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जिन्ना ने महत्मा कहने से किया था मना, यहां पढ़ें- बापू के 10 अनसुने किस्से

बापू ने अपने ही घर में भाई के सोने के कड़े का टुकड़ा चुराकर बेच दिया था. और अपना कर्जा चुका दिया. लेकिन महात्मा गांधी का मन खुद को इस अपराध के बाद बेचैन हो गया. और उन्होंने अपनी गलतियों को अपने पिता के सामने पत्र के जरिए बता दिया.

जिन्ना ने महत्मा कहने से किया था मना, यहां पढ़ें- बापू के 10 अनसुने किस्से

नई दिल्ली: एक मोहन जो राष्ट्रपिता बन गये, एक मोहन जो डरपोक से निडर बन गये, एक मोहन जिसने घर में चोरी की लेकिन बाद में सत्य के राह पर चलने वाले सबक बन गए, बापू का पूरा नाम मोहन दास करमचंद गांधी था. जिसे आज हम सभी राष्ट्रपिता कहकर पुकारते हैं. नीचे पढ़िए बापू की वो अनसुनी कहानी जिससे शायद बहुत सारे लोग अनजान होंगे.

1). राजा हरिशचंद्र से सीखा सत्य की राह पर चलना

मोहन दास अपने पिता करमचंद गांधी की तीसरी पत्नी के संतान थे. लेकिन तीनों भाईयों में सबसे छोटा होने का कारण वो अपने घर के लाडले थे. हालांकि पिता करमचंद गांधी भी भाईयों के पढ़ाई पर समान रूप से फिक्रमंद थे. लेकिन मोहन का मन पढाई में नहीं लगा. चाहें, पोरबंदर के मीडिल स्कूल में हो या राजकोट के हाई स्कूल में मोहन दास हमेशा मीडिल दर्जे के छात्र ही रहे. लेकिन उन्हें पुस्तकें पढ़ने का बहुत ही शौक था जब भी महात्मा गांधी को कोई अच्छी पुस्तक मिलती तो उसे खूब मन लगाकर पढ़ते थे. एक बार महात्मा गांधी को एक ऐसा पुस्तक मिला जिसमे श्रवण कुमार और उनके माता पिता के सेवा की कहानी थी. किस प्रकार श्रवण अपने प्राणों की आहुति देकर भी अपने माता पिता की सेवा करते है. जिसे पढ़कर महात्मा गांधी बहुत ही प्रभावित हुए और उन्होंने निश्चय किया कि वो भी श्रवण कुमार की तरह अपने माता पिता की सेवा करेंगे. जब उन्हें अपने पड़ोस में हरिचन्द्र के जीवन पर आधारित नाटक को देखने का मौका मिला हरिश्चन्द्र के नाटक को देखकर महात्मा गांधी के आंखों में आंसू आ गए.

2). बचपन में भूत-प्रेत से डरते थे गांधी जी

मोहनदास बचपन से बेहद डरपोक किस्म के बच्चे थे. जैसा आमतौर पर होता है. मोहन के डरपोक के स्वभाव से उनके भाई पूरी तरह वाकिफ थे. लिहाजा जब कभी उनकी शरारत होती उन्हें भूत प्रेत की कहानी सुना कर डरा दिया जाता था. वो रात के अंधेरे में अपने घर में जाने से डरते थे. ऐसा देखकर उनके घर में काम करने वाली नौकरानी रम्भा ने समझाया की जब भी तुम्हें डर लगे राम का नाम लेना सब डर भाग जाएगा. इस तरह गांधी जी बचपन से अपनी जुबान से राम का नाम रटने लगे. और अपने डर को दूर करते रहे. राम के नाम से इतना प्रेम हो गया था कि आखिरी सांस में भी उसकी जुबां से कुछ निकला था तो वो लफ्ज थे हे राम...

3). स्कूल में सीखा सत्य की राह पर चलना

एक बार गांधी जी के स्कूल में निरीक्षण करने बड़े अधिकारी आए. और फिर उन्होंने क्लास के लडकों को कुछ अंग्रेजी के शब्द लिखने को दिए. सबने सही लिखा लेकिन गांधी जी ने एक शब्द गलत लिख दिया था. हालांकि उनके अध्यापक ने इशारे से उस शब्द को सही करने को कहा लेकिन मोहन दास ने ऐसा नहीं किया. सभी लडकों के सभी शब्द सही निकले लेकिन महात्मा गांधी का एक शब्द गलत लिखा हुआ था. फिर बाद में जब उनके अध्यापक ने उनसे सवाल किया तो उनका जवाब था कि जब मैंने गलत लिख ही दिया तो किसी के बताने से वो कैसे सही हो सकता है. जब तक वो मुझे खुद सही न करने आए और अगर मैं आपके बताने पर लिख भी देता तो मैं निरीक्षक के सामने खुद को झूठा बना लेता. 

