नाम है आबिदा सुल्तान. भोपाल रियासत के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह की बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान. लेकिन उनका परिचय सिर्फ एक नवाब की बेटी होने जितना ही नहीं है. उनका परिचय है कि वह उस दौर में प्लेन उड़ाती थीं, जब महिलाओं के लिए घर से निकलना नामुमकिन था. शिकार करना उनका शगल रहा और सियासी मसले सुलझाना उनका हुनर. आबिदा की बात इसलिए क्योंकि आज ही की तारीख 11 मई 2002 में उनका इंतकाल हो गया था. 

सैफ-करीना से क्या है रिश्ता
सैफ-करीना से रिश्ता समझने के लिए पाकिस्तान ही चलते हैं. पाकिस्तान में जाने-माने डिप्लोमैट (diplomat) रहे हैं शहरयार खान. वह पाकिस्तान में विदेश सेवा में रहे हैं. कई देशों में राजदूत रहे हैं. इसके अलावा पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन भी रहे हैं. आज 87 साल के उम्र में शहरयार को पाकिस्तान में बड़ी इज्जत हासिल है. इसकी वजह उनका खुद का वजूद तो है ही साथ ही अपने पुरखों की कमाई शोहरत भी है. इसमें बड़ा किरदार उनकी मां आबिदा सुल्तान का है. 

यह है पदौदी परिवार से रिश्ता
दरअसल, शहरयार खान का जन्म भोपाल के नवाबी परिवार में 1934 में हुआ था. शहरयार की मां आबिदा और क्रिकेटर रहे नवाब मंसूर अली खान पटौदी की मां साजिदा बेगम सगी बहन थीं. इस रिश्ते के चलते शहरयार शर्मिला टैगोर के देवर, सैफ अली खान के चाचा और करीना के चाचा ससुर लगते हैं. 

भोपाल रियासत को छोड़ चली गईं पाकिस्तान
साल 1926 में भोपाल रियासत के आखिरी नवाब बने हमीदुल्लाह. उनके कोई बेटा तो हुआ नहीं, लेकिन तीन बेटियां थीं. बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान, मंझली साजिदा सुल्तान और छोटी राबिया सुल्तान. हमीदुल्लाह ने अपने बाद रियासत की शासिका मंझली बेटी साजिदा को बनाया. हालांकि उन्हें यह जिम्मेदारी आबिदा को ही देनी थी, लेकिन आबिदा शादी करके पाकिस्तान जा बसीं.

उन्होंने भारत आने से इनकार कर दिया. इसके बाद छोटी बेटी राबिया भी ससुराल चली गईं. साजिदा बेगम की शादी पटौदी राजघराने के नवाब इफ्तिखार अली खान के साथ हुई थी. इन दोनों के तीन बच्चे हुए. जिनमें सबसे बड़े थे मंसूर अली खान पटौदी. वह क्रिकेटर बने और शर्मिला टैगोर से शादी की. बाद में नवाबियत भी उनकी हुई. 

सियासत में भी रहीं आगे
आबिदा उस समय भारत की दशा-दिशा के अनुसार सियासत में भी आगे रहीं. आजादी के आंदोलन में सीधा नहीं तो वैचारिक योगदान उनका भी था. वह गोलमेज सम्मेलन में भी गईं थीं, जिसका उन्होंने अपनी एक किताब में जिक्र किया है. 
वह लिखती हैं कि '1932 में भारत की आजादी के लिए प्रथम गोलमेज कांफ्रेंस का आयोजन इंग्लैंड में किया गया था मैं अपने पिता के साथ, जो अविभाजित भारत के चैंबर ऑफ प्रिंसेस के अध्यक्ष थे, इंग्लैंड की यात्रा पर गईं. जिस जहाज 'केसर-ए-हिंद' में हम इंग्लैंड जा रहे थे उसमें महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडू और जौहर बंधु भी साथ थे. 

महात्मी गांधी तृतीय श्रेणी में क्यों?
मैं इस बात से असमंजस में थीं कि जहां सारे वरिष्ठ नेता प्रथम श्रेणी में सफर कर रहे हैं, वहीं महात्मा गांधी की तृतीय श्रेणी में क्यों सफर कर रहे हैं. इसका जवाब सरोजिनी नायडू ने दिया. सरोजिनी नायडू ने बताया कि बेटा यह तीसरी श्रेणी का सफर ब्रिटिश सरकार को सबसे महंगा पड़ रहा है ! दूसरी बात जिसने मुझे आश्चर्य में डाल रखा था वह यह थी कि इस सफर में महात्मा गांधी अपने साथ एक बकरी को भी इंग्लैंड लेकर जा रहे.

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कुरवाई के नवाब से हुई शादी
आबिदा की शादी 18 जून 1926 को कुरवाई के नवाब सरवर अली खान से हुई थी. 1949 में उन्होंने भारत छोड़ दिया और पाकिस्तान चली गईं. आबिदा सुल्तान ने अपना आशियाना कराची में बनाया. पति के साथ विवाह ज्यादा नहीं चला.आबिदा ने बेटे शहरयार की कस्टडी ले ली.आबिदा सुल्तान शुरू से ही एक बगावती शहजादी रहीं.वह एक साहसी महिला थी. वे वह सारे काम करतीं थीं जो उस दौर में दूसरी महिलाएं सोच भी नहीं सकती थीं. बचपन से ही शिकार की शौकीन थीं. उन्होंने अपनी पूरी जीवन  में 73 शेरों का शिकार किया है जिसमें ज्यादातर शिकार 20 साल की आयु से पहले के है.  

पहली मुस्लिम महिला पायलट
आबिदा सुल्तान भारत की दूसरी महिला और पहली मुस्लिम महिला पायलट थीं, जिनको प्लेन उड़ाने का लाइसेंस मिला था. उन्होंने प्लेन उड़ाना बॉम्बे फ्लाइंग क्लब और कोलकाता फ्लाइंग क्लब से सीखा. प्लेन के साथ साथ-साथ कार चलाने और दौड़ाने का भी बहुत शौक था. बचपन में उनकी दादी ने उन्हें कार सीखने के लिए प्रेरित किया. एक काली डेमलर कार सुबह आकर खड़ी होती थी जिसमें आबिदा खुद कार चलाकर अपनी दादी को उनकी पसंदीदी जगह पर ले जातीं थीं. 

आबिदा सुल्तान की आत्मकथा मेमोयर्स ऑफ ए प्रिंसेस नाम से मौजूद है. इसमें जिक्र है पाकिस्तान में उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा मगर धीरे-धीरे स्थितियां अनुकूल हो गईं. वह पाकिस्तान की पहली महिला प्रोटोकॉल मिनिस्टर बनी 1954 में उनको पाकिस्तान की तरफ से यूनाइटेड नेशन में एंबेसडर के तौर पर भेजा और 1958 में वह पाकिस्तान की चिली और ब्राजील में राजदूत रहीं. 

11 मई 2002 को कराची के एक अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से राजकुमारी आबिदा सुल्तान का निधन हो गया. 

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