केंद्र नीतियां बनाता है, लेकिन कुछ राज्य केवल तुष्टिकरण करते हैंः अर्जुन राम मेघवाल

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पिछला एक साल पूरी तरह ऐतिहासिक रहा. इस बार कोरोना काल के चलते सारी नीतियां उसी के आधार पर बन रही हैं. केंद्र नीतियां तो बनाता है लेकिन कुछ राज्य केवल तुष्टिकरण की नीति अपनाते हैं. केंद्र की योजना को सुचारु रूप से इंम्प्लीमेंट नहीं करते हैं. 

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Jun 12, 2020, 01:10 PM IST
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केंद्र नीतियां बनाता है, लेकिन कुछ राज्य केवल तुष्टिकरण करते हैंः अर्जुन राम मेघवाल

नई दिल्लीः ज़ी हिंदुस्तान की ई विमर्श कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लॉकडाउन में ढील, अर्थव्यवस्था और कोरोना काल में रोजी-रोजगार के मुद्दों पर अपना नजरिया रखा. उन्होंने बताया कि कैसे भारत के उद्योग पॉज बटन हटने के बाद दोबारा सुचारु गति से वहीं से शुरू हो रहे हैं, जहां 3 महीने पहले काम छोड़ा था. सवाल-जवाब को जो सिलसिला चला वह ज्यों का त्यों आपके सामने पेश है.

सवालः जिस तरीके से लॉकडाउन में ढील दी गई, उसके बाद मामले भी लगातार सामने आते चले गए हैं, आपको क्या लगता है कि वाकई में अब हम वापस रिकवरी की ओर बढ़ चले हैं?

जवाबः जब हमने लॉक डाउन किया उस समय हमारे पास हेल्थकेयर सेक्टर में इंफ्रास्ट्रक्चर कोरोना से लड़ने के लिए कम था. फिर हमने इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया. हॉस्पिटल, टेस्टिंग फैसिलिटी और इंस्टीट्यूट क्वारन्टाइन सेंटर बढ़ाए इनका असर पड़ा. अब इसके अलावा लोगों को खुद में बचाव के लिए जागरूक किया जा रहा है. 2 गज की दूरी बनाए रखने और फेस कवर पहन कर चलने की हिदायत दी गई है. पहले था कि घर में रहिए सुरक्षित रहें और अब यह है कि सतर्क रहिए, सुरक्षित रहिए. यह थोड़ा फर्क है. रोजी-रोजगार का जहां तक सवाल है तो अब हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है, कोई अगर बीमार पड़ता है तो हम उसका इलाज कर सकते है.

सवालः आपके मंत्रालय की 1 साल में क्या सबसे बड़ी उपलब्धि रही?

जवाबः यह एक साल पूरी तरह ऐतिहासिक है. 370 से लेकर के श्री राम मंदिर निर्माण और तीन तलाक समाप्त जैसे मुद्दे, यह साहसिक और महत्वपूर्ण फैसले रहे हैं. मैं अपने मंत्रालय की बात करूं तो पिछले 1 साल में हमने इलेक्ट्रिक व्हीकल को हमने बहुत प्रमोट किया है. बड़े-बड़े शहरों में इलेक्ट्रिक बसें अभी आई हैं और जनता की जागरूकता बढ़ी है. कुछ ऐसे रूट हैं, जिनको डेजिग्नेटिड कर दिया है, 100 किलोमीटर के एरिया में भी आपको चार्जिंग फैसिलिटी मिलेंगी. साउथ में भी बहुत रूट हैं. मुझे लगता है यह हमारे मंत्रालय की बड़ी पहल थी, जो बड़ी उपलब्धि के रूप में मानी जाएगी.

सवालः आत्मनिर्भरता की संकल्प सिद्धि के लिए आपका मंत्रालय क्या योजना बना रहा है? किस तरीके से आगे इसमें आप लोग काम करने वाले हैं ताकि आत्मनिर्भर भारत में आपका मंत्रालय भी योगदान दे सकें?

जवाबः आत्मनिर्भर भारत अभियान अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण पेकेज है. घोषणा होने के बाद हमारे ऑटोमोबाइल सेक्टर के दो एसोसिएशन श्याम और एटमा की की वरिष्ठ अधिकारियों से बात हुई.  तय हुआ कि ग्राउंड पर जल्द उतरना चाहिए. एनबीएफसी सेक्टर जिसमें लिक्विडिटी उपलब्ध कराने का एक बहुत बड़ा विषय था, बीच में स्ट्रेस में आ गए थे तो इस सेक्टर में जो लिक्विडिटी आत्मनिर्भर भारत अभियान को उपलब्ध हुई है, इससे निश्चित रूप से ऑटोमोबाइल सेक्टर से डिमांड जनरेट होगी. एमएसएमई सेक्टर में भी लिक्विडिटी बढ़ रही है, एग्रीकल्चर में किसान क्रेडिट कार्ड है, उसका दो लाख करोड़ का प्रावधान रखा गया है. यह डिमांड जनरेट करेगी और डिमांड जनरेट होगी तो हमारा काम और तेजी से आगे बढ़ेगा.

