इस तरह मॉनसून की 'आपदा' से बच सकती है मुंबई...

मॉनसून आने पर जहां देश के अन्य हिस्सों में खुशियां मनाई जाती है, वहीं मुंबई में मॉनसून खुशियां नहीं आफ़त लेकर आती है.

इस तरह मॉनसून की 'आपदा' से बच सकती है मुंबई...
फोटो साभार: यू-ट्यूब

मुंबई: मॉनसून आने पर जहां देश के अन्य हिस्सों में खुशियां मनाई जाती है, वहीं मुंबई में मॉनसून खुशियां नहीं आफ़त लेकर आती है. चार घंटे की जोरदार बारिश में मुंबई की सड़कें, मुंबई की लाइफ लाइन मुंबई लोकल, मेट्रो, बाज़ार सब कुछ रूक जाती है. मॉनसून के दौरान हर साल महाराष्ट्र की सरकार और मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) कटघरे में खड़ी होती है, जिसके बाद सवाल उठते हैं कि बीएमसी के होने का मतलब क्या है?

बीएमसी हर साल मानसून के नाम पर 1000 करोड़ खर्च करती है. ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त के नाम पर भी करोड़ों खर्च होते हैं, इसके बावजूद जलजमाव होते रहते है. आलम तो ये है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का ड्रेनेज सिस्टम अभी तक अंग्रेजों के ज़माने का है. आज़ादी के बाद हर साल मुंबई की आबादी बढ़ी, सिस्टम पर दबाव बढ़ा लेकिन इसके लिए बीएमसी ने भविष्य का खाका खींचकर कोई काम नहीं किया, जिसके कारण मुंबई हर साल मॉनसून के मौसम में जलजमाव की समस्या से जूझती है. 

 

 

#MumbaiRain effect glimpse... #mulundstation #waterfall

A post shared by Manish Raisinghan (@manishmischief) on

 

साल 2011 में टोक्यो और मुंबई दोनों की जनसंख्या लगभग बराबर थी. सालाना बारिश भी दोनों जगह लगभग एक बराबर होती है. लेकिन आज के समय में कई दिनों तक लगातार बारिश के बाद भी टोक्यो में सड़कों पर पानी नहीं टिकता. वहीं मुंबई की स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है. 

करोड़ों की आबादी को बारिश से महफूज रखना जापान सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी. चारों ओर से नदियों और समुंद्र से घिरे टोक्यो को बारिश और बाढ़ से बचाने के लिए तकनीक का सहारा लिया गया. टोक्यो को बाढ़ और बारिश से बचाने के लिए जापान सरकार ने साल 1992 में अंडरग्राउंड टनल बनाने का काम शुरू किया. इसे पूरा करने में एक दशक से ज्यादा का वक्त लगा. ये काम साल 14 साल बाद 2006 में जाकर पूरा हो गया. जबकि मुंबई का स्ट्रॉर्मवाटर ड्रेनेज सिस्टम प्रोजेक्ट 13 बरसों से अटका है.

जापान सरकार ने टोक्यो शहर को इस समस्या से निकालने के लिए विश्व स्तरीय प्लान तैयार किए. तकनीक के सहारे टोक्यो को इसमें जबरदस्त सफलता भी मिली. जिसके बाद टोक्यो शहर में रहने वाले लोगों में से 54 लाख लोगों की ज़िंदगी में अच्छे दिन आ गए. इस बदलाव को टोक्यो के लोग भी बड़े बदलावों में से एक मानते हैं.

जलजमाव के समस्या से निपटने के लिए टोक्यो शहर के कई हिस्सों में सॉफ्ट लगाए गए है. इन साफ्ट के सहारे पानी को ज़मीन के नीचे खींचा जाता है. पानी को स्टोर की ऐसी व्यवस्था विश्व में कहीं नहीं है. इसके अलावा शहर के पानी को मिनटों में निकालने की भी व्यवस्था है.

 

 

ये पूरी प्रक्रिया अंडरग्रांउड है, जिसके सहारे बाढ़ और बारिश के पानी को स्टोर किया जाता है. भीषण बारिश के दौरान इसे ओपन रखा जाता है ताकि नदियों में जलस्तर नहीं बढ़े और बाढ़ का खतरा कम हो जाए.  टेक्नोलॉजी के सहारे टोक्यो को बाढ़-बारिश के पानी से बचाया जा रहा है. इस पूरी प्रक्रिया में खर्च तो बहुत है, लेकिन ये इस समस्या का ऐसा समाधान है कि नदियों और समुंद्र से घिरने के बाद भी टोक्यो शहर के किसी भी हिस्से में न तो बाढ़ का पानी घुसता है और न ही बारिश की वजहों से किसी तरह कोई दिक्कत झेलनी होती है.

जापान तकनीक के मामले में हिन्दुस्तान से जरूर आगे है, लेकिन ऐसी व्यवस्था मुंबई जैसे शहरों के लिए तैयार करना कोई बड़ा बात नहीं है. ये जरूर है कि इसे बनाने में जापान को भी सालों तक मेहनत करनी पड़ी. लेकिन जब बनकर तैयार हुआ तो लाखों चेहरे एक साथ मुस्कुरा उठे.