INS Vikrant Indian Navy UAV: इंडियन नेवी अपनी ताकत में जबरदस्त इजाफा करने की तैयारी में है. दुनिया भर में जंग की बदलती तस्वीर को देखते हुए, खुद को मानवरहित हथियारों के जखीरों से लैस कर रही है. इसी कड़ी में, भारतीय नौसेना अब समुद्र में अपनी शक्ति और निगरानी को मानवरहित हवाई वाहनों यानी UAV के पंखों पर सवार करने की तैयारी में है. नौसेना ने विमानवाहक पोतों से संचालित होने वाले एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल यानी AEW&C सिस्टम के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. AEW&C किसी भी नौसैनिक बेड़े की 'तीसरी आंख' होती है, जो दुश्मन के विमान, मिसाइलों और जहाजों को लंबी दूरी से ही पहचान कर जवाब देने के लिए बेहद जरूरी होती है.
Ka-31 हेलीकॉप्टर किए गए रिप्लेस
अब तक नौसेना इस भूमिका के लिए रूसी Ka-31 हेलीकॉप्टरों पर निर्भर रही है, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध और आपूर्ति की अनिश्चितताओं के चलते अतिरिक्त Ka-31 की खरीद की योजना को रद्द कर दिया गया है. इसके अलावा, अमेरिकी E-2D हॉकाई जैसे फिक्स्ड-विंग AEW&C विमान, जो अपने वजन के कारण आईएनएस विक्रांत जैसे छोटे विमानवाहक पोतों से टेक-ऑफ नहीं कर सकते, उन्हें हासिल करने में भी चुनौतियां थीं.
यही वजह है कि नौसेना ने अब पूरी तरह से स्वदेशी समाधान की ओर रुख किया है, जिसमें मानवरहित एरियल सिस्टम (UAS) पर एईडब्ल्यू रडार को तैनात करना शामिल है.
क्या है AEW&C की चुनौतियां?
विमानवाहक पोत जैसे महत्वपूर्ण संपत्तियों की सुरक्षा के लिए हवाई निगरानी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि जहाज-आधारित रडार पृथ्वी की गोलाई के कारण सीमित दूरी तक ही देख पाते हैं. वहीं, रूसी Ka-31 हेलीकॉप्टर में AEW क्षमता थी, लेकिन उनकी रेंज और उड़ान भरने की समय सीमा सीमित थी. उनकी खरीद की योजना अब रद्द कर दी गई है.
इतना ही नहीं, अमेरिकी E-2D हॉकाई जैसे उन्नत AEW&C विमान भारत के वाहक पोतों से उड़ान नहीं भर सकते, क्योंकि उन्हें कैटोबार (CATOBAR) सिस्टम की जरूरत होती है, जो आईएनएस विक्रांत में नहीं है.
मानवरहित हवाई वाहनों (UAV) पर फोकस
इन चुनौतियों को दूर करने के लिए, भारतीय नौसेना ने अब मानवरहित एरियल सिस्टम की ओर रुख किया है, जो कम लागत पर उच्च क्षमता प्रदान करते हैं. नौसेना अब रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी DRDO के साथ मिलकर स्वदेशी यूएवी विकसित करने की दिशा में काम कर रही है, जो वाहक पोत से उड़ान भर सके और AEW&C की भूमिका निभा सके.
वहीं, एडवांस रडार और सेंसरों को यूएवी पर एकीकृत करने से परिचालन लचीलापन बढ़ेगा और मानवयुक्त विमानों की तुलना में जोखिम भी कम होगा. नौसेना फिक्स्ड-विंग ड्रोन पर भी विचार कर रही है जिन्हें पोत से संचालित किया जा सके.
बनेगा भविष्य की नौसैनिक ताकत
यह बदलाव भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को दिखाता है और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती चुनौतियों का सामना करने के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. इतना ही नहीं, यह फैसला विदेशी रक्षा उपकरणों पर निर्भरता को कम करेगा और भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में लाएगा, जो वाहक-आधारित AEW&C के लिए स्वदेशी ड्रोन तकनीक का उपयोग करते हैं.
ऐसे में कुल मिलाकर कह सकते हैं, यूएवी पर आधारित AEW&C प्रणाली आईएनएस विक्रांत और भविष्य के वाहक पोतों को विस्तृत हवाई निगरानी प्रदान करेगी, जिससे भारतीय नौसेना का समुद्र में दबदबा और मजबूत होगा.
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