सवालः सरकार की हिस्सेदारी वाले जो भारी उद्योग हैं, यहां विनिवेश की बात लगातार उठती रहती है. बीते कुछ सालों के रिसर्च के आंकड़ों पर जोर दें तो मोदी सरकार के जो 6 साल रहे हैं उसमें 23 कंपनियों में विनिवेश हुआ है. इस तरीके की बातें सामने आई हैं तो आगे क्या चरणबद्ध तरीके से योजनाएं हैं किस तरीके से आप आगे रोजगार के लिए या फिर बड़े प्लांट्स लिए कोशिश करेंगे इसको और सफल बनाने के लिए?

जवाबः इन्वेस्टमेंट की योजना अभी से नहीं है.  यह ऑनगोइंग प्रोसेस कोई यूनिट खाते में है. कोई यूनिट लेबर प्रॉब्लम के कारण घाटे में आ जाती है. हम पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेस भी देखते हैं. आप जिन 23 कंपनियों की बात कर रहे हैं वह तो बंदी की कगार पर थीं. अभी भेल है जो बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है. भेल में किसी जगह पर ज़मीन उप्लब्ध है. बाहर बसी कई कंपनियां भारत आना चाहती हैं, बल्कि चीन को छोड़कर वह यहां उद्योग शुरू करना चाहती हैं. प्रोफेशनल जो भारत के ही हैं उन्हें भी हम एक आधार देंगे. भेल जैसी इंडस्ट्री में जिसमें जमीन भी उपलब्ध है वह चाहेंगे तो पार्टिकुलर जगह में अपना प्लांट भी लगा सकते हैं. लेकिन आत्मनिर्भर भारत अभियान का लक्ष्य एक ही है कि हमारा रॉ मटेरियल प्रोसेस होकर ही बाहर जाए सीधा रॉ मटेरियल बाहर ना जाए.

सवालः ऑटोमोबाइल सेक्टर को मंदी से उबारने के लिए क्या तैयारी चल रही है किस तरीके से आपका मंत्रालय काम कर रहा है?

जवाबः हमारे दो ऑर्गेनाइजेशन ने कहा डिमांड जनरेट करने के लिए आप एनपीएफसी को एंपावर्ड कर दीजिए. लिक्विडिटी के मामले में तो आपने देखा होगा आत्मनिर्भर भारत अभियान में जो एनपीएफसी को हमने लिक्विडिटी दी है उससे निश्चित रूप से ऑटोमोबाइल सेक्टर में जान आई है.  अभी कुछ प्रोग्राम्स और लगेंगे. आरबीआई ने रेपो रेट भी कम किए हैं, बिल पक्का आपको मिलेगा आपने देखा होगा वारंटी पीरियड को भी उसका भी लाभ मिलेगा एम आई का भी लाभ मिलेगा यह जो सब लाभ मिलेंगे निश्चित रूप से ऑटोमोबाइल सेक्टर को फायदा होगा.

सवालः चीन की संदिग्ध अवस्था के बाद कई सेक्टर भारत आ सकते हैं. इसके लिए ब्लूप्रिंट किसी प्रकार का तैयार किया गया है?

जवाबः हमारे प्रधानमंत्री ने ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स बनाए हैं, वह लगातार इन्वेस्टमेंट को लेकर चर्चा कर रहे हैं और ऐसे ही नौकरशाहों के भी एंपावर्ड ग्रुप भी बने हैं. हमारे चार पैरामीटर हैं जिसमें हम काम कर रहे हैं.  मेक इन इंडिया को प्रमोट करना. इंपोर्ट बिल को कम करना. एक्सपोर्ट को बढ़ाना और एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा देना. इन चारों सेक्टरों में जहां-जहां भी प्रोसीजर आड़े आ रहा है तो उसे दूर किया जा रहा है. जैसे कि हमारे सामने आया कि कपड़ा चाइना से सस्ता क्यों आ जाता है तो जानकारी मिली जो एवोल्यूशन होता है यहां आने के बाद कस्टम के अधिकारी वैल्वेशन करते हैं वह मीटर पर करते हैं और कई ऐसे देश हैं जो किलो पर करते हैं. तो ऐसी बहुत सी चीजों में खामियां थी उसको दूर करने का यह अवसर है.  हमारे ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स लगातार बैठक कर देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए चिंतन कर रहे हैं. लोकल को वोकल कैसे करें.  लोकल को वोकल करने में भी आलोचना हो जाती है. ऐसा नहीं है अगर हम कोई घड़ी पहन रहे हैं विदेश की तो उस घड़ी की हम तारीफ करें. लेकिन अगर हमारे देश की बनी हुई घड़ी है तो तारीफ तो उसकी भी करना चाहिए यही तो है लोकल से वोकल.