4). कुसंगति ने बिगाड़ा लेकिन जल्द लिया सबक

एक बार बुरे दोस्त की कुसंगति में आने पर मोहन को बीडी की लत गई और उस लड़के के कहने पर महात्मा गांधी चोरी छिपे मांस भी खाने लगे. क्योंकि महात्मा गांधी के घर पर सभी शाकाहारी थे और इस तरह अपने गलत आदत के कारण उन्हें चोरी करने की भी आदत पड़ गयी. और अपनी इसी आदत के कारण उन्होंने अपने ही घर में भाई के सोने के कड़े का टुकड़ा चुराकर बेच दिया था. और अपना कर्जा चुका दिया. लेकिन महात्मा गांधी का मन खुद को इस अपराध के बाद बेचैन हो गया. और उन्होंने अपनी गलतियों को अपने पिता के सामने पत्र के जरिए बता दिया. यह सब पढ़कर उनके पिताजी कुछ भी बोल न सके और महात्मा गांधी द्वारा लिखा गया पत्र फाड़कर फेंक दिया. यह देखकर महात्मा गांधी फूटफूटकर रोने लगे और प्रण लिया की आज के बाद वे सारे बुरे काम छोड़ देंगे.

5). दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेज बापू को कहते थे कुली

गांधी जी की शादी 14 साल की उम्र में ही कस्तूरबा गांधी से कर दी गई. गांधी जी ने कस्तूरबा गांधी को पढ़ाया लिखाया. साथ ही कस्तूरबा भी एक आदर्श पत्नी की तरह हमेशा गांधी जी के साथ खड़ी रहीं. कस्तूरबा से गांधी जी की चार संतानें हुईं. हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास. 1891 में इंगलैंड से वकालत की पढ़ाई करके वापस लौटे तो मां चल बसीं. किसी तरह खुद को संभाला और भारत में वकालत करने लगे. लेकिन उनकी वकालत नहीं चली. बाद में जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के व्यापारी दादा अब्दुल्ला के कानूनी सलाहकार बनने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और वो डरबन चले गए. डरबन में एक हफ्ता बिताने के बाद वो एक दूसरे शहर प्रिटोरिया के लिए रवाना हुए.
दक्षिण अफ्रीका में गोरे अंग्रेज भारतीयों को कुली कहकर पुकारते थे और भारतीयों के साथ वहां बहुत बुरा बर्ताव होता था. जिसका सामना गांधी जी को भी करना पड़ा था. जब वे एक दिन रेलगाड़ी के फर्स्ट क्लास डिब्बे में बैठकर जा रहे थे तो उस डिब्बे में कुछ अंग्रेज प्रवेश किए और उसने शिकायत किया की इस कुली को दुसरे डिब्बे में बैठाया जाए. लेकिन गांधी जी ने अपने इस डिब्बे का टिकट दिखाया, इसके बावजूद भी उस रेल के कर्मचारी नहीं माने और महात्मा गांधी के सामान को बाहर उठाकर फेंक दिया और गांधी जी को धक्के मारकर बहार कर दिया गया. उस वक्त तो गांधी जी अपमान का घूंट पीकर रह गए लेकिन उन्होंने प्रण लिया कि अंग्रेजों के अत्याचार को और नहीं सहेंगे. फिर यही से उन्होंने सत्याग्रह आन्दोलन की शुरुआत की.

6). जब अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा

साल 1916 में काशी जो की अब वाराणसी के नाम से जाना जाता है. उस समय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के शिलान्यास के दौरान दिल्ली से वायसराय गये थे. इस मौके पर गांधी जी को भी बुलाया गया था. कार्यक्रम के दौरान महात्मा गांधी ने भारतीयों के सामने अंग्रेजी में अपना पहला भाषण दिया. लेकिन जब महात्मा गांधी ने भाषण की शुरुआत की तब उन्होंने कहा कि बड़े शर्म की बात है अपने ही देश में अपने लोगों के सामने मुझे हिंदी न बोलकर अंग्रेजी में बोलना पड़ रहा है. ऐसा बोलना वहां मौजूद अंग्रेजों के गुस्से के आग में घी डालने के समान था. लेकिन महात्मा गांधी बिना किसी से डरे अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से बोलते रहे. और उनका वही भाषण लोगों के दिलों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ नफरत भरने का काम किया. जो आगे चलकर आजादी की क्रांति बन गई.

7). जिन्ना ने महत्मा कहने से किया था मना

मोहम्मद अली जिन्ना ने बापू को महत्मा कहने से इनकार कर दिया था. बात 1920 की है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठक थी. उस वक्त गांधी जी को महत्मा गांधी कहने का रिवाज बन गया था. लेकिन जिन्ना उन्हें मिस्टर गांधी कहकर संबोधित करते थे. खिलाफत आंदोलन के नेता मौलाना मोहम्मद अली ने जिन्ना का विरोध किया. और कहा कि वो गांधी जी को महत्मा कहें लेकिन जिन्ना अपनी जिद पर अड़े रहे. तब गांधी जी खड़े हुए और बोले कि मैं महत्मा नहीं हूं. मैं एक साधारण आदमी हूं. किसी को मेरे लिए कोई खास शब्द बोलने के लिए कहकर मेरा सम्मान नहीं करा सकते. गांधी जी ने कहा कि हम दूसरों पर अपना विचार थोपकर असली आजादी हासिल नहीं कर सकते. हर किसी को अपनी मर्जी से सोचने और बोलने की आजादी है.

