राशन, गोला-बारूद... 16,000 फीट की ऊंचाई पर जाने के लिए भारतीय सेना की हाई-एल्टीट्यूड मोनो रेल तैयार, चीन पर निगरानी आसान

Monorail System in Arunachal: अरुणाचल प्रदेश की कामेंग घाटी में भारतीय सेना के गजराज कोर ने एक देसी हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल सिस्टम बनाया है. यह बर्फीले इलाकों में सामान पहुंचाने का नया तरीका बन गया है.

Written by - Sachendra Singh | Last Updated : Nov 15, 2025, 01:36 PM IST
  • 16 हजार फीट पर सेना का मोनो रेल सिस्टम
  • हर मौसम में काम करने की क्षमता
राशन, गोला-बारूद... 16,000 फीट की ऊंचाई पर जाने के लिए भारतीय सेना की हाई-एल्टीट्यूड मोनो रेल तैयार, चीन पर निगरानी आसान

अरुणाचल प्रदेश की कामेंग घाटी में 16,000 फीट की ऊंचाई पर सेना को सप्लाई पहुंचाना हमेशा मुश्किल रहा है. यहां मौसम अचानक खराब हो जाता है. रास्ते टूट जाते हैं. बर्फीले तूफान कई दिनों तक चौकियों को दुनिया से काट देते हैं. खच्चर, पैदल रास्ते और बाकी साधन कई बार काम ही नहीं आते. इसी चुनौती को देखते हुए भारतीय सेना के गजराज कोर ने एक देसी हाई एल्टीट्यूड मोनो रेल सिस्टम बनाया है. यह बर्फीले इलाकों में सामान पहुंचाने का नया तरीका बन गया है.

कैसे काम करता है यह सिस्टम?
यह एक मजबूत रेल जैसे ट्रैक पर चलने वाली ट्रॉली है. ट्रॉली एक बार में 300 किलो से ज्यादा सामान 16 हजार फीट तक ले जा सकती है. इसमें गोला-बारूद, राशन, ईंधन और इंजीनियरिंग का सामान रखा जाता है. अब यह चीजें आसानी से ऊपर तक भेजी जा रही हैं.

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हर मौसम में काम करेगी
इस सिस्टम को बर्फ, ओले, तूफान कुछ भी रोक नहीं सकता. यह दिन-रात चल सकता है. बिना गार्ड के भी काम करता है. इससे सेना की सप्लाई लाइन अब पहले से ज्यादा मजबूत हो गई है.

घायलों को निकालने में भी मदद
मोनो रेल सिस्टम सिर्फ सामान ले जाने तक सीमित नहीं है. यह घायल सैनिकों को तेजी से नीचे वाले कैंप तक लाने में भी मदद करता है. ऊंचाई पर हेलिकॉप्टर हमेशा उड़ नहीं पाते. ऐसे में यह तरीका सुरक्षित और तेज है. गजराज कोर ने इस सिस्टम को खुद डिजाइन किया है. इसके बाद खुद बनाया और खुद ही लगाया है. किसी विदेशी तकनीक का इस्तेमाल नहीं हुआ. इससे दूर-दराज की चौकियों की तैयारियां और मजबूत हुई हैं.

क्यों अहम है यह इनोवेशन?
कामेंग सेक्टर चीन सीमा के पास है. यहां ज्यादातर तनाव की स्थिति बनी रहती है. ऐसे में सप्लाई लाइन का मजबूत होना सेना को रणनीतिक बढ़त देता है. एक्सपर्ट का मानना है कि यह इनोवेशन भविष्य में अन्य इलाकों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

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About the Author

Sachendra Singh

सचेंद्र सिंह का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से है. इन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई 'संगम नगरी' प्रयागराज में स्थित इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की है. पढ़ने और लिखने में इनकी ऐसी रूचि रही कि इन्होंने पत्रकारिता जगत से जुड़कर अपना करियर बनाने की ठान ली. फिलहाल सचेंद्र ज़ी मीडिया समूह से जुड़कर 'ज़ी भारत : ZEE Bharat' के डिजिटल प्लेटफॉर्म में अपना योगदान दे रहे हैं. ...और पढ़ें

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