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योगी राज में हिंदूवादी नेता की हत्या! आखिर क्यों चुप हैं बुद्धिजीवी?

राजधानी लखनऊ के खुर्शीद बाग इलाके में हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी की गोली मारकर और चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई. लेकिन, बुद्धिजीवी वर्ग और अवार्ड वापसी गैंग की इस मसले पर नींद नहीं खुल रही है.

योगी राज में हिंदूवादी नेता की हत्या! आखिर क्यों चुप हैं बुद्धिजीवी?

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आज उस वक्त सनसनी फैल गई जब हिंदू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. एक खास धर्म पर विवादित टिप्पणी कर सुर्खियों में आए कमलेश तिवारी को दो अज्ञात लोगों ने उन्ही के ऑफिस में पहले गोली मारी और फिर गला रेत कर हत्या कर दी. बताया जा रहा है कि बदमाशों ने हत्या से पहले कमलेश से उनके ऑफिस में मुलाकात की और साथ बैठकर चाय पी.

कटघरे में योगी सरकार की पुलिस

कमलेश तिवारी की हत्या से उत्तर प्रदेश की योगी सरकार सवालों के घेरे में आ गई है. कमलेश तिवारी की जान को खतरा था ये उत्तर प्रदेश की पुलिस पहले से जानती थी. इसीलिए यूपी पुलिस की ओर से कमलेश तिवारी को एक सुरक्षाकर्मी भी दिया गया था. लेकिन जब हत्यारे कमलेश की मौत बनकर आए तो न मौके पर यूपी पुलिस का जवान था, न सुरक्षा का कोई और बंदोबस्त था. लेकिन सरकार की नाक के नीचे दिनदहाड़े खुलेआम मौत का तांडव हुआ और योगी की पुलिस बेहयाई से इसे सिर्फ और सिर्फ रंजिश का मामला बता रही है.

लखनऊ के एसएसपी कलानिधि नैथानी ने इस मामले को प्रथम व्यक्तिगत रंजिश की बात बताई. उन्होंने कहा कि जिस तरह उनके आने और चाय पीने की बात हमें बताई गई है. किसी परिचित के इस वारदात को अंजाम देने की आशंका जताई जा रही है. फिलहाल ये जांच का विषय है.'

उस वक्त कहां थी पुलिस?

यहां सवाल खड़ा होता है कि क्या यूपी पुलिस अभी तक कमलेश तिवारी पर जानलेवा हमले के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठी थी. अगर कमेलश तिवारी को पहले से ही जान का खतरा था तो फिर उनकी सुरक्षा क्यों नहीं बढ़ाई गई. ये सवाल बेवजह नहीं उठ रहे हैं. इनकी वजह ये है कि हत्यारे इस कदर बेखौफ थे कि वो आधे घंटे तक कमलेश तिवारी के दफ्तर में बैठकर चाय की चुस्कियां लेते रहे और फिर आसानी से कमलेश तिवारी को मौत के घाट उतार कर बिना रोक-टोक के निकल गए.

क्या सो रहे हैं बुद्धिजीवी?

सवालों के घेरे में सिर्फ सीएम योगी और उनकी पुलिस ही नहीं है बल्कि वो कथित सेक्लूयर बुद्धिजीवी भी है जिन्हे मामूली से आपसी विवाद में भी मॉब लिंचिंग नजर आने लगता है. जो बात-बात पर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने से लेकर अवार्ड वापसी के लिए तैयार बैठे रहते हैं. लेकिन कमलेश की हत्या को कई घंटे बीत चुके है. न तो अभी तक किसी बुद्धिजीवी का मुंह खुला है और न ही किसी ने अवार्ड वापसी की धमकी दी है. तो क्या कमलेश तिवारी इस देश का नागरिक नहीं था. या फिर किसी खास वर्ग और धर्म के लोगों की मौत पर ही अवार्ड वापसी गैंग की नींद टूटती है.

यहां एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि राम जन्मभूमि विवाद पर कमलेश तिवारी का रूख बेहद आक्रमक था. ऐसे में कहीं राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले कलमेश तिवारी की हत्या कर यूपी के हालात खराब करने की कोई बड़ी साजिश तो नहीं रची गई है? अब देखना यह होगा कि आखिरकार कब तक पुलिस हत्यारों को दबोच पाने में कामयाब हो पाती है.