एक हार से बदल गई बाबुल सुप्रियो की जिंदगी, बंगाल में कितनी कमजोर होगी भाजपा?

पश्चिम बंगाल की सियासत में भाजपा की ताकत जिस कदर बढ़ी, चुनावी नतीजों में मिली हार के बाद पानी के बुलबुले की तरह फूटकर विलुप्त होने लगी है.

Written by - Ayush Sinha | Last Updated : Jul 31, 2021, 08:40 PM IST
  • बाबुल सुप्रियो ने दिया इस्तीफा
  • भाजपा के लिए कैसे बड़ा झटका?
एक हार से बदल गई बाबुल सुप्रियो की जिंदगी, बंगाल में कितनी कमजोर होगी भाजपा?

नई दिल्ली: बाबुल सुप्रियो ने राजनीति से संन्यास का ऐलान किया है. उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए संन्यास की जानकारी दी है. बाबुल सुप्रियो ने लिखा है कि वो संसद की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने लिखा कि वे सरकारी आवास को एक महीने के भीतर खाली करेंगे.

हार से बदल गई बाबुल की जिंदगी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बाबुल सुप्रियो ने भी अपनी किस्मत आजमाई थी. हालांकि दीदी की आंधी में केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो को करारी हार का सामना करना पड़ा था. भारतीय जनता पार्टी के स्टार खिलाड़ी माने जाने वाले बाबुल सुप्रियो को चुनाव में बुरी तरह हार मिली थी. तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार अरूप बिस्वास ने उन्हें करीब 50 हजार से वोटों से हराया था.

कोलकाता में बंगाली फिल्म उद्योग का दिल कहे जाने वाले सुप्रियो को विधानसभा चुनाव के कुछ महीने बाद ही मोदी कैबिनेट से बाहर कर दिया गया. ऐसे में माना गया कि बाबुल सुप्रियो की हार उनसे मंत्री पद छिनने की असल वजह है.

हार भी ऐसी जिससे शर्मसार हुए बाबुल

बंगाल चुनाव में बाबुल को छोटी-मोटी हार नहीं बल्कि बहुत करारी हार का सामना करना पड़ा था. टीएमसी के अरूप बिस्वास को 1,01,440 वोट मिले, जबकि बाबुल सुप्रियो को इसके करीब आधे यानी 51,360 वोट ही मिले थे. निश्चित तौर पर एक केंद्रीय मंत्री की इतनी बड़ी हार काफी शर्मनाक थी.

सुप्रियो ने इस्तीफे पर क्या कहा था?

मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल व विस्तार से पहले पर्यावरण राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो ने बुधवार को केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद सुप्रियो ने सोशल मीडिया पर लिखा था, ‘मुझे इस्तीफा देने को कहा गया और मैंने ऐसा किया.’ उन्होंने फेसबुक पर लिखा, ‘मैं प्रधानमंत्री का आभारी हूं कि उन्होंने मंत्रिपरिषद के सदस्य के रूप में मुझे देश की सेवा करने का अवसर दिया.’

'हां, जब धुआं होता है तो कहीं आग जरूर लगती है. मीडिया में मेरे दोस्तों के फोन कॉल नहीं ले पा रहा हूं, जो मेरी परवाह करते हैं इसलिए मैं इसे खुद ही बता देता हूं. हां, मैंने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया है (जैसा कि मैंने पहले इसे तैयार किया था, "इस्तीफा देने के लिए कहा" इसे रखने का सही तरीका नहीं हो सकता है.)'

भाजपा के लिए बंगाल में बड़ा झटका कैसे?

कबीरदास जी का एक दोहा है 'पानी केरा बुलबुला, अस मानुस की जात, देखत ही छुप जात है, ज्यों तारा प्रभात।' कबीर के इस कथन से तात्पर्य है कि जैसे पानी के बुलबुले, इसी प्रकार मनुष्य का शरीर क्षणभंगुर है. जैसे प्रभात होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये देह भी एक दिन नष्ट हो जाएगी.

बंगाल में भाजपा पर इस वक्त ये कहावत इसलिए सटीक बैठ सकती है, क्योंकि चुनाव तक भाजपा ने अपना पूरा दमखम झोंक दिया. टीएमसी के सैकड़ों हजारों नेता और कार्यकर्ताओं ने दीदी का दामन छोड़ भाजपा का कमल थामा था. जैसे ही भाजपा की चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा कई नेताओं ने वापस टीएमसी का रुख कर लिया.

अब इसके लिए मुकुल रॉय से बड़े उदाहरण कौन होंगे. दीदी के खास कहे जाने वाले मुकुल रॉय ने पहले दीदी को छोड़ा, फिर भाजपा की हार के बाद भाजपा को भी छोड़ दिया. इसके इतर यदि बाबुल सुप्रियो का जिक्र करें तो, उनका राजनीति से संन्यास लेना भाजपा के लिए सबसे मुसीबत साबित हो सकती है.

वो इसलिए क्योंकि जब 2014 में पहली बार बाबुल सुप्रियो ने पहली बार आसनसोल लोकसभा सीट से भाजपा के लिए जीत हासिल की थी, तो उस वक्त बंगाल में भाजपा काफी कमजोर हुआ करती थी. एक सीट थी दार्जिलिंग जिस पर एसएस अहलूवालिया (S.S.Ahluwalia) ने जीत की थी, तो दूसरी जीत सुप्रियो ने हासिल की थी. अब सुप्रियो ने सियासत छोड़कर भाजपा को झटका दे दिया.

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