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क्या फिर से शिवसेना को मझधार में छोड़ने के फिराक में हैं शाह? जानिए 4 बड़ी वजह

बाला साहेब ठाकरे के जमाने में महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना बड़े भाई और बीजेपी छोटे भाई की भूमिका में दिखाई देते थे. लेकिन अब वक्त बदल गया है. साल 2014 में अलग-अलग चुनाव लड़ने के बाद से शिवसेना ने अपने बड़े भाई का कद महाराष्ट्र में लगभग खो दिया है. क्या इस बार भी ऐसा ही होने वाला है?

क्या फिर से शिवसेना को मझधार में छोड़ने के फिराक में हैं शाह? जानिए 4 बड़ी वजह

नई दिल्ली: महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. सियासी रणभूमि पर उतरने के लिए सभी योद्धाओं ने अपनी-अपनी कमर कस ली है. लेकिन महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में बीजेपी और शिवसेना के बीच गठबंधन को लेकर फॉर्मूला अभी तक सेट नहीं हो पाया है. नामांकन दाखिल होने में 3 दिन का वक्त बचा है, लेकिन इस गठबंधन पर अभी तक धुंधला बादल मंडरा रहा है. बीजेपी ने अपने 125 प्रत्याशियों के नाम का ऐलान कर दिया, लेकिन शिवसेना के साथ कितने सीटों पर बात बनी है, इससे अभी तक पर्दा नहीं उठाया है. ऐसे में सवाल यही है कि क्या फिर से अमित शाह शिवसेना को बीच मझधार में छोड़ने के फिराक में हैं.

1). बीजेपी-शिवसेना में नहीं बनी कई मुद्दों पर बात

मंगलवार को दोनों पार्टियों की ओर से प्रत्याशियों के ऐलान की पहली सूची जारी कर दी गई है. शिवसेना ने जहां 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी और 124 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. तो वहीं बीजेपी ने भी 125 प्रत्याशियों के नाम पर मुहर लगा दिया है. लेकिन गठबंधन को लेकर अभी तक तस्वीरें साफ नहीं हो पाई हैं. कौन सी पार्टी कितने सीटों पर चुनाव लड़ेगी इस पर फाइनल फैसला अभी तक अंधेरे में हैं. ऐसे में ये कहना गलत नहीं है, कि कई ऐसे मसले हैं जिसपर शिवसेना और बीजेपी में बात नहीं बन रही है. दोनों पार्टियों के रवैये से ये साफ होता दिखाई दे रहा है कि सीट शेयरिंग का फॉर्मूला अभी तक अधर में लटका हुआ है. 

2). मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर 'रार'

गठबंधन की इस खींचतान के बीच सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस से लेकर बीजेपी आला कमान तक की चिंताए बढ़ा दी है. लेकिन इसके कुछ देर बाद ही बीजेपी ने अपने 125 प्रत्याशियों के नाम की घोषणा कर दी. वहीं दूसरी ओर ठाकरे खानदान से पहली बार चुनावी मैदान में दांव आजमाने के लिए सामने आया है, शिवसेना के इतिहास में ऐसा पहली बार है. ऐसे में अंदरूनी खेमे से ये ख़बर आ रही है कि शिवसेना ने सीएम की कुर्सी पर अपना रूख साफ कर दिया है. उन्होंने शिवसेना से ही सीएम बनाने की मांग रखी है. इस मांग पर बीजेपी टस से मस नहीं होना चाहती है. ये भी एक बड़ी वजह है कि अभी तक सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है. 

3). 2014 में भी बन गए थे ऐसे हालात

साल 2014 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के वक्त बीजेपी और शिवसेना के बीच कुछ ऐसी ही अनबन हुई थी, जिसके बाद शिवसेना ने बीजेपी से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया था. हालांकि इस फैसले के चलते शिवसेना को भारी नुकसान हुआ था. शिवसेना सिर्फ 68 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी. और बीजेपी 122 सीटों पर जीत का डंका बजाकर ये बता दिया था कि अब महाराष्ट्र में बड़ा भाई शिवसेना नहीं बल्कि वो खुद है. पुरानी हार से सीख लेकर शिवसेना इस बार बीजेपी से ज्यादा मोलभाव करने के हालात में नहीं है. क्योंकि उसे इस बार भी डर बना हुआ है कि अगर कहीं 2014 जैसी परिस्थिति बनी तो इसका फायदा फिर से बीजेपी को हो सकता है, वो भी तब जब जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 और तीन-तलाक़ जैसे मुद्दे पर बड़ा फैसला लिया गया हो. इसका फायदा बीजेपी को मिलना लगभग तय है. अमित शाह इसी बात का फायदा उठाकर शिवसेना पर पूरा दबाव बनाने की कोशिश में लगे होंगे.

4). शाह के फडणवीस को सुप्रीम कोर्ट से मात!

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के बीचों-बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने सीएम फडणवीस के खिलाफ 2014 के चुनावी हलफनामे में कथित तौर पर गलत जानकारी देने के लिए मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है. अब फडणवीस पर हलफनामे में जानकारी छिपाने को लेकर केस चलेगा. फडणवीस पर आरोप है कि उन्होंने 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान अपने हलफनामे में 2 लंबित आपराधिक मामलों का जिक्र नहीं किया था. इस मामले में फडणवीस को ट्रायल कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत मिल चुकी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरूद्ध बोस की बेंच ने उन्हें मिली क्लीन चिट को रद्द कर दिया. अब ऐसे में विरोधी खेमे के लोग बीजेपी पर तीखा प्रहार कर रहे हैं. लेकिन बीजेपी ने इसके कुछ देर बाद ही 125 सीट पर अपने प्रत्याशी की घोषणा करके साफ कर दिया, कि महाराष्ट्र चुनाव में वो कोई समझौता करने के मूड में नहीं है. शाह की हमेशा से ही ऐसी नीति रही है कि वो किसी भी छोर से अपनी पार्टी के बैकफुट पर जाने नहीं देते. यही वजह है कि सीएम की कुर्सी को लेकर अभी तक पूरी बीजेपी ने चुप्पी साध रखी है.

अगर अमित शाह ने शिवसेना को बीच मझधार में नहीं छोड़ा तो महाराष्ट्र में बीजेपी, शिवसेना और चार सहयोगी आरएसपी, आरपीआई (आठवले), शिव संग्राम और रैयत क्रांति पार्टी मिलकर चुनाव लड़ेंगी. हालांकि किसके खाते में कितनी सीटें आई है ये अभी तक साफ नहीं है.