राहुल गांधी को 'जमीन पर उतरना चाहिए', ये सलाह भी अब बेफिजूल ही लगती है

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, जिनका आज 51वां जन्मदिन है. आज ही के दिन यानी कि 19 जून 1970 को राहुल गांधी का जन्म हुआ था.  

Written by - Akash Singh | Last Updated : Jun 19, 2021, 10:17 AM IST
  • केरल के वायनाड से लोकसभा सांसद हैं राहुल गांधी
  • अमेठी से पिछले चुनाव में उन्हें मिली थी हार
राहुल गांधी को 'जमीन पर उतरना चाहिए', ये सलाह भी अब बेफिजूल ही लगती है

नई दिल्लीः राजनीति में मौके की बहुत अहमियत है. जो नेता मौके को भुना लेता है वो समय को अपने पाले में कर लेता है और जो शख्स मौके पर चूक जाता है, उसके हाथों से बहुत कुछ छूट जाता है. सियासत की अनगिनत कहानियों में इस तरह के अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं. जमीन से उठकर सियासत की ऊंचाइयों को छू लेने की कहानियां भी हैं और सियासत के शीर्ष पर होकर जमीन की नब्ज टटोल पाने की नाकाबिलियत की भी. ऐसी ही एक कहानी के किरदार हैं कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, जिनका आज 51वां जन्मदिन है. आज ही के दिन यानी कि 19 जून 1970 को राहुल गांधी का जन्म हुआ था.

विरासत की राजनीति के अनसुलझे शख्स हैं राहुल
गांधी परिवार की राजनीति का इतिहास भारत की आजादी से पहले का है. उनके परिवार की सियासी समझ का लोहा पूरी दुनिया ने माना है. जनता ने कई बार देश की कमान इस परिवार को दी है. ऐसा नहीं है कि केवल राहुल को राजनीति विरासत में मिली. पंडित नेहरू के बाद से जितने भी नेताओं ने कांग्रेस संभाला सबको राजनीति विरासत में ही मिली थी. उससे पहले राजनीति में उनका दखल कम ही था. लेकिन सच ये भी है कि राहुल के अलावा उनके परिवार के बाकी सभी लोगों ने राजनीति में अपना लोहा मनवाया. चाहे वो इंदिरा हों या राजीव, संजय हों या फिर सोनिया गांधी.

जब आए तो लगा सब बदल देंगेः
मुनव्वर राणा का एक शेर है-
'बुलंदी देर तक किस शख्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है.'

राहुल की राजनीति पर ये पंक्तियां बिल्कुल सटीक बैठती हैं. 2004 का वो वक्त था जब राहुल ने राजनीति में सक्रिय रूप से एंट्री करने का फैसला लिया था. उन्होंने अपनी राजनीतिक विरासत की जमीन अमेठी को चुना भी. राहुल को करीब से देखने वाले बताते हैं कि उस वक्त राहुल की दीवानगी का आलम ही कुछ और था. लोग उनकी झलक पाने को बेसब्र रहते थे. खासकर युवाओं के लिए वो आईकॉन बन गए थे.

उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही थी. लोगों को उनमें राजीव गांधी की झलक दिखती थी. लेकिन फिर अचानक सबकुछ बदल गया. क्योंकि सच ही तो है ऊंची इमारत हर घड़ी खतरे में रहती है. उसे बचाए रखने के लिए इमारत की बुनियाद पर हमेशा ध्यान देना होता है.

 

जमीनी समझ की बात कहना बेबुनियाद
राहुल के बारे में एक बात अक्सर कही जाती है कि उन्हें जमीन की समझ नहीं. उन्हें जमीन पर उतरकर मेहनत करनी चाहिए. लेकिन सच तो ये है कि अब ये बात भी कोई असरदार नहीं है, क्योंकि राहुल गांधी शुरुआत से ही ये मेहनत कर रहे लेकिन असफल रहे हैं. राजनीति के शुरुआती दिनों में उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि- अगर मैं चाहता तो 25 की उम्र में प्रधानमंत्री बन जाता, लेकिन मैंने कोई भी जिम्मेदारी लेने से पहले अनुभव प्राप्त करने की सोची.

सच भी यही है. वो कभी मंत्री तक नहीं बने. चाहते तो आसानी से पीएम बनते. उन्हें शुरुआती दिनों में कभी दलितों के घर तो कभी आदिवासियों के घर जाते देखा गया. कभी मुंबई की लोकल ट्रेन में वो घूमे. युवाओं की तमाम शाखाओं की कमान उन्हें मिली, लेकिन वो अपना जलवा भुना ही नहीं पाए. जमीन और जमीनी हकीकत वो जान और समझ ही नहीं पाए। असर ये हुआ कि वो सत्ता से और लोगों के दिलों से बाहर होते गए.

गलती तो मानते हैं लेकिन अमल नहीं करते
गलती का कारण जानते हुए भी बारबार गलती करना खतरनाक होता है. राहुल के साथ भी ऐसा ही है. वो ये बखूबी जानते हैं कि हमसे चूक कहां हो रही है लेकिन फिर भी गलती करते हैं. ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि राहुल ने अपने भाषणों में कई-कई बार अपनी गलतियों का जिक्र किया है. वो खुद परिवारवाद की बात उठा चुके हैं, अपने नेताओं में अहंकार की बात उठा चुके हैं, जनता में कमजोर होती पकड़ को कह चुके हैं. धर्म, हिंदुत्व सीखने की बात कह चुके हैं. लेकिन अफसोस की वो कहते और जानते तो सब हैं लेकिन मेहनत नहीं करते.

जब सवाल उनकी या उनके परिवार की कुर्सी पर आता है तो वो तनकर खड़े नहीं होते. जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है तो वो पार्टी के साथ नहीं होते. किसी मुद्दे पर लगातार लंबे समय तक खड़े नहीं होते. 

ऐसा रहा है राजनीतिक करियर
2004 में पहली बार वो यूपी की अमेठी सीट से सांसद चुने गए थे. इसके बाद से लगातार 2019 तक वे इस सीट से सांसद रहे. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें अमेठी से शिकस्त मिली, लेकिन केरल के वायनाड से वो सांसद चुने गए हैं. कांग्रेस की कमान भी कुछ वक्त के लिए उनके हाथों में रही.

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