गूगल ने इस भारतीय बच्ची की पेंटिंग को बनाया था डूडल, अब देगा सात लाख की स्कॉलरशिप

गुरुग्राम की सात साल की बच्ची दिव्यांशी ने जब पेड़ों को कटते देखा तो उसके आंसू निकल आए. मां ने उसे समझाया, आंसू पोछे और एक ड्रॉइंग शीट देकर कहा कि अपने ख्यालों के चित्र इस पर बना लो. दिव्यांशी पेड़ों के कटने के दुख में निकले आंसुओं को रंग में मिला दिया, फिर तो उसकी कूची से जो पेंटिंग बनी वह सारे विश्व में पर्यावरण संरक्षण का संदेश बन गई. बाल दिवस के मौके पर गूगल ने इसे ही डूडल बना लिया और बच्ची को पुरस्कृत किया.

गूगल ने इस भारतीय बच्ची की पेंटिंग को बनाया था डूडल, अब देगा सात लाख की स्कॉलरशिप

नई दिल्लीः हिंदी में एक बाल कवि हुए हैं दिविक रमेश. उन्होंने बच्चों के सरल मनोभावों को छोटी-छोटी कविता में पिरोया है. उनकी एक कविता बहुत मशहूर हुई है, अगर पेड़ भी चलते होते... यह कविता यूपी बोर्ड की दूसरी-तीसरी कक्षा में हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल रही है.

कवि ने इस कविता में कल्पना की है, अगर पेड़-पौधे चलते होते तो बच्चों को बहुत मजा आता. वह उनके साथ खेलते-कूदते, दोस्ती करते, पेड़ खुद उन्हें अपने फल देता और साथ ही वह उन पर बैठ कर कहीं भी चले जाते.

यह कविता क्यों याद आई
यह महज कल्पना ही है, लेकिन एक बार फिर यह कविता इसलिए याद आई क्योंकि गुरुग्राम की एक सात साल की बच्ची ने इस कविता को कैनवस पर उतार दिया. यानी कि सात साल की दिव्यांशी सिंघल ने कूची पकड़ी, नन्हें हाथों से उन्हें रंग में भिगोया और पेड़-पौधों को लेकर अपने कल्पना भरे रंग कागज पर उतार दिए.

दिव्यांशी ने पेड़ों को जूते पहनाए, उन्हें पंख लगाए. खुशनुमा अहसास दिलाया और साथ में बनाई नदियां, पहाड़, झरने और पक्षी. यानी कि इस बात की खुशी मनाइये कि नई पीढ़ी के बच्चों की कल्पना में अब भी प्रकृति जीवित है, जिनमें वह सही-सलामत रखना चाहते हैं. 

गूगल के डूडल से इस पेंटिंग का क्या मतलब
डूडल से इस पेंटिंग का सीधा मतलब है. 14 नवंबर यानी कि गुरुवार को बाल दिवस के मौके पर गूगल ने इस पेंटिंग को डूडल बनाया और बच्चों को इस राष्ट्रीय पर्व की बधाई दी. इसे डूडल बनाने के पीछे की वजह है कि साल 2009 से गूगल बाल दिवस के मौके पर एक प्रतियोगिता कराता है. यह प्रतियोगिता डूडल 4 गूगल नाम से होती है. इस बार की थीम थी, 'जब मैं बड़ा हो जाऊं तो ऐसी आशा करूं'. इस प्रतियोगिता के लिए गुड़गांव की दिव्यांशी ने पेंटिंग बनाई, नाम रखा 'द वॉकिंग ट्री' और भेज दी.

गूगल को पेंटिंग इतनी पसंद आई कि उसने इसे अपना डूडल बना लिया, साथ ही बाल दिवस के मौके पर पर्यावरण समस्या से जूझ रहे सारे विश्व को बच्चों की तरफ से जारी संदेश की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की. 

पेंटिंग बनने की कहानी भी दिलचस्प है
इस बात से दिव्यांशी की मां ने रूबरू कराया. उन्होंने कहा ति छुट्टियों में दिव्यांशी अपनी नानी के घर लखनऊ गई थी. वहां पर कुछ पेड़ काटे गए, जिसे देखकर वह खूब परेशान हुई और रोई भी. दिव्यांशी को स्कूल में पेड़ों की जरूरत के बारे में पढ़ाया गया है. वह जानती है कि इनसे हमें ऑक्सिजन मिलता है. इसके साथ ही दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की बात भी उसके कानों में पड़ती है. मां ने बच्ची को परेशान देख उसे चुप कराया और ड्राइंग शीट देकर कहा कि पेड़ कटने से जो भी ख्याल आ रहे हैं, उसे बनाओ.

दिव्यांशी ने पेड़ों को जूते पहनाने और पंख लगाने वाली पेंटिंग बना दी. मां ने इस पेंटिंग को गूगल की प्रतियोगिता में भेज दिया. जब नतीजा आया तो पता चला कि दिव्यांशी की यह पेंटिंग 1.1 लाख प्रतियोगियों के बीच प्रथम आई है. दिव्यांशी को राष्ट्रीय विजेता बनने पर गूगल 5 लाख रुपए की कॉलेज और 2 लाख रु. की स्कूल स्कॉलरशिप देगा. 

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