पर्वतीय सीमा पर हिमस्खलन बना दुश्मन, कई जवान लापता

उत्तरी कश्मीर के कई इलाकों में मंगलवार देर शाम आए हिमस्ख्लन में सेना के कई जवानों के लापता होने की जानकारी मिली है. कश्मीर के कुपवाड़ा और बांदीपोरा जिलों में हुई हिमस्खलन की अलग-अलग घटनाओं में कई जवान लापता हैं. लापता जवानों की तलाश में सेना की एआरटी को लगाया गया है. 

पर्वतीय सीमा पर हिमस्खलन बना दुश्मन, कई जवान लापता

श्रीनगरः पर्वतीय सीमा पर ग्लेशियर के बीच तैनात जवानों के लिए बर्फ और ठंड ही दुश्मन बनी हुई है. उत्तरी कश्मीर के कई इलाकों में मंगलवार देर शाम आए हिमस्ख्लन में सेना के कई जवानों के लापता होने की जानकारी मिली है. कश्मीर के कुपवाड़ा और बांदीपोरा जिलों में हुई हिमस्खलन की अलग-अलग घटनाओं में कई जवान लापता हैं. लापता जवानों की तलाश में सेना की एआरटी को लगाया गया है. जानकरी के मुताबिक, हिमस्खलन की दो घटनाएं बांदीपोरा के गुरेज सेक्टर और कुपवाड़ा जिले के करनाह सेक्टर में हुई हैं. यह दोनों इलाके उत्तरी कश्मीर में आते हैं. 18 हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर हुए हिमस्खलन में 4 जवानों के लापता होने की बात कही जा रही है. जवानों की तलाश के लिए सेना ने ऐवलॉन्च रेस्क्यू टीम और सेना के हेलिकॉप्टरों को लगाया है. हालांकि अब तक सेना ने इस पूरे ऑपरेशन के बारे में कोई बयान जारी नहीं किया है.

हाल के दिनों में 6 जवान हुए शहीद
अभी हाल ही में सियाचिन ग्लेशियर में हुई अलग-अलग हिमस्खलन की घटनाओं में कई जवानों को शहादत देनी पड़ी है. सियाचिन को दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र के रूप में जाना जाता है. तीन दिन पहले सियाचिन के दक्षिणी इलाके में हुए हिमस्खलन में सेना के दो जवान शहीद हुए थे. इससे पहले 18 नवंबर को भी सियाचिन ग्लेशियर में हुए भीषण हिमस्खलन में भारतीय सेना के 4 जवान शहीद हो गए थे. इस दौरान यहां दो पोर्टरों की भी मौत हो गई गई थी.

दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र
दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध का मैदान अपनी कठिन मौसमीय दशाओं के चलते सैनिकों के लिए जानलेवा बना हुआ है. यहां गोली से अधिक कठिन मौसमीय परिस्थितियों के चलते जवान शहीद होते हैं. 1984 से अब तक यहां करीब 860 से ज्यादा भारतीय जवान शहीद हो चुके हैं। वहीं, 1984 से 1999 के बीच 1300 से अधिक पाकिस्तानी जवानों की मौत हुई है.

माइनस 60 डि‌र्ग्री सेल्सियस वाले तापमान और 18-20 हजार फुट की ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी सैनिकों के लिए बहुत कष्टकारी साबित होती है. यहां सैनिकों को फ्रॉस्टबाइट (अधिक ठंड से शरीर के सुन्न हो जाने) और तेज हवाओं का सामना करना पड़ता है. ग्लेशियर पर ठंड के मौसम के दौरान हिमस्खलन की घटनाएं आम हैं. 

1984 से अबतक 1000 से अधिक जवान शहीद
सियाचिन में इससे पहले भी कई बार ऐसे हादसों में भारतीय सेना के सैकड़ों जवान अपनी जान गंवा चुके हैं. आंकड़ों के अनुसार, साल 1984 से लेकर अब तक हिमस्खलन की घटनाओं में सेना के 35 ऑफिसर्स समेत 1000 से अधिक जवान सियाचिन में शहीद हो चुके हैं.

2016 में ऐसे ही एक घटना में मद्रास रेजीमेंट के जवान हनुमनथप्पा समेत कुल 10 सैन्यकर्मी बर्फ में दबकर शहीद हो गए थे.

सियाचिन ग्लेशियर पर हिमस्खलन, दो जवान शहीद