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अशफाक उल्ला खांः वह क्रांतिकारी जिसने शायरी से शहादत का सफर तय किया

दौर-ए-इन्कलाब की जब भी बात होगी तो शहीदों की कतार में अशफाक उल्ला खां का नाम भी वतन के सिजदे का हकदार होगा. पहले उर्दू की शायरी में दिलचस्पी रखने वाले अशफाक जब बिस्मिल से मिले तो उनकी कलम की स्याही भी लाल होने लगी. आज देश इसी रणबांकुरे की जयंती मना रहा है.

अशफाक उल्ला खांः वह क्रांतिकारी जिसने शायरी से शहादत का सफर तय किया

नई दिल्लीः वह दौर गुलामी का था और हर तरफ क्रांति की लौ फूट रही थी. उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में इसी सिलसिले में क्रांतिकारियों की एक बैठक थी, जिसका प्रतिनिधित्व करने एक सजीला, विनम्र लेकिन जोशभरी आवाज का मालिक क्रांतिकारी आ रहा था. एक और नौजवान था जिसके सीने में आजादी की आग काफी दिनों से धधक रही थी, लेकिन अभी तक उसे कोई दिशा नहीं मिल पाई थी. उसवक्त गांधी जी का असहयोग आंदोलन जोरों पर था और इस मीटिंग में इसी पर बात होनी थी. कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वह लड़का लपककर क्रांतिकारी के पास पहुंचा और जल्दी-जल्दी बोल गया, मैं आपसे मिलना चाहता था, आपके दोस्त का छोटा भाई हूं और मैं शायरी भी करता हूं. शायरी करने वाली बात क्रांतिकारी को दिलचस्प लगी और यह दिन दो महान क्रांतिकारियों के मिलने का दिन मुकर्रर हुआ. किसे पता था कि भारतीय इतिहास में यह दोनों शख्सियत रामप्रसाद बिस्मिल और उनके अजीज दोस्त अशफाक उल्ला खां के नाम से जानी जाएंगीं. अशफाक ही वह नौजवान थे जो उस मीटिंग में बिस्मिल से मिलने गए थे.

अशफाक 22 अक्टूबर 1900 को शाहजहांपुर में जन्मे थे. घर में पढ़ाई-लिखाई वाला माहौल था और चार भाइयों में सबसे छोटे अशफाक शायरी के फन में भी माहिर थे. लिहाजा परिवार में सब उन्हें पसंद करते थे. साथ उठते-बैठते तो अक्सर शेर और नज्म के सिलसिले चल पड़ते थे. दोस्तों और हमजोलियों के बीच भी अशफाक के इस फन की काफी कद्र थी. ऐसे में जब कभी भी शायरी की बात होती थी तो उनके एक बड़े भाई साहब अक्सर ही बिस्मिल का जिक्र कर दिया करते थे. इसी के बाद से अशफाक उल्ला खां उनसे मिलना चाहते थे. उनकी यह साध असहयोग आंदोलन के समय पूरी हुई.

शुरुआत में गांधीवादी विचारों के रहे पक्षधर
बीसवीं सदी का दौर शुरू होने के साथ जहां देश में आजादी की आवाज हर ओर से उठने लगी थी, वहीं महात्मा गांधी की मान्यता भी बड़ी तेजी से फैल रही थी. सारा देश जिस तरीके से उनके पीछे चल पड़ा था, ऐसे में युवा भी इस बुजुर्ग को काफी मानते थे. सबसे अधिक प्रभावी उनके सत्य-अहिंसा वाले विचार थे और असहयोग आंदोलन ने तो तूफान मचा रखा था. किशोर से जवानी की दहलीज पर खड़े अशफाक भी इस विचारधारा को काफी पसंद करते थे. उन्होंने गांधीवादी विचारधारा के समर्थन में एक प्रसिद्ध नज्म भी लिखी थी, जो आज के स्वतंत्रता दिवस की दिन खूब गाई जाती है.

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखा देंगे,
आजाद ही हो लेंगे या सर ही कटा देंगे.

...और फिर छोड़ दिया अहिंसा का रास्ता
सब कुछ ठीक चल रहा था कि साल 1922 की फरवरी की चौथी सुबह ने सब बदल दिया. इस दिन गोरखपुर के पास चौरीचौरा कस्बे में ब्रिटिश पुलिस चौकी को आग लगा दी गई. इस कांड से महात्मा गांधी इतने आहत हुए कि उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया. उस वक्त उनका लिया गया यह फैसला कई क्रांतिकारियों को नागवार गुजरा, इनमें से दो नाम तो रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां के ही थे. इसके अलावा आजाद और भगत सिंह भी असहयोग आंदोलन से इत्तेफाक नहीं रखते थे. इसके बाद इन सभी लोगों ने अहिंसा का गांधीवादी रास्ता छोड़ दिया और तय किया कि अंग्रेजों से आजादी अब लड़ कर ही लेंगे.

काकोरी कांड में बिस्मिल के साथ नाम आया


अशफाक और बिस्मिल की दोस्ती इतनी गाढ़ी हो चली थी कि दोनों शाहजहांपुर में साथ-साथ ही सुने और देखे जाते. यहां तक कि अशफाक चाहते भी थे कि हर मामले में उनका और बिस्मिल का नाम साथ हो. अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए हथियारों की जरूरत थी. 8 अगस्त को बिस्मिल ने शाहजहांपुर में इसकी योजना बनाई. तब अशफाक ने कहा दोनों साथ ही इसे अंजाम देंगे. इसके बाद 9 अगस्त को राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी समेत आठ लोगों ने मिलकर काकोरी के पास ट्रेन लूट ली. यह घटना इतिहास में काकोरी कांड के तौर पर दर्ज है. बिस्मिल के साथ इसमें अपना भी नाम आने पर अशफाक बेहद खुश हुए थे.

जब हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलने की कोशिश हुई
एक और किस्सा मशहूर है. दिल्ली के एक एसपी थे तद्दाक हुसैन. उन्होंने हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलकर अशफाक को तोड़ने की कोशिश की. बोले कि पंडित बिस्मिल सब सच बता रहा है, सरकारी गवाह बन रहा है. तब अशफाक उल्ला खां ने गरजते हुए कहा कि पहली तो ये खान साहब, मैं पंडित जी को आपसे बेहतर जानता हूं. और अगर आप सही भी हों तो वह हिंदू होने के नाते उन ब्रिटिश से बेहतर होंगे जिनके आप नौकर हैं. पांच वक्त के नमाजी अशफाक को कोई भी उनके बिस्मिल से अलग नहीं कर सका.  19 दिसंबर 1927 को जब उन्हें फैजाबाद में फांसी दी गई तो उनका नाम हिंदुस्तान के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया.