सरकार बनाते ही आंदोलनकारियों की पेंशन रोक देती है कांग्रेस, पढ़ें सबूत

कांग्रेस की मंशा एक बार फिर बेनकाब हो गई है. आंदोलनकारियों की पेंशन के खिलाफ शायद कांग्रेस पार्टी ने रणनीति बना रखी है. जिसका सबूत झारखंड के साथ-साथ महाराष्ट्र से भी सामने आ रहा है. तो क्या ये मान लिया जाए कि किसी भी राज्य में सरकार बनाते ही कांग्रेस पार्टी आंदोलनकारियों की पेंशन रोक देती है..

सरकार बनाते ही आंदोलनकारियों की पेंशन रोक देती है कांग्रेस, पढ़ें सबूत

नई दिल्ली: देश पर सबसे अधिक समय तक राज करने वाली राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने ये साबित कर दिया है कि यदि कांग्रेस सत्ता में रहेगी, तो आंदोलनकारियों से दुश्मनी ही निभाएगी. ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, कांग्रेस शासित राज्यों की हालत देखकर हर कोई ये समझ सकता है कि कैसे कांग्रेस पार्टी आंदोलनकारियों के पेट पर लात मारने का काम करती है.

आंदोलनकारियों से कांग्रेस की दुश्मनी के सबूत

लगभग कई राज्यों की सरकार आंदोलनकारियों की दुश्मन बन जाती है, जो सरकार कांग्रेस की मदद से चल रही होती हैं. कई सबूत मौजूद हैं, लेकिन 3 वो राज्य मुख्य सबूत हैं जहां कांग्रेस पार्टी की सरकार रही है या फिर उसकी मदद से सरकार चल रही है. ताजा मामला झारखंड से सामने आ रहा है.

सबूत नंबर 1). कांग्रेस के इशारों पर चल रही है हेमंत सरकार

दरअसल, झारखंड में वनांचल आंदोलनकारी चिन्हितीकरण आयोग की सिफारिश के बाद राज्य सरकार हर महीने आंदोलनकारियों को पेंशन देती थी. लेकिन एक जानकारी के अनुसार ये मामला सामने आया है कि तकरीबन 5 हजार से अधिक आंदोलनकारियों को 5 महीने से पेंशन नहीं मिली है. सवाल ये उठ रहा है कि जिस हेमंत सोरेन ने आंदोलनकारियों के हितों की बात करके सत्ता हासिल की उस हेमंत सरकार पर आखिर किसका दवाब है, जो उन्होंने पांच महीने से 5 हजार से अधिक आंदोलनकारियों की जिंदगी परेशानियां भर दी?

Zee हिन्दुस्तान से कई आंदोलनकारी और उनके परिजनों ने संपर्क साधा और अपनी पीड़ा बताई. गोरामा महतो नाम के एक आंदोलनकारी ने अपने दर्द को हमारे सामने बयां किया और बताया कि कैसे कई महीनों से हेमंत सरकार ने उनकी और उनके जैसे हजारों लोगों की पेंशन रोक दी है. एक तो कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया के लिए परेशानी पैदा की, ऐसी परिस्थिति में जब समय पर पेंशन आ जाना चाहिए लोगों को उनका हक नहीं मिल रहा है. महतो जी के अलावा भी कई आंदोलनकारियों और उनके घरवालों ने अपना दर्द बताया. निश्चित तौर पर मुद्दा लोगों के हक से जुड़ा है, ऐसे में सियासी खेमे में भूचाल आना वाजिब है.

भाजपा ने हेमंत सरकार को सुनाई खरी खोटी

भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इशारों पर चलने वाली हेमंत सोरेन की सरकार पर जोरदार प्रहार किया है, साथ ही भाजपा प्रवक्ता कुणाल षड़ंगी ने ये कहा कि आंदोलनकारियों के लिए इस साल की दुर्गापूजा और दिवाली फीकी रहेगी. इसकी वजह हेमंत सोरेन की सरकार है. राज्य सरकार की उदासीनता के कारण ही आंदोलनकारी पेंशन से पिछले 5 महीने से वंचित हैं. कोरोना काल में ही CM हेमंत सोरेन 60 लाख रूपये की नई कार खरीद सकते हैं, लेकिन जिसके आशीर्वाद से वो सीएम बने हैं. उन झारखंडवासियों को उनका हक नहीं दिला पा रहे हैं.

आंदोलनकारियों के लिए वार्षिक 18 करोड़ रूपये का प्रावधान है, लेकिन आखिर ऐसी क्या वजह है जो हेमंत सोरेन की सरकार ने आंदोलनकारियों का हक दबाने की साजिश रच दी. क्या हेमंत सोरेन को कांग्रेस का आदेश मिला है कि आंदोलनकारियों को पेंशन नहीं दिया जाएगा. खैर, अगर मिला भी हो तो इसमें हैरान होने की जरूरत नहीं है. मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र बहुत बड़े उदाहरण हैं.

सबूत नंबर 2). मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार ने की थी 'दादागिरी'

2018 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी करने के तुरंत बाद ही प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने एक हफ्ते बाद ही इमर्जेंसी के दौरान जेल गए लोगों की मासिक पेंशन पर रोक लगा दी थी. इमर्जेंसी के दौरान मेंटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी लॉ (मीसा) और डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (डीआईआर) के मध्यप्रदेश के आंदोलनकारियों को लोकनायक जयप्रकाश नारायण सम्मान निधि नियम के तहत 25 हजार रुपए प्रति माह की पेंशन मिलती पर सेंधमारी करने का कांग्रेसी प्लान देखा गया था.

सबूत नंबर 3). महाराष्ट्र में कांग्रेस के इशारों पर उद्धव की करतूत

महाराष्ट्र में भी कांग्रेस-NCP-शिवसेना की सरकार है, यहां भी उद्धव सरकार ने शायद कांग्रेस के इशारों पर ऐसा ही तानाशाही फैसला लिया और आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले मीसाबंदियों की पेंशन बंद कर दी है.

दरअसल, उन आंदोलनकारियों को डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (डीआईआर) और  मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) के तहत जेल भी हुई थी. ऐसे आंदोलनकारियों के लिए 3 जुलाई 2018 को महाराष्ट्र सरकार ने पेंशन देने का फैसला लिया था. इसके तहत जो इमरजेंसी के दौरान 1 माह से अधिक जेल में थे, उन्हें 10 हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन का प्रावधान बनाया गया और उनकी मृत्यु के बाद उनके जीवनसाथी को 5000 रुपए की पेंशन राशि देने का ऐलान हुआ था. जनवरी 2018 से जनवरी 2020 तक पेंशन दी गई, लेकिन अचानक मीसाबंदियों की पेंशन बंद करने का ऐलान कर दिया. मामला फिलहाल बॉम्बे हाई कोर्ट में है.

इन सबूतों से ये समझा जा सकता है कि जिन राज्यों में कांग्रेस पार्टी मिलकर सरकार बनाती है, वहां आंदोलनकारियों की पेंशन पर सेंधमारी का प्लान तैयार हो जाता है. निश्चित तौर पर झारखंड और महाराष्ट्र का ये प्रकरण कांग्रेस की मंशा को बेनकाब करती है.

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