ग्वालियर में पुलिस की लापरवाही से खराब हुए रेमडेसिविर इन्जेक्शन, कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश

ग्वालियर पुलिस ने छापेमारी में जब्त किए रेमडेसिविर इन्जेक्शनों को खराब कर दिया. शिकायत मिलने पर कलेक्टर ने एसपी को मामले की जांच करने का आदेश दिया है. 

Written by - Navin Chauhan | Last Updated : May 14, 2021, 05:25 PM IST
 ग्वालियर में पुलिस की लापरवाही से खराब हुए रेमडेसिविर इन्जेक्शन, कलेक्टर ने दिए जांच के आदेश

ग्वालियर: कोरोना की दूसरी लहर पूरे देश में अपना कहर बरपा रही है. शहरों के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े अस्पताल इन दिनों कोरोना संक्रमित मरीजों से पटे पड़े हैं. कोरोना के इलाज में काम आने वाली रेमडेसिविर और फेवीफ्लू जैसी दवाओं की कमी हो गई है. रेमडेसिविर इन्जेक्शन की कालाबाजारी चरम पर है. राज्य सरकारें ऐसा करने वालों के खिलाफ छापामारी कर रही हैं और आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई कर रही हैं.

जब्त इन्जेक्शनों का नहीं कर सकी रख-रखाव
लेकिन मध्यप्रदेश के ग्वालियर में एक ऐसा मामला सामने आया है जहां रेमडेसिविर इन्जेक्शन की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई तो की लेकिन अपनी जद में लिए इन्जेक्शनों का सही तरह से रखरखाव नहीं कर सकी. इन्जेक्शन किसी मरीज के इलाज के काम का ही नहीं रहा. इस बात की शिकायत जब आरटीआई कार्यकर्ता आशीष चतुर्वेदी ने कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह से की तो उन्होंने ग्वालियर के एसपी अमित सांघी को लापरवाही पत्र लिखकर मामले की जांच करने और उचित कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. 

पुलिस और एसटीएफ की टीम ने साझा अभियान में ग्वालियर रेलवे स्टेशन से एक व्यक्ति को गिरफ्तार करके उसके पास से 5 रेमडेसिविर इन्जेक्शन जब्त किए थे. इसके बाद पुलिसकर्मियों ने जब्त किए गए इन्जेक्शनों को एक डिब्बे में सील करके अन्य अपराधों के साक्ष्यों की तरह मालखाने में जमा कर दिया. 

जब्त रेमडेसिविर को कर दिया मालखाने में जमा
पुलिस कर्मियों ने ये जानने की कोशिश नहीं की इन्हें बचाए रखने के लिए किन परिस्थितियों में रखना है. निर्माता कंपनी के अनुसार इन्हें 2 से 8 डिग्री तापमान में रखा जाना था जिससे कि इलाज में उपयोग हो सके. लेकिन पुलिस कर्मियों द्वारा इन्जेक्शनों को सील कर मालखाने में जमा कराने से ये खराब हो गए. आम अपराधों में जब्त की चीजों और साक्ष्यों को मालखाने में ही जमा किया जाता है उसी प्रक्रिया का 

जब इस बात की जानकारी शिकायतकर्ता को मिली तो उन्होंने मामले से कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह को अवगत कराया. शुरुआती दौर में  ही अगर इन्जेक्शनों की निर्माता कंपनी के साथ संपर्क करके बैच नंबर के माध्यम से पड़ताल कर ली जाती तो वो किसी जरूरतमंद मरीज के काम आ जाते. सरकार द्वारा रेमडेसिविर को अतिआवश्यक जीवनरक्षक दवा की सूची में शामिल किए जाने के बावजूद पुलिस कर्मियों ने इस बात का ख्याल नहीं रखा.

पुलिस ने की लापरवाही, किया जाना था पैरीशीजल सीजर 
ग्वालियर हाईकोर्ट में कार्यरत वरिष्ठ वकील डीपी सिंह के मुताबिक सीआरपीसी की धारा 459 के तहत इन इन्जेक्शन को पुलिस को पैरीशीजल सीजर करना था. अगर ये इन्जेक्शन असली थे तो उन्हें सीआरपीसी की इसी धारा के मुताबिक मजिस्ट्रेट की अनुमति के बाद उपयोग में ले लिया जाना चाहिए था. पैरीशीजल सीजर उन चीजों का किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से समय के साथ विघटित हो जाते हैं. या फिर ऐसे कैमिकल या उत्पाद जिनकी आयु कम होती है उन्हें इस प्रक्रिया के तहत जप्त किया जाता है. 

डीपी सिंह ने आगे बताया, पुलिस ने जो प्रक्रिया अपनाई है वो लापरवाही का नतीजा है. क्योंकि खाने पीने के सभी उत्पादों की जप्त करने के लिए सीआरपीसी की धारा 459 के तहत ही कार्रवाई की जाती है. ट्रेनिंग के दौरान ही पुलिसकर्मियों को इस बारे में जानकारी दे दी जाती है. 

 

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