Aquila ने साड़ी का नहीं हर महिला का किया अपमान, जानिए इसकी कहानी

साड़ी उस समय अचानक सुर्खियों में आ गई जब एक रेस्टोरेंट ने कहा कि साड़ी एक स्मार्ट कैजुअल नहीं है. साड़ी तो वैदिक काल से भारतीय महिलाओं का तन ढकती आई है.

Written by - Vikas Porwal | Last Updated : Sep 24, 2021, 12:06 PM IST
  • साड़ी को एक रेस्टोरेंट ने स्मार्ट कैजुअल नहीं माना है
  • साड़ी को लेकर अब ऐसे में एक बहस शुरू हो गई है
Aquila ने साड़ी का नहीं हर महिला का किया अपमान, जानिए इसकी कहानी

नई दिल्ली: इन दिनों दिल्ली का अंसल प्लाजा और यहां का अकीला रेस्टोरेंट काफी चर्चा में आ गया है. हाल ही में रेस्टोरेंट ने खाना खिलाने के अलावा एक और काम करना शुरू किया है. दरअसल, ये रेस्टोरेंट महिलाओं को स्मार्ट और डंब होने के सर्टिफिकेट बांट रहा है. इसके लिए महिलाओं को यहां सिर्फ साड़ी पहनकर जाना है, लेकिन यहां का मैनेजमेंट आपको एंट्री नहीं देगा. ये सुनकर आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि साड़ी में क्या परेशानी है?

साड़ी नहीं है स्मार्ट कैजुअल- मैनेजमेंट

इस रेस्टोरेंट के मैनेजमेंट कहना है कि साड़ी स्मार्ट कैजुअल नहीं है. ऐसे में अब आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर साड़ी का स्मार्टनेस से क्या लेना-देना?

कोई भी कपड़ा स्मार्ट कैजुअल कैसे हो सकता है? कई लोगों के लिए इस बात पर यकीन कर पाना मुश्किल है कि साड़ी के बारे में कोई ऐसा अजीब ख्याल भी रख सकता है.

हमेशा से महिलाओं का तन ढकती रही साड़ी 

साड़ी को वो परिधान माना जाता है, जो वैदिक काल के साथ ही भारतीय महिलाओं का तन ढकता आया है. कई फैशन आए-गए लेकिन 10 हजार साल पहले भी साड़ी जैसी थी, आज भी वैसी ही है. 5-6 मीटर लंबे इस कपड़े के चादर नुमा टुकड़े को महिलाएं तबसे अपने शरीर पर लपेटती आ रही हैं, जब इंसानों ने चमड़े, पत्ते और पेड़ों की छाल से तन ढंकना शुरू किया तो भी महिलाओं के तन ढंकने का तरीका बिल्कुल साड़ी नुमा ही था. जब कपड़ा पहली बार सामने आया था तो महिलाओं और पुरुषों ने कमोबेश एक ही तरीके से इसे पहना था.

ऋग्वेद से है साड़ी का चलन

ऋग्वेद और यजुर्वेद की परंपरा में भी साड़ी का जिक्र हुआ है जहां संस्कृत में इसे शाटिका कहा गया था. धीरे-धीरे यह परिधान ही महिलाओं के लिए उनके सम्मान का प्रतीक बन गया. रामायण-महाभारत की कहानियों में तो साड़ियां भी एक कैरेक्टर हैं. एक पौराणिक कहानी नल-दमयंती की भी है, जहां राजा नल को अपनी पत्नी की साड़ी पहननी पड़ जाती है.

मौर्य काल और गुप्त काल में साड़ी सम्मान और सभ्यता की प्रतीक थी. राजा एक-दूसरे के राज्यों में मित्रता के लिए फल-पान और मिठाई के साथ साड़ी भेजते थे. इसका मतलब होता था कि आपकी सुविधा और सम्मान अब हमारा भी हुआ. राजा हर्षवर्धन ने जब कुंभ में सब कुछ दान कर दिया था उन्हें अपनी बहन की साड़ी पहनकर घर लौटना पड़ा था. 

आक्रमणकारियों के दौर में साड़ी ने बचाई लाज

भारत में आक्रमणकारियों के दौर में भी साड़ी महिलाओं की लाज बचाती रही. मुगल कल्चर के लिहाज से काफी अमीर माना जाता है. इस दौर तक साड़ी की रंगत काफी खिल गई थी. बनारसी, चंदेरी, कांजीवरम, राजस्थान की बंधेज ने लोगों को अपने रंग में रंगना शुरू कर दिया था. राजा रवि वर्मा की पेंटिंग में भी साड़ी खूब चमकी है. उन्होंने देवी सरस्वती, अहिल्या, उर्वशी, मेनका जैसे कई पौराणिक किरदारों को कैनवस पर उतारा तो उनकी कूची ने साड़ी को और गहरी रंगत दी.

अंग्रेजों के दौर में खुद अंग्रेजी महिलाओं ने साड़ी को हाई सोसायटी की तरह अपनाया. उन्होंने ही भारतीय चोली को ब्लाउज की शक्ल दी और पेटीकोट के साथ इसे अटैच किया. यानी साड़ी हमेशा से  स्मार्ट कैजुअल था और इसे स्मार्टली ही कैरी किया जाता था.

साड़ी पहनकर ही महिलाओं ने रचा इतिहास

साड़ी सिर्फ पहनावा नहीं है ये क्रांति भी है. जब द्रौपदी की साड़ी खींची गई तो महाभारत हुई. रानी लक्ष्मी बाई ने साड़ी में अपने बेटे को बांधा और अंग्रेजों को काटती चली गईं. चेनम्मा ने कित्तूर की लड़ाई लड़ी और देश के साथ साड़ी की लाज भी रख ली. पद्मावती ने पति के नाम की साड़ी पहनकर जौहर कर लिया और दुर्गावती की साड़ी को दुश्मन छू भी न पाए, इसलिए वो आग में कूद गई.

साड़ी ही वो परिधान था, जिसे पहन सरला ठकराल ने प्लेन उड़ाया. साड़ी पहनीं इंदिरा गांधी आयरन लेडी कहलाईं और उन्होंने इतिहास ही नहीं भूगोल भी बदल दिया. वो तमाम महिलाएं जो साड़ी पहनकर घर और बाहर दोनों संभाल रही हैं वो हर रोज नई क्रांतियां कर रही हैं. ऐसे में साड़ी को स्मार्ट कैजुअल न कहना कहां की स्मार्टनेस है?

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