8). डरबन कोर्ट में नस्लभेद का सामना

गांधी जी 1893 में साउथ अफ़्रीकन स्टेट ऑफ़ नेटल के शहर डरबन के लिए रवाना हुए थे. वहां उन्हें सबसे पहले रंगभेद का सामना डरबन के कोर्ट रूम में ही करना पड़ा. जब उन्हें पगड़ी हटाने के लिए कहा गया, उन्होंने मना कर दिया और कोर्ट रूम छोड़ दिया. उनका मजाक भी उड़ाया गया, लेकिन वो हिम्मत नहीं हारे. 7 जून 1983 के ट्रेन ट्रिप के दौरान उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसने उनकी जिंदगी बदलकर रख दी. फर्स्ट क्लास रेलवे कम्पार्टमेंट में बैठने पर अंग्रेजों ने आपत्ति जताई और उन्हें धक्का देकर बाहर ढ़केल दिया गया. इस घटना के बाद उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि नस्लभेद की समस्या को वो जड़ से उखाड़कर ही दम लेंगे. 1894 में उन्होंने नेटल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की. और नागरिक समानता की जंग में विजय प्राप्त की. आखिरकार ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और साउध अफ्रीका के नागरिकों को समानता मिली. गांधी जी ने अपने अहिंसक प्रोटेस्ट को सत्याग्रह का नाम दिया. साउध अफ्रीका में गांधी जी ने 21 साल गुजारे और चार बार जेल गए.

9). 17 बार अनशन 07 बार जेल

ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ गांधी जी 17 बार अनशन पर बैठे थे. सात बार उन्हें जेल में डाला गया था. यही नहीं आंदोलनों के दौरान 5 बार उन्हें जान से मारने की कोशिश की गई थी. साल 1930 में गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नमक आंदोलन शुरू किया. ये आंदोलन उस एक्ट के खिलाफ था जिसके मुताबिक कोई भारतीय ना तो नमक बना सकता था और ना ही बेच सकता था. गांधी जी ने इसका विरोध किया और सत्याग्रह किया. जिसमें उन्होंने 390 किमी. पैदल यात्रा की. 12 मार्च, 1930 को गांधी जी ने एक धोती और शाल पहनकर एक लकड़ी के सहारे साबरमती से ये मार्च शुरू किया था. 24 दिन बाद वो कोस्टल टाउन दांडी पहुंचे, और वहां समुंद्री जल से नमक बनाकर अंग्रेजों के बनाए नियम को तोडा. इस यात्रा के बाद पूरे देश में क्रांति की लहर दौड़ी और 60 हजार भारतीयों को साल्ट एक्ट तोड़ने के जुर्म में जेल में डाला गया. टाइम मैगजीन ने उन्हें मैन ऑफ़ दी ईयर का ख़िताब दिया. जनवरी 1931 में उन्हें जेल से छोड़ा गया और 2 महीने बाद उन्होंने लार्ड इरविन से समझौता किया. स्वराज्य के लिए ये सत्याग्रह मील का पत्थर साबित हुआ. 1942 में जब ब्रिटेन दूसरे विश्व युद्ध में उलझा हुआ था. गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरूआत की. पूरा हिंदुस्तान सड़कों में आ गया. गांधी जी समेत तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, लेकिन ये आंदोलन ने अंग्रेजों के खिलाफ ताबूत में आखिरी कील ठोक दी.

10). बापू ने दुनिया को सिखाया अहिंसा का पाठ

गांधी जी को ना सिर्फ भारत बल्कि दुनिया में भी विशेष ख्याति प्राप्त है. इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के महान वैज्ञानिकों में शुमार आइंस्टीन ने कहा था कि कुछ सालों बाद लोग इस बात पर यकीन नहीं करेंगे कि महात्मा गांधी जैसे शख्स कभी इस धरती पर भी हो सकते हैं. महात्मा गांधी वो शख्सियत थे जिन्हें पांच बार नोबेल पीस प्राइज के लिए नामांकित किया गया. महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा 8 किलोमीटर तक चली थी. गांधी जी को ही सम्मान देने के लिए एप्पल के संस्थापक स्टीब जॉब्स गोल चश्मा पहनते थे. कहा जाता है कि महात्मा गांधी हर रोज 18 किलोमीटर पैदल चलते थे यानि कि पूरी जिंदगी में दुनिया के दो चक्कर. उनके नाम पर भारत में 53 मुख्य मार्ग है तो विदेश में 48 सड़कें. गांधी जी की वजह से ही 4 कांटिनेंट और 12 देशों में सिविल राइट शुरू हुआ. जिस अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गांधी जी ने आंदोलन किए उसी अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी मौत के 21 साल बाद अपने देश में स्टांप जारी किया.