सवालः चीन लद्दाख सीमा पर या नेपाल के साथ सीमा पर जिस तरीके से विवाद खड़ा कर रहा है अभी बातचीत चल रही है इसको लेकर के इस पर आप अपनी बात रखना चाहेंगे कोई राय रखना चाहेंगे?

जवाबः चीन जो हमारा सामान आता है, वह कुछ प्रोसीजर की कमियां थी उनको हम दूर कर रहे हैं. फिर भी मुझे ऐसा लगता है हमारे जो डब्ल्यूटीओ के एग्रीमेंट हैं हमें उन्हें ध्यान में रखना पड़ेगा. आपने लद्दाख नेपाल का जिक्र किया. हमारा विदेश मंत्रालय इस बारे में सब कुछ बोल चुका है. यह एक बड़ा विषय है. नेपाल में एक बार प्रधानमंत्री नेपाल की संसद में जाकर बोलता है कि हमारा संशोधित नक्शा यह है और दो-चार दिन बाद वह कहते हैं कि हम अपने संशोधित नक्शे के प्लान से हट गए हैं. यह भारत का बढ़ता हुआ प्रभाव दिखता है. G7 में भारत को सम्मिलित करो अमेरिका का यह प्रयास के भारित सम्मिलित होना चाहिए तो यह भारत का बढ़ता हुआ प्रभाव आपको वैश्विक स्तर पर दिखता है साफ-साफ.

सवालः लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी की कई तस्वीरें सामने आईं. क्या राज्यों के साथ कोऑर्डिनेशन में कोई कमी रही?

जवाबः हमारा जो कंट्रोल रूम हेल्थ मिनिस्ट्री ने बनाया है, उसने  24*7 काम किया है. कोआर्डिनेशन की कोई कमी नहीं थी. कुछ राज्यों में कोर्डिनेशन की कमी थी. किसी ने कहा मैं 4000 बसें उपलब्ध करवा लूंगा लेकिन 420 नहीं मिली. किसी ने कहा मुझे 200 ट्रेनें चाहिए तो राज्य सरकार को कहा गया कि ले लो तो यह कुछ राज्यों की कोआर्डिनेशन की कमी रही.  लेकिन अब मामला कंट्रोल में है माइग्रेंट लेबर का विषय बड़ा बना लेकिन अब तो रिवर्स माइग्रेट हुआ. मैं राजस्थान से आता हूं अब मुझे फोन करके कहते हैं कि हमें वापस करिए क्योंकि हम यहां क्या काम करें हमें तो हीरा उद्योग नहीं काम करना अगर देखा जाए तो अब लोग वापस आना भी शुरू हो गए तो धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियां हैं वह तेजी से सामान्य होती जा रही है.

सवालः राजस्थान में कोरोना काबू में था लेकिन देखते ही देखते हैं तस्वीर बिल्कुल पलट गई. पहले भीलवाड़ा मॉडल की चर्चा भी हुई फिर जिस तरीके की तस्वीर हमें देखने को मिली, उन पर क्या कहना चाहेंगे?

जवाबः राजस्थान और बाकी राज्यों का भी विषय आ सकता है. विषय रहा था कि कभी-कभी जैसे कोरोना जैसी महामारी से सबको मिलकर लड़ना है. केंद्र और राज्य मिलकर लड़ेगी. लेकिन कहीं ना कहीं मशीनरी जो इंप्लीमेंट करने वाली है वह तुष्टीकरण की नीति में लगी रही. जयपुर में जैसे अब राज्य तो हमारा एक ही है भीलवाड़ा मॉडल जयपुर में लागू होना चाहिए लेकिन नहीं हुआ लेकिन यह तो तुष्टिकरण की हमारी नीति जो है यह कभी-कभी हमें खराब करती है. अब परिस्थितियां काफी नियंत्रण में है और मुझे लगता है कि जल्दी हम कोरोना को पराजित करेंगे.

सवालः पाकिस्तान से आए इन टिड्डी दल ने जिस तरीके से हमला किया. राज्य सरकार मिलकर के केंद्र के साथ क्या नीति बना रखी है इस पर क्या काम चल रहा है कि इन्हें रोका जाए फसलें और खराब ना हो इसको लेकर के कोई नीति बनाई गई है?

