क्यों इस्लाम धर्म की खिलाफत करते थे आंबेडकर?

Ambedkar Death Anniversary: 6 दिसंबर, 2021 को बाबासाहेब आंबेडकर की 65वीं पुण्यतिथि है. इस मौके पर आइए जानते हैं कि आंबेडकर इस्लाम धर्म के प्रति क्या विचार रखते थे: 

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Dec 5, 2021, 08:21 PM IST
  • इस्लाम धर्म में नहीं हुआ कोई समाज सुधार आंदोलन: आंबेडकर
  • इस्लाम धर्म में लोकतंत्र की प्रमुखता नहीं: आंबेडकर

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क्यों इस्लाम धर्म की खिलाफत करते थे आंबेडकर?

नई दिल्ली: भीमराव रामजी आंबेडकर, जिन्हें बाबासाहेब आंबेडकर के नाम से भी जाना जाता है. आंबेडकर स्वतंत्र भारत के सर्वप्रथम कानून मंत्री, बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे. उन्होंने दलितों, श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था. 6 दिसंबर को उनकी 65वीं पुण्यतिथि है. आइए उनकी पुण्यतिथि पर उन पहलुओं पर बात करते हैं जो आज भी अनछुए हैं: 

आंबेडकर इस्लाम धर्म की मुखर खिलाफत करते थे. उन्होंने अपने जीवनकाल में कई ऐसे बयान दिए जिनमें उन्होंने खुलकर इस्लाम धर्म की आलोचना की है. 

इस्लाम धर्म में नहीं हुआ कोई समाज सुधार आंदोलन

आंबेडकर ने इस्लाम धर्म की हिंदू धर्म से तुलना करते हुए इस्लाम की इसलिए भी आलोचना की थी कि इस्लाम में हिंदू धर्म की तरह कभी भी कोई समाज सुधार आन्दोलन नहीं हुआ. वे अपने धर्म में मौजूद बुराइयों को पीढ़ी दर पीढ़ी ढोते रहे जबकि इसके उलट हिंदू धर्म में समय-समय पर कई ऐसे समाज सुधार आन्दोलन हुए जिसके परिणामस्वरूप हिंदू धर्म के अनुयायियों ने एक समाज के रूप में तरक्की की. 

इस्लाम धर्म में मौजूद सामाजिक बुराइयों पर आंबेडकर ने अपने एक बयान में कहा, "मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुःखद है. किंतु उससे भी अधिक दुःखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आंदोलन नहीं उभरा जो इन बुराइयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके. हिंदुओं में भी अनेक सामाजिक बुराइयां हैं. परंतु संतोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराइयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आंदोलन भी चला रहे हैं. दूसरी ओर मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराइयां हैं. परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते. इसके विपरीत, अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं. यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केंद्रीय असेंबली में 1930 में पेश किए गए बाल विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह योग्य आयु 14 वर्ष और लड़के की 18 वर्ष करने का प्रावधान था. मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रंथ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा. उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञा अभियान भी छेड़ा."
     
इस्लाम धर्म में लोकतंत्र की प्रमुखता नहीं: आंबेडकर

इस्लाम धर्म में लोकतंत्र की कमी को उजागर करते हुए आंबेडकर लिखते हैं,  "मुसलमानों की सोच में लोकतंत्र प्रमुखता नहीं है. उनकी सोच को प्रभावित करने वाला तत्व यह है कि लोकतंत्र प्रमुख नहीं है. उनकी सोच को प्रभावित करने वाला तत्व यह है कि लोकतंत्र, जिसका मतलब बहुमत का शासन है, हिंदुओं के विरुद्ध संघर्ष में मुसलमानों पर क्या असर डालेगा. क्या उससे वे मजबूत होंगे अथवा कमजोर ? यदि लोकतंत्र से वे कमजोर पड़ते हैं तो वे लोकतंत्र नहीं चाहेंगे. वे किसी मुस्लिम रियासत में हिंदू प्रजा का मुस्लिम शासक की पकड़ कमजोर करने के बजाए अपने निकम्मे राज्य को वरीयता देंगे."

"मुस्लिम संप्रदाय में राजनीतिक और सामाजिक गतिरोध का केवल ही कारण बताया जा सकता है. मुसलमान सोचते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों को सतत संघर्षरत रहना चाहिए. हिंदू मुसलमानों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करते हैं, और मुसलमान अपनी शासक होने की ऐतिहासिक हैसियसत बनाए रखने का."

आंबेडकर ने तत्कालीन मुस्लिम राजनीति को केंद्र में रखते हुए मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की थी. उन्होंने अपने बयान में कहा, "मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया और दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है. चेकों के विरुद्ध सुडेटेन जर्मनों ने जिन तौर-तरीकों को अपनाया था वे उसका जानबूझकर तथा समझते हुए अनुकरण करते प्रतीत हो रहे हैं.''

इस लेख में प्रयोग किए गए आंबेडकर के सभी बयान डॉ. अंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय -15 से लिए गए हैं.

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