जवाबः अब इसमें भी राजनीति शुरू हो गई. पिछले 20 25 सालों में टिड्डी दल कम आए या नहीं आए. हमारे लोकस्ट के ऑफिस थे हो सकता है वहां कुछ उपकरण खराब हो गए होंगे. अब लोकस्ट से निपटना भारत सरकार के अंडर में है. लेकिन इंप्लीमेंट करने की जो नीति है,  छिड़काव करना नॉइस क्रिएट करना यह सब इंप्लीमेंटेशन करना तो राज्य सरकार के पास ही है. इसमें राज्य सरकार का बार-बार यह कहना कि केंद्र सरकार का काम है यह नहीं कहना चाहिए. इन पर नियंत्रण के लिए भारत सरकार ने राज्यों को पूरा पैसा दिया है. हमने राजस्थान को कहा कि ₹700000000 लीजिए और छिड़काव करिए. जब रात में यह ठहराव करती हैं तभी हम इनको मार सकते हैं तो यह सारी गाइडलाइन केंद्र सरकार ने जारी भी की है पैसा भी दिया है कि आप नियंत्रित कीजिए लेकिन अल्टीमेटली इंप्लीमेंटेशन का जो पार्ट है वह राज्य सरकारों के पास ही रहेगा भारत सरकार ने बहुत इसकी चिंता करके पर्याप्त राशि उपलब्ध करवाई है राज्य सरकारें भी लगी है लेकिन बीच-बीच में वहां का कोई न कोई मंत्री राजनीति कर देता है इसमें कहा कि राजनीति यह कोई आपदा है इसको ठीक करना है नियंत्रण में लाना है अगर आपके पास कोई भी टेक्नोलॉजी उपलब्ध है तो उसके माध्यम से उसे रोकना है यही हमारा काम है इसी में हम लगे हुए हैं.

सवालः आप सत्ता में आने से पहले प्रशासनिक सेवाएं दे चुके हैं और आपसे मैं जानना चाहूंगी आपके अनुभव के बारे में कि क्या फर्क और जिम्मेदारी आप देखते हैं एक नेता की प्रशासनिक अधिकारी की?

जवाबः निश्चित रूप से सही बात है कि मैं राजस्थान स्टेट में आईएएस था लेकिन 2009 में जब से बीकानेर की जनता के आशीर्वाद से मैं एमपी बना हूं तो मैं सार्वजनिक जीवन में हूं. लेकिन दोनों ने रात दिन का फर्क है. यहां आपका कैनवास बड़ा हो जाता है आप पॉलिसी बनाने लग जाते हो और वहां पर आप पॉलिसी बनी हुई है उसको आप इंप्लीमेंट करते हो सेवा का क्षेत्र भी सार्वजनिक जीवन में है लेकिन मुझे क्योंकि उसका अनुभव है तो उसका नाम मुझे मिलता है ऐसा नहीं मानता हूं.

सवालः राजनीति के अलावा एक और चीज में आपके बारे में पढ़ रही थी तो पता चला कि गायन में भी आप की खास रूचि रहे हैं कई धार्मिक और सामाजिक जो कार्यक्रम है उसमें आप प्रस्तुति दे चुके हैं राजनीति में रहते हुए अपनी इस कला के लिए आपको कितना वक्त मिल पाता है?

जवाबः यह मेरे बचपन का ही रुचि का विषय में मैं प्रार्थना गाने लग गया था उसके बाद भजनों में मेरी रुचि हुई. आपने वीडियो में मेरे भजन देखे होंगे मेरा जब मैं क्षेत्र में रहता हूं तो रेगुलर मेरा कार्यक्रम रहता है कि मैं रात्रि कालीन जो सत्संग होती है हमारे क्षेत्रों में कहीं ना कहीं मैं जाता हूं और मेरी भजनों की प्रस्तुति भी रहती है मुझे कविता की वह जो भजन है चदरिया..... यह बहुत अच्छा लगता है और कई बार मैं गुनगुनाता हूं कभी मौका मिलेगा तो पूरा गाकर भी आपको सुनाएंगे.

सवालः तो अभी आपके पास मौका भी है अगर देश केंद्रीय मंत्री के मुंह से भजन सुनना चाहे तो?

जवाबः अच्छा अभी आप सुनाने के लिए कह रहे हो क्या? मेरी जो प्रार्थनाएं हैं वह ज्यादा उपयुक्त रहती हैं वह डेडिकेटेड हैं लाइफ के लिए जैसे मैं उस प्रार्थना को खाता हूं आपके पास अगर समय हैं तो एक लाइन गाकर सुनाता हूं यह में जनता के साथ जोड़ता हूं. अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में है जीत तुम्हारे हाथों में हे हार तुम्हारे हाथों में अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में. जब मैं जनता से यह कहता हूं कि मेरे जीवन का सारा भार आपके हाथ में है तो यह मेरे समर्पण का भाव है और इससे जनता कनेक्ट होती है और मुझे गाते हुए भी ठीक लगता है जनता भी उससे जुड़ जाती है यह भी एक राजनीतिक व्यक्ति के लिए अच्छा रहता है.

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